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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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खबरदार ! मेरे शरीरको हाथ मत लगाना । तुम लोग महाभ्रष्ट हो । कबीर साहबके कहनेका भाव न समझकर नीरू वात्सल्यभावसे बालकको फिर यह कहता हुआ पकड़नेको चला—

कहु प्यारे काल्ह कहैं रहेऊ । हम खोजत थकित होइ गयेऊ ॥

तब कबीर साहबने कहा—

कहहिं कबीर हम उहाँ न जाहीं । तुम अभच्छ आनेहु घरमाहीं ॥

अब नीरूको चेत हुआ, तब उसने कहा—

कहे नीरू कर जोरि अधीना । अब तो चूक सही हम कीना ॥

अबकी चूक बकसिये मोहीं । हाथ जोरिकै विनवैं तोहीं ॥

इस प्रकार कहकर नीरू रोने और नकरगडी करने लगा, तब कबीर साहबने उससे कहा—

ऐसे हमं नहिं जैबे भाई । घर आंगन सब लीपौ जाई ॥

बर्तन अशुच दूर सब करिहौ । करि अस्नान वस्तर तन फेरिहौ ॥

ऐसी करिहौ जाइ तुम, तौ पइहो वहि ठाँउ ।

नाहीं तो घरको को कहै, तजि जाऊं यह गौँउ ॥

इतना सुनकर नीरू मनमें बहुत डरा और उसी क्षण घरपर जाकर कबीर साहबकी आज्ञानुसार, सफाई करके इन्तजार करने लगा, तब कबीर साहब प्रकट हुए और नीमा तथा नीरूसे बोले—

नीरू सुनहु श्रवण दै, फेर जो ऐसी होइ ॥

तब कछु मेरो दोष नहीं, जैहो जन्म बिगोइ ॥

दोनों स्त्रीपुरुषने हाथ जोकर कहा—हे प्यारे ! अब कभी ऐसी भूल न होगी । आप हमको मत त्यागो । (बृहत्कबीर कसौटी)

बयालीसवाँ प्रकरण ।

सुव्रत ।

कुछ दिवसोंके उपरान्त समस्त जोलाहे एकत्रित होकर कहने लगे कि, ऐ नीरू ! हमारे रसूल अल्लाहकी आज्ञाके अनुसार अब तुम अपने पुत्रका खतनः (मुसलमानी) कराओ । इसी अभिप्रायसे समस्त जोलाहे एकत्रित हुए और काजीको बुलाया और नाई उस्तरा लेकर कबीर साहबके सामने गया । जब नाई उस्तरा लेकर आपके निकट गया तब, आपने पाँच लिङ्ग उसको दिखलाये