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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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बारह कोठरियां प्रस्तुत हो चुकनेके बाद बेगम अण्डा देने लगती है। बेगमोंके बच्चा देनेकी विचित्र युक्ति है। वे सब घरोंमें सुस्त नर मक्खियोंसे कुछ सम्बन्ध नहीं रखतीं। पर जब बाहर फिरती हैं तो नर मक्खीसे मिलती हैं।

हिउबर - बहुत बड़ा विद्वान् था उसने इस विषयको बहुत जांचकर लिखा है। वह कहता है कि, वे छत्तेके बाहर संयुक्त होते हैं एक बारके सम्भोगसे मक्खियां दो मौसम तक बच्चा देती रहती हैं। एकही मौसममें लाख बच्चे देती हैं जिन अण्डोंसे परिश्रमी मक्खियां उत्पन्न होती हैं उनकी बहुत रक्षा की जाती है उन बच्चोंका लालन पालन फूलोंके रस तथा मधुसे होता है, दाई मक्खी उनको पालती है। दाई मक्खीका यही काम है कि, सदैव बच्चोंकी रक्षा तथा सेवा किया करे, बराबर ग्यारह मास भी परिश्रमी मक्खियोंके अण्डे देते नहीं बीतते कि, रानी मक्खियां फिर राजकुमारियोंका अण्डा देने लगती हैं इसी सेवामें संलग्न रहती हैं। शाहजादी मक्खियां फूलके रस अथवा खराब मधुको अच्छा नहीं समझतीं उनके लिये अवश्यही उत्तम मधुका प्रयोजन होता है। मधुमक्खियां बहुत नमक-हलाल होती हैं। अण्डेकी अवस्थासे लेकर जबतक रानी मक्खीका पूरा स्वरूप होता है उसमें कुल सोलह दिन लगते हैं। सोलह दिनोंके बाद मक्खीका पूरा स्वरूप बन जाता है। इनको एक समयमें एक रानीका प्रयोजन होता है। वस्तुतः बादशाह होनेमें एकसे अधिक अधिकारी होनेसे बहुत कष्ट होता है। इस कारण जब तक सिंहासन खाली न हो तबतक रानी मक्खी एक घरमें बन्द रहती है। इसमें बहुत बड़ा कारण यह है कि, जिसके लिये एकसे अधिक रानी निकाली नहीं जाती क्योंकि, एकही समयमें दो रानी बाहर निकाली जाने पर एककी मृत्यु निश्चित है। मक्खियोंकी सैन्य चलती है तो अगवानीके लिये केवल एक मलका होती है। मक्खियोंकी मुखिया वह आगे होती है। प्रायः अनेक रानी मक्खी होती हैं जब दो रानी मक्खियोंमें साक्षात् होता है तो भयंकर युद्ध उपस्थित होता है। उनकी गिनती पहचानी जाती है। मक्खियोंके नियत होनेमें एक विचित्र कौतुक होता है। यदि कभी उनका बादशाह खो जाय कोई दूसरा वारिस न बचे तो बहुत आयोजन होता है। इस कारण एक मजदूरको चुनकर शाही महलमें प्रवेश कर देते हैं इसको राजसी भोजन कराते हैं। अन्तमें वही उनकी मलका होती है। इस प्रकार लिखा है कि, अच्छे भोजनके कारण वह मक्खी मोटी ताजी और तेजस्वी हो जाती है। केवल इस भोजनमेंही यह गुण है उसीकी यह प्रशंसा है कि, मजदूरको रानीके स्वरूपका बना देती है। अगस्तके आरम्भमें यह अधिक अण्डे देती है, जब अण्डोंका आधिक्य हो जाता है तो निकम्मी मक्ख-