कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकिशोर, युवा, प्रौढ़ और वृद्धावस्थाको प्राप्त करता है। इसी तरह जन्मके दिनसे मृत्युतक अनेक प्रकारका बदल बदल हुआ करता है एवं होता रहेगा।
संघ्य धर्म एवं गुरुपूजन।
१०५ प्रश्न — स्वामी सेवक सब बंधे हैं भक्ति किसकी करनी चाहिये ?
उत्तर — उसका भजन करना चाहिये जिसे सत्गुरु बतावे।
१०६ प्रश्न — कितने एक कहते हैं कि, सदाचार रखना चाहिये, पुण्य करना चाहिये, धर्म (मजहब) से क्या काम है ?
उत्तर—सत्गुरु और धर्मके बिना पुण्यका मार्ग नहीं पा सकता। विधि, निषेध, शुभ, अशुभ, पाप, पुण्य, सब गुरु और मजहबसेही जाने जाते हैं।
१०७ प्रश्न — गुरुमुख तथा मनमुखका क्या अर्थ है ?
उत्तर — गुरुमुख वह है जो गुरुकी आज्ञाकारितामें बना रहे। धर्म-दासजीके समान तन, मन, धन गुरुके अर्पण करे। सदा गुरुका ध्यान किया करे चाहे गुरुका शरीर निकट हो अथवा दूर हो गुरुमुखकी प्रशंसा वचनसे बाहर है। सब प्रकारकी रिद्धि, सिद्धि, ज्ञान और मुक्ति गुरुमुखके लिये है। इसके विरुद्ध काम करनेवाला मनमुख है।
१०८—प्रश्न—आपने कहा कि, गुरुकी मूर्तिका ध्यान करे तो क्या यह प्रतिमापूजन नहीं है ?
उत्तर—निःसंदेह यह भी प्रतिमापूजन है पर अन्य सब प्रतिमापूजनसे यह उत्तम और श्रेष्ठ है क्योंकि, गुरुकी मूर्तिका ध्यान पारख गुरुको प्राप्त करा कर मुक्त करादेता है। ससारमें सब मनुष्य मायाके पूजक हैं। माया जड़ है। जड़के पूजनेवाले सब जड़कोही प्राप्त होंगे। मायाके पूजक शुद्ध चैतन्य ब्रह्मको कदापि नहीं प्राप्त हो सकते।
१०९—प्रश्न—“गुरु एक और सेवा अनेक” इसका क्या आशय है ?
उत्तर—इसका आशय यह है कि, मनुष्य जितना और जिसको चाहे गुरु करे पर गुरुओं और साधुओंकी सेवा करते २ पारख गुरुके पानेका अधिकारी होना है तब उसको पारख गुरुकी कृपा से अपना अभीष्ट प्राप्त होता है। अनेक गुरुओं तथा संतोंकी सेवा करनेपर पारख गुरु प्राप्त होता है वही अनेक सेवा व एक गुरुका आशय है।
११०—प्रश्न—कालपुरुषकी पूजा—समस्त संसारमें अग्निकी पूजा हो रही है। इसका क्या कारण है ?
उत्तर—सत्पुरुषने अपने क्रोध और बीभत्ससे कालपुरुषको उत्पन्न