कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextश्री कबीर साहबजीके भण्डारेकी कथा ।
कबीरकसोटी जब ब्राह्मणोंने देखा कि, अब तो कबीर साहबका विशेष गौरव हुवा, हम लोगोकी कोई युक्ति नहीं चली, तब सबने परामर्श करके यह निश्चय किया कि, अब ऐसी युक्ति करनी चाहिए जिसमें कि, कबीरसाहबकी प्रतिष्ठा भङ्ग हो जावे । तब उन लोगोंने चार ब्राह्मणोंको नियत किया कि, तुम लोग देश देशान्तरोंमें जाकर समाचार दो कि अमुक दिवस कबीर साहबका भण्डारा है । सब संत महंत कृपा करके आवें । तब उन चारों ब्राह्मणोंने डाढी मूँछ मुँडवाकर वैष्णव वेष बनाया । उन चारोंने दो दो चले किये । यह सब बारह हुए, ये बारहों ब्राह्मण सब स्थानोंमें दौड़ गए और समस्त संत महन्तोंसे कहा कि, अमुक दिवस कबीर साहबका भण्डारा है ।
यह बात सुनकर समस्त संत महंत उस दिन कबीर साहबकी कुटीपर आए । बडी भीड़ हुई । कबीर साहबने अपना इकतारा लेकर बनका मार्ग लिया शब्द गाते हुए सत्यलोककी ओर दृष्टि की । तब सत्यलोकके हंस, मनुष्यस्वरूप धारण करके उत्तर पड़े लाखों बोरे नाना प्रकारके स्वादिष्ठ पकवानोंके लेकर आ पहुँचे । केशव बनजारा मेवे तथा अन्यान्य वस्तुएँ लेकर आ पहुँचा । नौ लाख बोरे खानेकी वस्तुओंके भरकर केशव बनजारा आया था, भण्डारा आरंभ हो गया । सब साधुओंकी सेवा तथा पहुनई आरंभ हो गई । किसीको इस बातकी सुध नहीं कि, ये कौन लोग हैं तथा कहाँसे आए हैं, जो भण्डारा कर रहे हैं । पन्द्रह दिवसपर्यन्त बराबर भण्डारा होता रहा इसके पीछे समस्त संत महंतोंको भेटे तथा वस्त्रादिक देकर विदा किया । सब धन्य कबीर धन्य कबीर एवं जय कबीर कहते हुए विदा हुए सब द्वेषी ब्राह्मण मूँह पसारकर रह गए कुछ न बन पड़ा । देवी भागवत छठएँ स्कंधके ग्यारहवें अध्यायके ४२-४५ में लिखा है कि, जो त्रेता और द्वापरमें राक्षस थे वेही अब कलियुगमें ऐसे ब्राह्मण हैं जो पाखण्डमें लगे हुए हैं प्रायः सज्जन मनुष्योंको ठगते हैं झूठे तथा वेदके धर्मसे हीन हैं, कपटी, चूस्त चालाक-धमंडी वेदविहीन, शूद्रोंकी सेवा करनेवाले हैं तथा कोई कोई अनेक अपधर्मोंको प्रवर्त करते हैं । वेदनिन्दक, क्रूर, धर्मशत्रु और गप्पी हैं ॥ कबीर साहबने भी अनेक बार कहा है कि, कलियुगके वे ब्राह्मण राक्षस हैं इस कारण वे साधुओंसे वैर करते हैं ।
लक्ष्मीजीका कबीर साहबको लुभानेकी इच्छासे आना और विफलमनोरथ होकर लौट जाना ।
विष्णुने लक्ष्मीजीसे कहा कि, तीनों लोकमें तो ऐसा कोई नहीं है जो तुम्हारे