कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextविद्वान् पण्डित उनकी बातोंको सुनकर आश्चर्य करता । कोई २ नीमा नीरूसे जाकर कहता—
कोइ (कोइ) जाइ नीरूसो कहई । सुत तुम्हार बड बादी अहई ॥
सिद्ध साधु सम ज्ञान बखाने । ऐसी अगाध मति कैसे वह जाने ॥
तब— नीरू नीमा दोउ मिलि, बिनवें ताहि बहूत ।
सब गुनाह मोहिं बखसौ, जोरे बिगारा पूत ॥
उनकी अधीनता देखकर लोग उन्हें कहते—
सभै कहें कछु गुनह न कीन्हा । ज्ञान न गोष्ठि उन पूछै लीन्हां ॥
सुत तुम्हार होइहै बड़भागी । होइहै भक्त नाम अनुरागी ॥
यहि कहि जाहिं भवन निज सोई । नीरू महा हरष चित होई ॥
नीरूके घर मांस आनेकी बातको जानकर कबीर साहबका
अन्तर्धान होजाना ।
इस प्रकारसे कुछ दिन बीतनेपर एक दिन नीरूके घर, कोई मिहमान आया और वह मिहमान दूसरे मुसलमानोंका बहकाया हुआ नीरूसे मांस खिलानेका हठ करने लगा । यद्यपि नीरूने उसे बहुत समझाया तथापि उसमें पैठा हुआ भूत नहीं निकला । अन्तमें जातिपातिके डरसे नीरूको मांस लानेके लिये भजबूर होना पड़ा । सत्य है—
जाति पाति हुर्मंतके गाहक । तिनको डर उर पैठयो नाहक ॥
जब सन्ध्याको सब लड़के अपने २ घर आये किन्तु, कबीर साहब नहीं आये, तब नीमाने अडोस पडोसके लड़कोंसे पूछना प्रारम्भ किया । जब उन लोगोंसे कुछ पता न पाया तब दोनों स्त्री पुरुष बहुत बिकल हुए । रातभर उन लोगोंने अन्न पानी तो ग्रहण कियाही नहीं, बल्कि उनको निद्रा भी न आयी । भोर होतेही नीरू उठकर खोजनेको निकला । तमाम नगर छान डाला, किन्तु कबीर साहब उसे कहीं भी नहीं मिले । तब वह पागलके समान जाने अनजाने हरएक आदमियोंसे पूछने और जिधर तिधर भटकने लगा । अन्तमें सन्ध्याको “कबीर साहबको लिये बिना घर लौटकर जानेसे नीमा कबीर साहबको न पाकर प्राण त्याग देगी ।” यही विचारकर नीरू गंगाजीमें डूबनेके लिये गया जैसे वह गहरे पानीमें जाकर गोता खाने लगा वैसेही उसे मालूम हुआ कि, किसीने उसका हाथ पकड़कर बाहर किया हैं । उसने जब आंख खोलके देखा तो कबीर साहब उसके सामने खड़े हैं वह प्रेम और आनन्दसे एकदम कबीर साहबको पकड़ने चला; किन्तु कबीर साहब उससे दूर हो गये और कहने लगे—