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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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ब्रह्मद्वेषी निःसन्तान हो । जो देवताओंकी निंदा करे वो रोगी हो । जो काशीमें मरे वो राजा हो । जो दूसरोंको विद्या पढ़ावे वो विद्वान हो । व्यभिचारिणी स्त्री निपूती हो । जो गर्भिणीके साथ सम्भोग करे वो नरकमें जावे । जो मदिरा पीवे सो मँदक हो । जो तीर्थकी निंदा करे सो पिड़िला हो । जो मास खावे वो राक्षस हो ।

इसी प्रकार सब जीव अपने पूर्वकर्मोंके अनुसार इस संसारमें वारंवार देह धर करके प्रगट होते हैं, उनका वैसाही आकार हो रहा है । इनके कर्म ही ने इनका स्वरूप बनाया है । अनगिनती जन्मोंके कर्म उनको साथ लगे हुए हैं वे ही उनका आकार बनाते हैं और वे ही उनको ईश्वर हैं ।

विचित्र आकार ।

७६—अब यहाँ मैं चौरासी लाख योनिके विचित्र विचित्र आकारोंको दिखाता हूँ । उनको देखकर जाना जायगा कि, मनुष्य क्या है ? पशु किसको कहते हैं ? यह सब मृतियाँ मनुष्य और पशु दोनोंही नहीं कही जा सकती । इनमें दोनों रङ्ग ढङ्ग पाये जाते हैं । अतः मानुषिक तथा पाशविक आत्मा कोई नहीं है, आत्मा तो एकही है पर कर्म चित्रकारने भाँति भाँतिके स्वरूप खींचे हैं । उनमेंसे कुछ जीवधारियोंका हाल यहाँ लिखा जाता है—

गजूवा—एक पक्षी है, उसका शरीर तो पक्षीकासा है और मुखड़ा मनुष्यका जैसा है । उसमें नर मादाकी पहचान नहीं होती । यह जानवर पवित्र समझा जाता है ॥ १ ॥

मनुष्यके शिरका सर्प—पर्वत अलियामें एक प्रकारका सर्प उत्पन्न होता है, उसका शिर मनुष्यका, सब शरीर सर्पकासा होता है ॥ २ ॥

संगपुस्त—सीतान् देशमें एक पक्षी उत्पन्न होता है उसको सङ्गपुस्त कहते हैं—उसका चेहरा आँख, नाक, मुँह, दाडी, मूँछ सब मनुष्यकासा होता है तथा बाकी सारा शरीर पक्षीकासा एवं पीठ पत्थरके समान कड़ी होती है ॥ ३ ॥

जल मनुष्य—एक टापूमें पानीके मनुष्य देखे गये । वे मँदकके समान तैरते फिरते थे, उनकी पूँछ गजभर लम्बी थी, उनकी दुमकी नोक, गुच्छेदार थी । इस प्रकार कहा जाता है कि, सौदागरोंका जहाज तूफानी चपेटमें कहींका कहीं चला गया, एक ऐसे टापूमें जा पहुँचा जहाँ उसे ऐसे मनुष्य मिले थे ॥ ४ ॥

मनकता—एक प्रकारकी मछली होती है, उसके देहके ऊपरका भाग अर्थात् कटिके ऊपर तो सुन्दरी स्त्रीकासा होता है, कटिके नीचे मछली कीसी होती है इसके सब शरीर पर बूंद होती हैं, उसके दो पर भी होते हैं ॥ ५ ॥