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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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किया है उसको तीन लोकका मालिक बनाया है । इस कारण उसी अग्निरूप कालपुरुषकी पूजा हो रही है ।

१११ प्रश्न—मनके प्राबल्यका कारण—क्या कारण है कि, मन सब पर प्रबल सभी मनके परवश पड़े हैं ?

उत्तर—मृत्युको भूलकर विषयवासनामें लुब्ध होनेसेही मनकेव शर्म पड़ा हुआ जीव नाना प्रकारके कष्ट उठाता है । जो कोई मृत्युका स्मरण रखता है, ईश्वरके भयमें रहता है, ईश्वरके भयसे रोया करता है । पश्चात्ताप करके ईश्वरकी दयाकी आशा रखता है उसपर परमात्माकी कृपा दृष्टि होती है । वह मन पर विजयी होकर सुखी हो जाता है ।

११२ प्रश्न—गुरुकी पहिचान—साधु गुरु किस प्रकार पहचाने जाते हैं ?

उत्तर—सत्संगसे ।

११३—प्रश्न—सत्संग कैसे प्राप्त होता है ?

उत्तर—उदारता, सेवा और मनकी शुद्धतासे ।

११४ प्रश्न—बन्ध कबतक—अहंकारमें समस्त संसार बँध रहा है यह कबतक रहता है ? इसके बंधसे कब और कहाँपर छूटता है इसका सम्बन्ध कबतक रहता है ? सो स्पष्ट समझा दीजिये ।

उत्तर—जो जीवकी पाँच अवस्था हैं वेही इसके बंधनके कारण हैं जब तक उनमें अहंता ममता रखता है तबतक इसकी मुक्ति होना असम्भव है । इसकी पाँचों अवस्था तथा अभिमानका विशेष विवरण सुनो ।

जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीमा तुरीयातीत ये पाँच अवस्था हैं इनकी स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण और कँवल्य ये पाँच देह हैं । इन्हींके अभिमानो संसार सागरमें बारम्बार गोता खाते रहते हैं । जब तक इनमें वासना है तबतक अहंकारसे मुक्त होना असम्भव है ।

स्थूलदेहके अभिमानमें फँसा हुआ जीव अपनेको सबसे बड़ा बुद्धिमान समझता है सब कला कौशलका प्रकाशक सबका ज्ञाता जानता है, इसकी दशा उस पादरीके समान होती है जो कि, स्वप्नकी दशामें पुस्तकें बनाता था । जब किसी समय किसी अपराधमें पकड़कर जजके सामने उपस्थित किया गया तो उसकी स्वप्नावस्था नष्ट होगई ।

जब जीव जाग्रत अवस्थाको छोड़ स्वप्नावस्थामें प्रवेश करता है उस समय अकलातून जैसा बुद्धिमान भी मूर्खों और अज्ञानियों जैसा नीच काम करता है जिससे अल्प बुद्धिवाला पुरुषभी घृणा करता है । इसी कारण स्थूल देह उसकी अवस्था तथा उसके कर्तव्य सब मिथ्या हैं ।