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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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बो वेंकुण्ठ नहीं जा सकता । चाहें लोग उसपर विश्वास करें कि, यह महात्मा हो गया इससे क्या है ? वो राम क्या अनजान है जिससे वो छिपजाय । एक रामकी पूजा तथा रामनाम एवं रामके लिये नमन करना ही सच्चा है । सिवा इसके कोई दूसरा देव नहीं है । इससे कल्याण हैं । यदि केवल स्नानसे ही कल्याण होजाय तो मँढक तो रातदिन पानीमें पड़ा रहता है क्यों न मुक्त हो जाय तो फिर २ मँढकही बना करता है । इसी तरह वो मनुष्य भी फिर २ कर योनियोंमें फिरता रहता है । मन तो कठोर पाप करनेमें लगा है फिर नरक क्या पांचमां (या ढाँटा) जायगा । भगवानके गुणानुवाद गानेसे तो वित्त अकुलाता है पर इसकके गन्धे गानाके सुनने में सारी रात बिता देता है । जहाँ सत्यपुरुष विराजते हैं वहाँ रात और दिन दोनों ही नहीं हैं, यानी वहाँ कालकी गति नहीं है, न वहाँ विधि-निषेधके शास्त्र ही हैं । कबीर साहिब कहते हैं कि, मैं तो उसीका ध्यान करता हूँ । यह संसार तो बाहिरिया बेकाम हैं मुझे इससे क्या लेना है ?

मैं किसको कहूँ, कोई न सुनता न मानता, सबकी बुद्धिपर परदा पड़ गया है । एक न भूला दो न भूला सारा संसार भूला पड़ा है, सब अचेत होगये, किसीकी बुद्धि ठिकाने नहीं रही । सब अंधेरीराजाके वशमें आगए इस राजाके मंत्रियोंकी जो दुष्ट बुद्धि है वह सर्व बुद्धिकोंका उपदेश दिया करती है । दोनों साधु जो विचार तथा विवेक हैं उनको मटियामेट किया चाहती है, वे दोनों अपनी बुद्धि-मानोसे बच निकले । कोई मनुष्य हो उसके हृदयके किसी कोनेमें छिपकर दोनों रह गये हों तो वह सोचे तथा समझे कि, जहाँ टका सेर घास मिठाई बिकती हो वहाँ कुशल नहीं है, यहाँके मनुष्य अंधे हैं इनमें तनिक भी सोच विचार नहीं । वे गुरु साधु तथा परमेश्वरको क्या पहचानें ? उनके निमित्त वासनाओंकी फाँसी खड़ी है सब उसके ऊपर लटककर मरते हैं, मर गए और निश्चय मरेंगे ।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह सब फँसनेवालोंके लिये फाँस बनाये गये हैं । सब दौड़ दौड़ कर आपसे आप इस जालमें फँसते हैं । जिसने तन मन धनसे प्रेम किया, मिटनेवाली वस्तुसे मंत्री जोड़ी वह मरेगा । जिस किसीको परमेश्वरने मंत्री प्रदान की वही समझे कि, उत्पत्तिके आरम्भमें केवल एक अण्डा वासनासे भरा हुआ उत्पन्न हुआ था । इसी कारण वह फूटा, आनन्द लेनेके निमित्त उसने सूक्ष्म शरीर धारण किया । यह शरीर कामक्रोधादिकके बंधनमें जबतक पड़ा है और जबलों सांसारिक आनन्दोंका ध्यान है, शरीरकी रक्षा चाहता है तबलों बंधनमें पड़ा रहेगा । मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, आदम जब अवनकी