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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1434

( ५८ )

बोधसागर

तृतीये प्रकृत इंद्री अधिकारा । यक द्वै त्रै चौ पंच प्रकारा ॥
परस जीव नासा हग काना । यथायोग जिव नाम बखाना ॥
सूक्ष्म इंद्री धरे जो कोई । मुखनासा हग कान न होई ॥
सो एकेंद्री थावर काया । भू जल अग्नि बनपती बाया ॥
जाको तन रसनायुत बादी । जलचर शंख जौं क गेडुवादी ॥
ऐसे जंत अनंत जो दीसा । ते द्वै इंद्री कह जैनीशा ॥
जाके तन मुख नाक हजुरा । घुन पमील अरु कान खजुरा ॥
ये सब जिव त्रै इंद्री भाषो । आंखिकानयुत रसजिनचाखो ॥
जाके तन मुख नासा आंखी । बीछूशलभ टीडी अलिमाखी ॥
यहि प्रकारके जिव जो नाना । सो चौ इंद्री जैन बखाना ॥
त्वच रसना नासा हग काना । ज्योंके त्यों पंचेद्रिय जाना ॥
नर नारकी देव पशुचारी । ये पंचेद्री करो बिचारी ॥
चौथी प्रकृत शरीर उचारी । औदारिक बसकिय वपुधारी ॥
औदारिक जो उदरसे होई । नर पशु योनि जानिये सोई ॥
देव नारकी भय किय देही । गर्भवास करते नहिं येही ॥
सुर नारक वय किय वपु धरते । देव देह मुनि तपबल करते ॥
जस प्राकृत तैसो तन गहेऊ । चौथी पिंड प्रकृत यह कहेऊ ॥
तनबंधन संघातन दोई । प्रकृत पंचमी छट्ठी होई ॥
बंधन उदय काय बंधाना । संघातनते हठ संधाना ॥
दोहुकी द्वै साखा द्वै खंधा । यथायोग काया सनबंधा ॥
अब सातमी प्रकृतको कहिये । सांगोपांग तीन मन लहिये ॥
कहो आठमी प्रकृत विचारा । षटविधि रूप शरीराकारा ॥
जो सर्वांग चारु परधाना । सो तनसम चतुरंश बखाना ॥
ऊपर थूल अधोगति ठामा । सोनिगोद पर मंडल नामा ॥
हेठ थूल ऊपर कृश होई । शांतिक नाम धरावै सोई ॥