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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 878

( १० )

निरंजनबोध

लोभी होय सर्प विकारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥
लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥
विषई विषै सब विषकी खानी । ए सब कहिये जम सहदानी ॥
ज्ञानी करै करहु वरियारा । हमते कीन सकल निर्वारा ॥
जोई ज्ञान होय हमारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥
तृष्णा लोभहिं देय बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥
उनको ध्यान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा दूत जस करो बड़ाई ॥
उनपै जम की परै न छाही । तासैं हंसा लोकहिं जाई ॥

निरंजन वचन

कहैं निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हों ज्ञान तुम्हारी बानी ॥
जुगत महातम सबै बताऊँ । नाम तुम्हारे पन्थ चलाऊँ ॥
तुम तो एक पन्थ प्रकासा । हम दशपन्थ काल जुगफांसा ॥
जगके जीव सबै भर्माऊँ । ज्ञानवंत को कर्म हटाऊँ ॥
मार जीव को करे अहारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥
करे कर्म विषै बस भाई । चर वर्ण ले एक मिलाई ॥
कुलको त्याग होय सों न्यारा । चार वर्णको एक विचारा ॥
ज्ञान हमारा रहै तन छाई । ते सब जीव काल ले खाई ॥
बेखबरन की करिहैं हांसी-ते जीवन पर हमारी फांसी ॥
फिर फिर आवै जमकी खानी । वे सब सरन हमारी ज्ञानी ॥
कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी । ज्ञान संधि हमहू दे बरनी ॥

ज्ञानी वचन

कहे ज्ञानी सुन कैल विचारा । हंस हमार होय नहिं न्यारा ॥
निसवासर रहै लौ लीना । शब्द विचार होय नहिं भीना ॥
हंस हमार शब्द अधिका । पुर्ष प्रताप को करे सम्हारा ॥