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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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करते हुये अज्ञानता वश, अपनेही इष्टकी निन्दा करते हैं। इसी कारण उनके विश्वासमें न्यूनता होती है।

मूर्खोंकी मूर्खता — ये तीनों देव परस्पर ऐसे मिले हुये हैं कि, पर मनुष्य धोखेमें पड़कर अज्ञानतामें पड़ा हुआ अत्याचारोंमें फँसा हुआ भी अपने २ धर्मको सर्व श्रेष्ठ समझता है। वैष्णव शिवकी और शैव विष्णुकी सदा निन्दा किया करते हैं। ग्रन्थोंमें भी यही विरोध लिख रखा है जिनको पढ़ २ कर मिथ्या पक्षपातमें पड़ा हुआ मूर्ख यथार्थसे वंचित हो सर्वनाश करता है। ब्रह्माकी पूजा तो कहीं होती ही नहीं बरन् शिव विष्णु आदिकोंके पूजकोंमें परस्परका इतना विरोध है कि, इसका अबतक ठीक २ स्पष्टीकरण हुआही नहीं कि, दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है।

भागवत—भवव्रतधरा ये च ये च तान्सममनुव्रताः ।

पाखण्डिनस्ते भवन्तु सच्छास्त्रपरिपंथिनः ॥

मुमुक्षुवो घोररूपान् हित्वा भूतपतीनथ ।

नारायणकलां शान्तां भजन्ति ह्यनसूयवः ॥

जो सच्चे शास्त्रोंके दुश्मन शिवजीकी तरह भस्म रमाते हैं वे पाखण्डी होते हैं ॥ मुमुक्षु जन घोररूप भूतपतिओंको छोड़कर निन्दा न करते हुए भगवान् नारायणकी शान्तकलाको भजते हैं। इसी प्रकार दक्षिण देशके रामानुजसम्प्रदायी वैष्णवलोग भूलसे भी शिवका दर्शन नहीं करते। ऐसाही पद्मपुराणमें शिवजीके विषयमें यह श्लोक है।

विष्णुदर्शनमात्रेण शिवद्रोहः प्रजायते ।

शिवद्रोही न संदेहो नरकं याति दारुणम् ॥

अर्थ—विष्णुके दर्शनमात्रसे शिवद्रोह उत्पन्न होता है और इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, शिवका द्रोही अवश्य नरकमें पड़ता है।

इसी प्रकार मूर्खोंके बिना तात्पर्य समझे परस्पर विरोध मान रखा है। तीनों देव परस्पर मित्र रहते हैं पर मूर्खलोग परस्पर राग द्वेष करके लड़ते झगड़ते हैं।

तुलसीदासजी—तुलसीकृत रामायणमें लिखा है कि, रामचन्द्रने सेतुबांध-पर शिवका रामेश्वर नामक लिंग स्थापन कर पूजन किया और कहा—

चौ०— शिव द्रोही मम दास कहावे । सो नर मोहि सपनेहु नहि भावे ॥

दो०— शिव द्रोही दास मम, मम द्रोही शिवदास ।

सो नर करे कल्प भर, घोर नरकमें बास ॥