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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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योंको एकत्रित देखकर निश्चय कर लिया कि, ये सब किसी गूढ़ परामर्शके लिये यहां इकट्ठी हुई हैं। आपसमें वार्तालाप करके कुछ निश्चय कर रही हैं।

बिल्लियोंका प्रेम—मेरे भाईके पास एक बिल्ली थी। वह उनसे बहुत प्रेम रखती थी। एकबार यात्रा करने गये उसको घर पर अपने मित्रोंके पास छोड़ गये। दो वर्षके पीछे जिस दिन उनके आनेकी आशा थी, लोग उसी दिन उस बिल्लीको बहुत बेचैन देखके चकित हुये। सब लोगोंने पहले वह गाड़ीकी खड़खड़ाहट सुनकर चाहती थी कि, पहलेही से जाकर अपने स्वामीसे मिले, उस दिन उसको बहुत हर्ष था। दूसरे दिन जाकर अपने स्वामीके मोंढेपर बैठे जैसे कि, वह पहले जाके बैठा करती थी जिस दिन बिल्लियोंका स्वामी मरा, उस दिन उसकी सारी बिल्लियोंने उसकी कब्र पर जाके अपने प्राण त्याग दिये।

चीलके रूपमें डायन—ये डायने बिल्लियांही नहीं बरन अन्यान्य जीवधारियोंके स्वरूपमें भी होती हैं, सुतरां फीरोजपुरके जिला दूध मौजेमें मैं था। वहांके लोग कहने लगे कि, काकूसिंह नामक साहूकार गांवके बाहर कहीं जाता था। एक दिन गांवसे बाहर उजाड़में उसको कड़ी प्यास लगी। वहां कहीं भी पानी नहीं मिला इस कारण तूषासे गिरकर अचेत हो गया। डायनके नामसे विख्यात एक तरखानी स्त्री, काकूसिंह के घर पर जाकर समाचार दिया कि, अमुक उजाड़ में काकूसिंह प्यासका मारा अचेत होकर पड़ा हुआ है। उसके घरके लोयसवारी तथा पानी लेकर शीघ्रही उसके पास पहुँच गये, उसके मुँहपर पानी छिड़का और पिलाया वह शीघ्रही चैतन्य हुआ। उसको सवार कराके घर लाये। वहां आने पर काकूसिंहने लोगोंने पूछा कि, जहां मैं अचेत होकर गिरा था वहां तो कोई मनुष्य नहीं था तुम लोगोंने मेरी बेहोशीका समाचार किस प्रकार मिला? लोगोंने कहा कि, अमुक तरखानीने कहा है। काकूसिंहने कहा कि, वहां कोई मनुष्य नहीं था केवल एक चील एक जुण्डके बूक्षपर बैठी थी। अतः जान पड़ा कि, डाइन चीलका रूप धरे है।

उल्लूके रूपमें डाइन—कलावंतोंने उल्लुओंकी आवाज को अपने रागके साथ संयुक्त किया है, पुस्तकोंमें उल्लुओंकी बोलीको बरबादीका चिन्ह लिखा है। तथा अपवित्र पक्षी कहा है। डायन स्त्रियां उल्लुओंके स्वरूपमें भी फिरा करती हैं। अलेमान देशकी स्त्रियां भांति भांतिकी जादूटोने करती हैं। स्त्रियोंकी जादूगर उल्लू समझा करते हैं। उल्लू जादूगर स्त्रियां समझी जाती हैं। ऐसेही बङ्गाल देशकी स्त्रियां और उत्तरीय पर्वतोंकी स्त्रियां जादूके काममें अत्यन्त चतुर होती हैं।