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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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छन्द—ताहि जुग हम आय जीवन दीन्ह अग्नित पान हो ।
सहस सात उबारि जीवन जाय लोक समान हो ॥
पुरुष दर्शन कीन्ह ततछन रूप अविचल पाइआ ।
पुहुप सज्या वास कराइ फल अमृत ताहि चखाइआ ॥
सोरठा—तुम बूझहु धर्मदास, जुग जुग लेखा भाषेऊँ ॥
चीन्हे कोइ इक दास, जेहि सत गुरु दाया करें ॥
इति प्रमाण श्रीअम्बुसागरका ।

इति श्रीकबीर मन्शूर के प्रथमभागके प्रथम अध्यायका परिशिष्ट समाप्त ।

कबीर मन्शूर प्रथमभाग ।

द्वितीय अध्याय प्रारम्भः ।

प्रथम प्रकरण ।

कबीर साहबके प्राकट्यका उपक्रम ।

जैसा पूर्व प्रथम अध्यायमें वर्णन हो चुका है । निरञ्जन, अद्या, ब्रह्मा, विष्णु, शिव पाँचोंने मिलकर ख्रिस्टिका निर्मान कर लिया । फिर अपना राज्य स्थायी बनानेके लिये निरञ्जन भगवान्की इच्छानुसार जो सहस्रों धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हुए, होते जाते हैं और भविष्यत्में होवेंगे सो सब अलख निरञ्जनकी ओरसे उन समस्त धर्मोंके निर्माणकर्ता तथा रचयिता विष्णु महाराज हैं, विष्णु, ब्रह्मा और शिव, सनकादिकर्तृषि मुनि मिलकर उनका प्रचार करते हैं, कितनेही थोडे और कितने बहुत कालतक प्रचलित रहते हैं फिर छिप जाते हैं, मनुष्य उसका अनुसरण करते हैं किन्तु उनको कुछ प्राप्त नहीं होता, उनसे हार्दिक कामना कदापि पूर्ण नहीं होती, सब बिफल मनोरथही रह जाते हैं । कालपुरुषने सब जीवोंको अपने जालमें फँसा लिया है, कोई जीव उसके चंगुलसे बाहर जाने नहीं पाता है । असंख्य युग इसी अंधकारमें बीत गये । कालपुरुषने सत्य पुरुषका नाम बिलकुल छुपा दिया । मनुष्योंको तनिकभी सुध नहीं रही कि, कालपुरुष कौन है और सत्य पुरुष कौन है ? इस बातसे वे पूर्णतया अनभिज्ञ

१ परिशिष्ट-इस ग्रन्थके अनुवाद कबीराश्रमाचार्य स्वामी श्रीयुगलानन्द बिहारीने ग्रन्थोसे संग्रहकर यहाँ आयोजित किया है ।