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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 875

बोधसागर

( ७ )

ज्ञानी वचन

ज्ञानी देखे दृष्टि पसारा । याते नाहिं बचे संसारा ॥
ज्ञानी बोले शब्द बरियाई । तूहा काल खाइ दुनियाई ॥
निरञ्जन वचन-साखी

दोहा

जाहु ज्ञानी घर आपने, मानों वचन हमार ।
तीन लोक पुर्षहि दिये, स्वर्ग पताल संसार ।

ज्ञानी वचन-साखी

चौपाई

बोले ज्ञानी शब्द अपारा । मोकहैं दीन्हा पुर्ष टकसारा ॥

साखी

मैं जो पठयो पुर्षको, करन हंसके काज ।
कालहि मार सिंगार हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥

चौपाई

मारा काल शब्दका झारा । टूटे दन्त न करे पसारा ॥

निरञ्जन वचन

तबै निरञ्जन बोले बानी । कैसे हंस छुड़ाई ज्ञानी ॥
जगके माह कीन्ह हम बासा । पशु पक्षी जल थलमें आसा ॥
तीन सौ साठ पैठ हम लाई । तामें सकल जीव उरझाई ॥
जे दिनते हमने पैठ लगाई । दिन दिन उरझे सुझात नाहीं ॥
तापर काम क्रोध हम डारी । तृष्णा सकल जीवकहैं मारी ॥
इनमें जीव बन्धे सब झारी । कैसे हंसहि लेव उबारी ॥
तापर कीन्हो एक हम काजा । पाप पुण्य थापे हम राजा ॥
शुभ अरु अशुभ दोहदल साजा । ऐसे अलख निरञ्जन राजा ॥