कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextरखा। वही कबीरका पुत्र कमाल कहलाता है। [देखो ग्रन्थ निर्भयज्ञानमें] इसप्रकार शेखने कबीर साहबकी बावन लीलाएँ देखीं। तब बादशाह और शेखजी दोनों कर जोड़कर खड़े हुए और निवेदन करने लगे कि, ऐ कबीर साहब ! आप परमेश्वर हो। आपही खुदा हो आपही हमारे गुरु तथा पीर हो। हमारा अपराध क्षमा करो। हमको शाप मत दीजिये। तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ प्यारे बादशाह ! आपका तो कुछभी दोष नहीं है परन्तु आपके गुरुनेही हमारे साथ यह सब कुछ किया है, मैं उसेभी कभी शाप नहीं दूंगा क्योंकि जैसा कोई करता है, वह अपनेही निमित्त करता है।
कबीर साहबकी शाह सिकन्दरने नञ्जतापूर्वक बन्दनाकी।
देखो ग्रन्थ बोधसागर गरीबदासका वचन।
साखी - कंध कुल्हाड अघाल, मतक दुनियाँ भार।
गरीबदास शाह यों कहे, बखशो अबकी बार ॥
तहैं सतगुरु लौलीन हो, परचा अबकी बार ॥
गरीबदास शाह यों कहे, अल्ला देव दीदार ॥
सुनो काशीके पण्डितो, काजी मुल्ला पीर।
गरीबदास उस चरण गहि, अल्ला अलख कबीर ॥
यह कबीर अल्लाह है, उत्तरा काशी धाम।
गरीबदास शाह यों कहे, झगड़ भूए बेकाम ॥
क्यों बिगड़ी डगरी दुनियां, कहता कबीर समूल।
गरीबदास उस वृक्षके, अनन्त कोटि रंगफूल ॥
हम्द साखी।
ऐ कबीर तुम अल्ला हो, पलक बीच परवाह।
गरीबदास कर जोरके, ऐसे कहता शाह ॥
तुम दयालु दरवेश हो, धर आए नररूप।
गरीबदास शाह यों कहे, बादशाह जहान भूप ॥
उठे कबीर करम किया, बरसे फूल अकाश।
गरीबदास सेली चलै, चँवर करै रँदास ॥
तीन एक चण्डोलमें, रँदास शाह कबीर।
गरीबदास चौरा करै, बादशाह बलवीर ॥
मुकुट मनोहर शीशधर, चढ़े फील कबीर।
गरीबदास उस परीमें, कोई न धरता धीर ॥