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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 877

बोधसागर

( ९ )

जहां तहां सब जग भर्मावै । ज्ञान संच कछु रहन न पावै ॥
एक शब्दकी केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फांसा ॥

ज्ञानी वचन

बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटै चौरासी की धारी ॥
छूटै पांच पच्चीस गुन तीनों । ऐसो शब्द पुर्ष सुहि दीन्हो ॥

निरञ्जन वचन

हे ज्ञानी का करों बड़ाई । हमते नाह छूट जिव जाई ॥
इतने जुग भये का तुम देखा । ज्ञानी हंस न एकै पेखा ॥
का तुम करो का शब्द तुम्हारा । तीन लोक प्रलय तर डारा ॥
साधु सन्त हम देखी रीती । प्रलय परे सकल सब जीता ॥
कर्म रेख बाँधै सब साधा । सुरनरसुनि सकलो जग बांधा ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ॥
अब तुम कस खेहौ बटपारा । पुर्ष शब्द दीन्हौ टकसारा ॥
जनके जीवत लेउँ उबारा । कर्म रेख तोरो घर न्यारा ॥
पांच पच्चीस और गुन तीनों । इतने मोर हम लेउँ छीनो ॥
पांच जानेकी मेटी आसा । पुर्ष शब्द भाषौ विश्वासा ॥
शुभअरु अशुभ काकरे निबेरा । मेटी काल सकल उरझारा ॥

निरञ्जन वचन

तिगुन काल तब बोले बानी । उरझ जीव सकल जमखानी ॥
कै केसे तुम शब्द पसारो । कौनसी विधि तुम जीव उबारो ॥
ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी ॥
जगमें जीव क्रोध विकरारा । कैसे पहुँचै पुर्षके द्वारा ॥
क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी । धरी है जन्म नर्कको खानी ॥