कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextउस राजाके द्वार पर एक बृहत् वट वृक्ष था, उस वट वृक्षकी छायामें हम आसन मारकर बैठ गए। उस समय उस राजाकी एक लौड़ी बाहर निकली साहबके समीप आ खड़ी हुई। दंडवत् प्रणाम करके पूछने लगी कि, महाराज ! आप कहाँसे आए हो किस देशमें रहते हो, आप किस कार्यके निमित्त आए हो जो कुछ आप भोंगो सो सब कुछ मैं आपको दूँगी, भिक्षा लेकर आप चले जाओ। यहाँका राजा बड़ा अत्याचारी है, जिस समय वह आपको देखेगा आपकी ग्रीवा उड़ा देगा। क्योंकि वह बड़ा अत्याचारी तथा निर्दयी है। वह ऐसा अत्याचारी है कि, उसमें तनिकभी दया नहीं। साधु ब्राह्मणको बड़ा दुःख दिया करता है। वह राजा इक्कीस डचोढ़ीके भीतर रहता है, वहाँ कोई नहीं जा सकता। केवल उसकी रानी उसके साथ रहती है। वहाँ किसीकी पहुँच नहीं। तब कबीर साहबने उस दासीसे कहा कि उस राजासे जाकर कहो कि, वह मेरे सम्मुख आवे, जब मेरे सामने आवेगा तो उसका, हृदय प्रकाशित हो जावेगा। यदि वह मेरा कहना मानेगा तो उसकी मुक्ति हो जावेगी। ऐ दासी तू भयभीत न हो, हमारा समाचार राजासे कहो। तब वह दासी डरती काँपती हुई, बीस डचोढ़ी पार कर जब राजमहलकी डचोढ़ीपर पहुँची, इक्कीसवें द्वारके द्वारपालसे कहा कि, तुम जाकर राजा साहबसे निवेदन करो कि—ऐ महाराज ! एक सिद्ध आया है, द्वारपर आपको बुलाता है। यह बात सुनकर उस द्वारपालको बड़ा भय उत्पन्न हुवा वो सोचने लगा कि, यदि मैं जाकर यह समाचार राजाको कहूँ तो राजा निश्चय मेरी ग्रीवा धड़परसे उड़वा देगा। उस दासीने उस द्वारपालको समझाया कि, तुम कुछ भय मत करो, वह सिद्धही नहीं वरन् समस्त सृष्टिका रचयिता है (क्योंकि उस दासीने कबीर साहबके प्रतापको देखा था)। हे द्वारपाल ! तुम कदापि भयभीत न हो। सुकनियाँ दासीके समझानेसे वह द्वारपाल राजाके समीप गया। दंडवत् प्रणाम करके निवेदन करने लगा कि, ऐ महाराज ! द्वार पर एक सिद्ध आया है, सुकनियाँ दासीने मुझे समाचार दिया है, कि, वह आपको बुलाता है। यह बात सुनतेही राजाने अत्यंत क्रुद्ध होकर आज्ञा दी कि, उस सिद्धको मार डालो, सूरुकनियाँ को भी फाँसी लटकाओ। जब उस द्वारपालने आकर सूरुकनियाँको यह समाचार पहुँचाया तो इसको सुनतेही वह भागकर द्वारपर आई कबीर साहसे कहा कि, ऐ महाराज ! आप यहाँ से उठ जाओ। क्योंकि, राजाने ऐसी आज्ञा दी है। कबीर साहब द्वारपरसे उठकर तालाबपर गए, वहाँ पर बैठे रहे। इस राजाका यह नियम था कि, जब सवा-पहर दिन चढ़ता था तब सोकर उठता था। उस समय छतिया नामक एक दासी