कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसुवर्णके घड़ेमें तालाबसे जल लेकर राजाको नहलाया करती थी। वह लौड़ी जल भरनेको उस तालाबपर आई घड़ा जलमें डुबोया, कबीर साहबने उसको ऐसा कौतुक दिखलाया कि, जब वह घड़ा भरकर जलसे बाहर निकालने लगी तो वह न निकला, उसने बड़ा बल किया पर उससे कुछ नहीं हुआ। अनेक लोग पकड़कर उस घड़ेको अपनी ओर खींचने लगे पर वह घड़ा अपने स्थानसे नहीं हिला, फिर बीस सहस्र मनुष्य पकड़कर उस घड़ेको खींचने लगे तरे भी घड़ेमें तनिक हील डोल उत्पन्न नहीं हुई। राजा रानीको समाचार मिला, रानीको भय उत्पन्न हुआ। राजाभी बड़ाहो आश्चर्यान्वित हुवा स्वयम् अनेक मनुष्यों सहित उस तालाबपर आया, हाथीयोंको बुलवाकर वह घड़ा खिंचवाने लगा। एक हजार हाथी तथा चार लाख मनुष्य लगकर वह घड़ा खींचने लगे। घड़ेने तनिक भी अपनी जगह नहीं छोड़ी। हाथीवान् हाथियोंको मारता था, सब हाथी चिड़घाड़ मारते थे पर कोई लाभ नहीं हुआ। राजाके मनमें बड़ा संदेह उत्पन्न हुआ। तब अपने मंत्रियों तथा सभासदोंसे कहने लगा कि, अब कौनसी युक्ति करनी चाहिये? यह वृत्त अम्बुसागरमें इस निम्न छन्दसे पहिले गाया। यहाँ उसीका सार हिन्दीमें कह दिया गया है।
छन्द— राव पेखत भयो व्याकुल बारिजल बहु नीर ही ।
आज अचरज भयो अति यह घडाकह यह किन गही ॥
सहस कुंजर लाग मानुष नहीं खिंचत सो टरचो ।
कीन्ह बहुत उपाय हान्यो अभय देखत जीव डन्यो ॥
सोरठा— मंत्री करो विचार, मम घट अति संशय भयो ।
व्याकुल चित्त हमार, कीजै कौन उपाय अब ॥
चौ०— मंत्री कहै सुनिये महाराजा । बचन कहत मोहि आवे लाजा ॥
सिद्ध एक आवा दरवाजा । तापर आप कीन्ह एतराजा ॥
सो स्वामी यह चरित दिखावा । हमरे चित्त भिरती यह भावा ॥
उद्धृत छन्दसे लेकर चौपाई तकका तात्पर्य थोडेमेंही लिखे देते हैं— कबीर साहब धम्मदासजीसे कहते हैं कि, इस राजाके मनमें जब अत्यंत व्यग्रता उत्पन्न हुई अपने मंत्रियों तथा मुसाहबोंसे कहा कि, अब कौनसी युक्ति करें इसका क्या कारण है कि, घड़ा नहीं निकलता? तब उन बुद्धिमानोंमेंसे एकने सोच समझकर कहा कि, महाराज! हमको तो यह जान पड़ता है कि, यह स्वामी जो आपके द्वारपर आया था, आप उसपर कुछ हुए थे उसका ही यह कौतुक है।