कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextउन्होंने बल पाकर समस्त देवताओं ब्रह्मा विष्णु शिव सहित मार भगाया कि, उनमें तनिक भी बल नहीं रहा कि, उनका सामना कर सके। उनको बल देकर फिर आपही निर्बल होकर क्यों भागजाते। फिर जान पड़ा कि, ये बातें उनके सामर्थ्यसे बाहर थीं, यदि उनके वशमें होतीं तो वे आपसे आप विवश क्यों होते? ये तपके वश हैं इसी तरह सत्यपुरुष भक्तिके वश है।
देखो यह जीव वासनासे बिगड़ता है, जो यज्ञ वेदमें नियत हुई तो, उनसे क्या तात्पर्य है कि, यदि सौ अश्वमेध करे तो इन्द्रकी श्रेणी पावे अर्थात् इन्द्र हो जावे। फिर इन्द्र होकर वह भी कष्ट पाता हुआ दुःख भोगता रहता है। जो पापी हैं जीवको बेदर्व होकर मारते हैं, उन निर्दयियोंके जीवित रहनेसे पृथ्वीपर बोझका बढ़ना संभव था; इस कारण उनकी मृत्युही उचित है। दूसरोंको मारकर अपने वयसकी बढ़ती चाहना मूर्खता है। भाँति २ की कामनाओंके निमित्त प्राणघात करते तथा जीवोंको कष्ट पहुँचाते हैं उनका भला कैसे हो सकता है? बलि देते हुए प्रसन्न होते हैं पाप पर पाप बढ़ाते जाते हैं।
जो लोग संसारविरक्त कहलाते हैं वे फिर वैकुण्ठ ब्रह्मलोक इत्यादिकी कामना करते हैं इस कारण झूठे संसारविरक्त हैं। कारण यह कि, ब्रह्मलोक कौलास और इन्द्रपुरी इत्यादिके रहनेवाले सबके सब शरीरके बंधन और काम क्रोध लोभ मोहादिके फँदेमें फँसे हैं। संसारको छोड़कर फिर अप्सराओंके संभोगकी लालसा करना क्या बुद्धिमानोंके अनुसार कार्य है? कदापि नहीं। भलाजी! यहाँ तो एक स्त्री मिली थी जिसको कष्टका कारण समझकर छोड़ भागे थे। फिर सत्तर अथवा अधिक स्त्रियोंका सहवास मिला तब मुसलमानोंने कठिन दुःख तथा आपत्तिमें फँसा दिया। पहले तो एक सेर आटामें उदरपूति होती थी। वहिकृतमें सत्तर दस्तर ख्याल होंगे फिर उनके निमित्त पेटभी बड़ा बनाया जावेगा। यदि खाते २ पर्वत खाजाओ तो भी भूख न जावेगी। यह स्वर्ग नहीं मनुष्योंके निमित्त महा आपत्ति स्थिर की गई है कि, सदैवसे सदैव पर्यन्त आपत्ति तथा दुःखमें फँसे रहे, कभी उसका छुटकारा न हो। यह तो केवल जसे मूर्ख बच्चोंको ठग लड़्डू पेड़े खानेको देते हैं फिर उजाड़में लेजाकर उसके समस्त आभूषण उतारलेते हैं। उस अनजान बच्चेको मारकर कुएँमें ढकेल देते हैं। वह अज्ञान यदि ठगकी ठगीसे सचेत होता तो व्यर्थ अपने प्राण क्यों नष्ट करता? इसी प्रकार इस संसारके लोग सत्य पुरुषकी भक्तिसे अनभिज्ञकाल पुरुषकी वंदना तथा मानताकी आज्ञाओंपर चल रहे हैं। प्रत्यक्षमें देखते हैं पर नहीं देखते।