कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextविशेष बात—पूर्वीय भारतमें छोटी जातियोंमें यह नियम है। कहीं २ उच्च जातिके लोगोंमें भी सुना जाता है कि, जब उनका बैल निर्बल तथा दुबला हो जाता है तो उसको सूअरका तेल पिलाते हैं। पिलानेसे वह पुनः मोटा हो जाता है। पर इसके साथ यह भी नियम है कि, जब वे सूअरका तेल पिलाना चाहते हैं तो उस बैलसे पहले पूछते हैं कि, कल तुमको सूअरका तेल पिलावेंगे। सांझको तो बैलस कह देते हैं सबेरे उठकर बैलका मुँह देखते हैं। यदि वह बैल रोता हो आँसू आये हों तो उसको तेल नहीं पिलाते, यदि वह न रोया हो न उसका आकार बिगड़ा हो तो उसको तेल पिला देते हैं। यदि रोया अथवा दुःखी जान पड़ने पर भी तेल पिलावें तो वह बैल दुःखके मारे आपही मर जाता है, यह बैलके विषयमें विशेष बात है।
भैंसा, भैंस
धर्मात्मा भैंसा—एक भैंसा एक जमींदारके घर रहता था। उस घरमें भैंसे तो बहुत थीं पर भैंसा एक ही था। वह अन्यान्य भैंसियोंसे तो जोड़ खाता पर अपनी माके निकट न जाता। उस जमींदारने अनेक युक्तियां की किन्तु उस भैंसाने अपनी मातासे जोड़ नहीं खाया। उस जमींदारने यह युक्ति की कि, उस भैंसके शरीरमें कीचड़ लगा दी कि, पहचानी न जावे उस भैंसेके पास ले गया उसने उसका संग किया। संग करनेके पीछे वह भैंस उसी समय पानीमें जा पड़ी उसकी देहका कीचड़ छूट गया। भैंसने भैंसको भली प्रकार पहचान लिया कि, यह तो मेरी माता है और जान लिया कि, इस जमींदारने मेरे साथ धूर्तता करके मुझसे पाप करवाया है तो वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर जमींदारकी ओर दौड़ा उसको मार डाला तथा उसका पेट सींगोंसे फाड़ डाला। वहाँसे भागकर न जाने कहाँ चला गया।
भैंसकी कामात्मता—फिरोजपुर जिलाके भाटीकोट नामक गांवमें एक बनियेके पास एक भैंस थी, वहाँ कोई भैंसा न था, जब उस भैंसके मनमें काम कामना हुई तो वह भागकर चली। वह मनुष्य बहुत रोकता रहा यह भैंसने कुछ न मानी, वहाँसे पांच कोसपर एक भैंसा था उसके पास जा पहुँची। सब दिन तथारात वह भैंसके पास रही। दूसरे दिन बनिया अपनी भैंसको दूँढ़कर घर ले आया।
भैंसका प्रेम—पंजाब देशस्थ फिरोजपुरके समीप एक जमींदार रहता था। उसके पास सौ रुपयेकी एक भैंस थी, वह बहुत दूध देती थी। एक दिन उस भैंसको चोर लेगये इसका कहीं पता न लगा तब वह उस दुःखमें उसको चारों ओर दूँढ़ता फिरा। उसका नाम भोगमिलानी था। उस भैंसको रोता हुआ दूँढ़ता और फिरता और कहता जाता था कि—