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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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डुम और ऊँचा होता है लकड़ी मिट्टी और पत्तियों आदिसे बना होता है। सहस्रों परिश्रमी मकान बनानेका सामान ढूंढते हुये, इधर उधर घूमा करते हैं। लकड़ियाँ पत्तियाँ लाकर अत्यन्त स्वच्छता पूर्वक मकान बनाते हैं, प्रत्यक्ष देखनेमें तो उनके घरोंमें किसी प्रकारकी कारीगरी नहीं देख पड़ती पर सूक्ष्म दृष्टि के साथ जाँचकर देखनेसे जान पड़ता है कि, बहुत हिकमत तथा गुणके साथ बने हुये हैं। उनपर वैरीका आक्रमण नहीं हो सकता, प्रचण्ड वायु क्षति नहीं पहुँचा सकती, धूपकी तपन नहीं तपा सकती। जब कभी वर्षाकी अधिकतासे उनके घरमें कोई छेद भेद हो जाता है तो, वे अत्यन्त परिश्रम पूर्वक तुरन्तही उसको बन्द कर लेती हैं। मकान इस स्वच्छता तथा निर्मलतासे बनाते हैं कि, मानो बहुत सावधानी तथा परिश्रम किया गया हो। कहीं कोई छेद इत्यादि रहने नहीं देते। वर्षा जल तथा मिट्टी इत्यादि लेकर भली प्रकार गूँधते हैं गूँध गूँधकर बराबर लगाते जाते हैं, सुन्दर मेहराब तथा पील पाये खम्भे बनाते हैं, जिनकी प्रशंसा नहीं कही जाती।

जंगी लड़ाई—चीटियों बहुत क्रोधयुक्त होती हैं, उनमें बहुत भयानक युद्ध हुआ करता है, लड़ते लड़ते इस प्रकार मरती और कटती हैं कि, उनका शिर तथा धड़ पृथक् पृथक् हो जाता है। फिर भी अपने वैरीके साथ जुटी रहा करती हैं। शिर शिरके साथ और धड़ धड़के साथ चिमटे हुयेही मर जाती हैं। इनमें एक अनूठी बात यह है कि, एक जातिकी चींटी दूसरी जातिकी चींटियोंके अण्डे बच्चे पकड़ लाती हैं। उनको पकड़ने जाती हैं तो आक्रमण करके उनको पकड़कर कैंदी बना लाती हैं उनको दास बनाती हैं, वे दास सैन्यके पीछे पीछे चलते हैं अनेकों प्रकारकी सेवा किया करते हैं

चुराने और चुरानेवालोंका रंग—एक विचित्र बात यह है कि, जो डाकू चीटियोंके अण्डे बच्चे पकड़ने जाते हैं उनको पकड़कर अपना दास बनाते हैं वे सब पीतवर्णके होते हैं जिनको लूटकर वे सब चुरा लाते हैं वे सब काले रङ्गकी होती हैं, पीले रङ्गवाले अत्याचारी डाकू जब चलते हैं तब उनके साथ उनकी अरदलीमें बहुतेरी चींटियाँ भी चलती हैं। डाका मारने अथवा धावा करने पर उद्भूत होते हैं दोनों जातियों में घोर युद्ध होता है। हबशी अर्थात् काली चीटियोंपर बहुत कठिनाई उपस्थित होती है। विजयी सैन्य उनके दुर्गोंको ढाह देती हैं उनकी शहर पनाहको गिराकर उनके बच्चोंको पकड़ लेती हैं, विजय-डङ्गा बजाते हुये लौट आती हैं। विजयी सैन्यके लोग दासोंके साथ कुव्यवहार नहीं करते जैसे मनुष्य अपने गुलामोंसे करते हैं, उनके साथ भी ठीक वही सलूक