कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextरहे । अद्या निरञ्जन तथा तीनों देवताओंने सबको अंधा कर दिया और काल निरञ्जन सदैव सबको भून भूनकर खाने लगे, कोई पथ तथा कोई युक्ति मनुष्यको भागनेकी नहीं मिलती, मनुष्योंका यह कष्ट और दुःख देखकर और उनकी रोलार्डि सुनकर सत्यपुरुष दयालु हुए और ज्ञानीजीको बुलाकर कहा कि, ज्ञानीजी । मृत्युलोक जाओ, क्यों कि, कालपुरुष समस्त जीवों को नितान्त ही कष्ट पहुँचा रहा है कोई मनुष्य मेरे लोकको आने नहीं पाता है, कालपुरुषने सबको फँसा लिया है । तुम जाकर मनुष्योंको उनकी नींदसे जगाओ और सत्य भक्तिमें लगाकर मेरे लोकमें ले आओ । जो कोई आपकी आज्ञाको स्वीकार करे उसको कालपुरुषके पंजेसे छुड़ाओ । सत्यपुरुषने जब ऐसी आज्ञा दी तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषको प्रणाम करके सत्यलोकसे बिदा हुए और मृत्युलोककी ओर जीवोंकी रक्षाके लिये रवाना हुए ।
दूसरा प्रकरण
कबीर साहबका झाँझरी द्वीपमें आनेका वृत्तान्त ।
अद्या और निरञ्जन सत्यपुरुषका नाम छिपाकर तीनों लोकोंका राज्य करने लगे, सत्यपुरुषका पता अपने तीनों पुत्रोंको भी नहीं दिया, निरञ्जनने अपनी राजधानी झाँझरी द्वीपमें स्थिर की, जो सत्यलोकको चलनेपर भवसागरका पहला नाका है । ज्ञानीजी झाँझरी द्वीपमें आये और सत्यनामकी हँक लगायी, तब धर्मराय घमंडके साथ बोला कि, तुम कौन हो और कहाँसे आये और किस कारण आये हो, यहाँ तुम्हारा क्या काम है ? यह बात सुनकर ज्ञानीजीने उत्तर दिया कि, मेरा नाम ज्ञानी है, मैं सत्यपुरुषका अंश योगजीत हूँ और सत्यपुरुषकी आज्ञासे पृथ्वीपर जाकर मनुष्योंको मुबत कराऊँगा, कारण यह कि तुमने समस्त जीवोंको दुःख पहुँचाया और सत्यपुरुषके नामको छिपा दिया है, और मुक्तिमार्गके समस्त द्वार रोककर मनुष्योंको धोखा देकर धूर्ततासे मार लिया है । कोई मनुष्य नहीं जानता कि, मुक्तिमार्ग कौन है ? और किस-प्रकार हमारा बचाव हो ?
तीसरा प्रकरण ।
निरञ्जन और ज्ञानीजीका वार्तालाप ।
इतना सुनकर धर्मराज अत्यंत क्रुद्ध होकर कहने लगे कि, हे ज्ञानीजी ! सत्यपुरुषने तो मुझको तीनों लोकोंका राज्य प्रदान कर दिया, इसमें तुम्हारे