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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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समस्त मनुष्य सत्यपुरुष समझकर उसकी सेवा और बंदना करते हैं और अन-जानसे मृत्युके चंगुलमें जा फँसते हैं ।

तेरहवाँ प्रकरण ।

मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना ।

इसी प्रकार मुनीन्द्रजी अपने मनमें सोचते विचारते लड़काहूीपमें जा पहुँचे । उस समय राजा रावण बहो राज करता था । जब आपने लंका नगरमें चरण रक्खा तब पहले आपको विचित्र नामका एक भोट मिला । वह आपको पहचानकर चरणों पर गिर पड़ा और निवेदन किया कि आप मेरा उद्धार कीजिये । तब सत्यगुरु मुनीन्द्रजी उसपर दयाल हुए और उसको उपदेश देकर उद्धारका अधिकारी बना दिया । तब विचित्र भोटकी स्त्रीने रानी मन्दो-दरीको समाचार दिया कि, एक सिद्ध ऐसे आये हैं, जिनकी कृपा कटाक्षसे मेरा पति बडभागी हुआ और मुक्तिमार्ग पाया । यह बात सुनकर रानी मन्दोदरी सत्यगुरुके दर्शनोंके निमित्त आयी और आपका ज्ञान सुनकर उसने भी सत्य-गुरु की दीक्षा लेली ।

फिर मुनीन्द्र महाराज राजा रावणके दरबारको गये और द्वारपालसे कहा कि, राजा रावणको मेरे समीप बुला ले आओ । तब उस द्वारपालने निवेदन किया कि, राजा रावण बडा भयानक और अति क्रोधी है, यदि मैं जाकर उससे कहूँगा कि, आपको एक साधु बुलाता है तो वह निश्चय मेरा प्राण लेलेगा, मुझको उसका बडा भय है । तब मुनीन्द्रजीने कहा कि, द्वारपालको संदेश पहुँचानेमें कुछ भय करना नहीं चाहिये । तब वह द्वारपाल रावणके पास गया और कहा कि महाराज ! एक सिद्ध आया है और वह आपको बुलाता है । यह सुनकर रावण अत्यंत क्रुद्ध हुआ और कहा कि, तू बडा मूर्ख द्वारपाल है कि, एक निर्धन दरिद्री साधुके कहनेसे मुझको बुलाने आया, मेरा दर्शन तो शिवके पुत्र भी नहीं पाते हैं । ऐ द्वारपाल ! तू इस, सिद्धके रूपका वर्णन कर । तब उसने कहा कि, ऐ महाराज ! उस सिद्धका रूप तो पूर्णमाके चन्द्रके सदृश देदीप्यमान बडा सुन्दर है और चन्द्रकेही समान उसका समस्त शरीर चमकता है, श्वेत तिलक उसके मस्तकपर है, श्वेत तुलसीकी माला और कंठी गलेमें है और उसके समस्त वस्त्रादिभी श्वेत हैं । तब रानी मन्दोदरीने राजासे कहा और समझाने लगी कि, हे राजा ! यह साधु तो सत्यपुरुषका रूप हैं, आप शीघ्र चलकर उनका चरण छुओ तो तुम्हारा राज्य अक्षय हो जावेगा । आप राज्याभिमान छोड़