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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1426

( ५० )

बोधसागर

ऋषभनाथ है आदि तिर्यंकर । तिनके पुत्रभे भरथ भूपवर ॥
चक्रवर्ति थे भरथ भुवाला । चौथा वर्ण कीन तिहि काला ॥
सब मानुषकी पारख लीन्हें । दायावंत अधिंक जिहि चीन्हे ॥
ब्रह्म चीन्हि जिन दाया धारा । तिनको भिन्न कियो तिहि बारा ॥
ब्रह्मन तिनको नाम पुकारी । जिनके हृदये दाया भारी ॥
चौथा वर्ण भरथ नृप थापा । तबते चार बरणकी छापा ॥
ऋषभनाथकी केवल बानी । तिहि औसर असकहैं बखानी ॥
भरथ विप्र थापे हैं जाको । चलै जगतमें तिनकी साको ॥
पञ्चम काल जाहि दिन ऐहै । ब्रह्मन जैन विरोधी ह्वैहै ॥
जैन विरुद्ध कर्म सब करिहैं । द्रोह सदा जैनीसे धरिहैं ॥
कछुदिन यहिविधि गयोसिराई । मन मत ब्रह्म न वेद बनाई ॥
जैन विरुद्ध कर्म सब ठाना । हिंसा कर्म करहिं विधि नाना ॥
अश्वमेध गोमेध रचाई । अजामेध नरमेध बनाई ॥
ब्राह्मणजातिकी अधिक प्रशंसा । लिख्यो ताहि ब्रह्माको वंसा ॥
अपने मन सब शास्त्र बनाये । सबते आपको श्रेष्ठ बताये ॥
करि प्रपंच सब थाप अचारा । जैन विरुद्ध पाखंड पसारा ॥
चौथा काल बहुरि जब ऐहै । फेर न ब्राह्मण वर्ण थपैहै ॥
बहुरि प्रतिष्ठा देय न ओही । थपै न जैन धर्मको द्रोही ॥
जाति वर्णकी बात बखानी । अब पुरुषनकी कहो कहानी ॥

छंद त्रिभंगी

चौबिस तीर्थकर जैनी शंकर बस कम कंकर धूल कियौ ।
गुण ज्ञान गहंत मुक्ति लहंत अरि हंतअतिचूल कियौ ॥
दाया उपदेशं रहित कलेशं मोह न लेशं धर्मधनी ।
कुल पद बत्तीशं बानी दीशं जैन मुनीशं भर्म भनी ॥