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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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दो और चलकर उनका दर्शन करो, संत महात्माओंसे अभिमान करना अच्छा नहीं। इतनी बातके सुनतेही रावण क्रोधसे भडक उठा, मानों बलती अग्निमें घृत पड गया और तलवार लेकर चला कि अभी उस भिखारीका शिर उतार लेता हूँ। देखूं वह दरिद्री मेरा क्या बना लेता है? यह कहकर वह तुरन्त मुनीन्द्रजीके पास जा पहुँचा और आपका शिर काटनेके निमित्त तलवार मारने लगा। सत्तर बार उसने तलवार चलाया, पर मुनीन्द्रजीका एक बालभी नहीं कटा। तब रावण मनही मन लज्जित हो दौल निकालकर रह गया। तब फिर रानी मन्दोदरीने समझाया कि, हे महाराज! आप सत्य गुरुके चरणोंपर गिर पडो। तब रावण घमंडके साथ कहने लगा कि, मैं शिवजीके अतिरिक्त और किसीके सामने मस्तक नहीं नवाऊंगा और न सहायता मांगूंगा। उसी महाराजने मुझको अटल राज्य दिया है, उसकी दया तथा अनुग्रह मेरे ऊपर है, उसीको मैं प्रत्येक क्षण और प्रत्येक समय दंडवत् करता हूँ! तब मुनीन्द्रजीने उससे कहा कि, ऐ रावण! मैंने भलीभाँति पहचान लिया कि, तू बड़ा अहंकारी है। मुझको तूने नहीं पहचाना और हमारा भेद नहीं जाना, पर एक बात मे तुझसे कहता हूँ कि, रामचन्द्र आकर तुमको मारेंगे और तेरा मांस कुत्ते भी न खावेंगे। ऐसा कहकर मुनीन्द्रजी लड़कासे चले।

चौदहवाँ प्रकरण।

मुनीन्द्रजीका अयोध्या जाना और मधुकर आदि अनेक जीवोंको उपदेश देना।

लंकासे चलकर वे अयोध्याको पहुँचे राहमें मधुकर नामक एक ब्राह्मण मिला और आपको पहचानकर चरणोंपर गिरा। उसने आपका बचन सुनकर आपपर विश्वास किया तब उस ब्राह्मणपर आपकी दया हुई और उसको और उसके समस्त बाल बच्चोंको घराने सहित मुक्ति योग्य बना दिया। रामचंद्रजी और हनुमान इत्यादिको भी शिक्षा दी। मुनीन्द्रजी महाराजकी कृपासेही रामचंद्रजी समुद्रके ऊपर पुल बाँधकर पार उतरे। मुनीन्द्रजी महाराजनेही जब "सत्यरेखा" लिखी तो उस सत्यनामके प्रभावसे पत्थर जलपर तैरने लगे और रामचंद्रवानरको सेना सहित समुद्रके पार उतरकर लंकापर विजयी हुए आप उस समय बहुतेरे ऋषि मुनियोंको उपदेश करते फिरे।

इस त्रेतायुगमें सहस्रों बेर मुनीन्द्रजी प्रगट हुए, अधिकारी मनुष्योंको