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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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अपनी विद्याके बलसे त्रिकालज्ञ हो जाता है। ईश्वरके समान ऐश्वर्यको प्राप्त हो जीवसे ईश्वर हो जाता है, संसारमें ईश्वरके समान पूज्य हो जाता है। पर जब तक ब्रह्माण्ड स्थित है; तबही तक योगी भी स्थित है। जब तक योगीका ज्ञान है तबही तक उसको सब कुछ प्राप्त है। उपरोक्त सब साधना गुरुके द्वारा प्राप्त होती हैं। गुरुकोही शरण प्राप्त कर सफल काम होता है।

उपरोक्त योग क्रिया बाजीगरका कौतुक है। योगियोंको अपनी योग क्रियाका बड़ा अभिमान होता है। सब भूलमें पड़कर बन्धनमें पड़े। जिस वायुके द्वारा योगी अपना सब कुछ प्राप्त करते हैं वह स्वयं नाशमान है, गोरखनाथने योगको भली प्रकार जाँच बूझकर देख लिया तब कबीर साहब की शरण गही। योग भोग दोनोंही भ्रम और अनित्य हैं। योग भोग दोनोंकी क्रिया समानही हैं जिस प्रकार योगी छः चक्र वेधता है उसी प्रकार भोगी भी छः चक्र तोड़कर ही आनन्दको प्राप्त करता है, केवल उतनाही भेद है कि, योगी नीचेसे ऊपरको चढ़ता है। भोगी ऊपरसे नीचेको आता है। पर दोनोंही परमानन्दको प्राप्त करते हैं।

भोगियोंका चक्र भेद।

भोगका वर्णन लिखता हूँ, जिसके विचारनेसे जान पड़ेगा कि, योगी और भोगीमें कुछ भेद नहीं है जिस प्रकार योगी षट् चक्रको वेध कर योग सिद्ध हो अमर मानता है उसी प्रकार भोगी भी षट् चक्र वेधकर योग सिद्ध और अमर होता है। भोगी स्त्री पुरुष मिलकर सिद्धि प्राप्त करता है यानी भोग करनेके समय—जब मत्थासे मत्था मिलता है तो पहिला चक्र टूटता है।

जब आंखसे आंख मिलतेही द्वितीय चक्र विद्ध होता है। मुहसे मुह मिलते ही तृतीय चक्र टूटता है छातीसे छाती मिलाते ही चतुर्थ चक्र टूटता है। नाभीसे नाभी मिलते ही पञ्चम चक्र विद्ध होता है भग और लिंगका संयोग होनेसे छठा चक्र वेधा जाता है।

जब भोगी उपरोक्त रीतिसे छः चक्रोंको भेद चुकता है तब वायु और अग्निके बलसे नीचेको वीर्य उत्तरता है। वह छः चक्रोंको वेधता हुआ सातवें स्थान गर्भाशयमें जा स्थित होता है। भोगी आपको अमर जानता है क्योंकि, जबतक भोगीकी संतान पृथ्वीपर वर्त्तमान है तबतक वह अमरही है।

समन्वय—जैसे योगीको ज्ञान और सिद्धि उत्पन्न होती हैं, वैसेही भोगीको संन्तान मिलती है। जो माता पिता थे वेही पुत्री और पुत्रके रूपमें वर्त्तमान रहते हैं। दोनों (योगी और भोगी) सातवें चक्रमें आपको अमर अनुमान करते हैं। (योग भोग दोनोंही मिथ्या भ्रम हैं)।