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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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अग्नि चक्र—इस विशुद्ध चक्रके आगे अग्नि चक्र है । इसे सिद्ध करनेके लिये योगीको नेति क्रिया करनेकी आवश्यकता होती है । सूतकी एक वितेभरकी बत्ती बनाकर नाकमें चला, ब्रह्माण्डको भली प्रकार साफ करके अपने कण्ठकी वायुको अग्नि चक्रमें स्थापित करना होता है । योगी अग्निचक्रमें वायुकोस्थापित करके बड़ा आनन्द प्राप्त करता है । वायुको ऊपर चढ़ा कर जिह्वासे मार्गको रोकके कुम्भक कर समाधिको प्राप्त करता है, शरीर शक्तिहीन मृतक समान हो जाता है । दशवें द्वारमें पहुँचकर योगी निर्विकल्प समाधिको प्राप्त हो जाता है । इस स्थानपर पहुँचकर योगी अष्टसिद्धि और नव निधिको प्राप्त करता है ।

अष्टसिद्धि ।

१ अणिमा; २-महिमा; ३-गरिमा; ५-लघिमा; ५ - प्राप्ति; ६-प्रकाशिका । (काम); ७-ईशता; ८-वशीकरण ।

१ अणिमा - उसको कहते हैं कि, योगी जिस सिद्धिसे अपने शरीरको जितना छोटा चाहे बना लेता है । २ महिमाके द्वारा योगी अपनी देहको जितना चाहे बड़ा कर सकता हैं । ३ गरिमाके द्वारा जितना चाहे भारी हो जाता है । ४ लघिमाके बलसे अपने शरीरको हलकेसे हलका बना सकता है । ५ प्राप्तिसे ही योगी जहाँ चाहता है चला जाता है । ६ प्रकाशितासे मनवाञ्छित प्राप्त हो जाता है । ७ ईशतासे अपनेको सबसे श्रेष्ठ प्रमाणित करा सकता है । ८ वशीकरणके द्वारा विश्वको अपने वशमें कर सकता है ।

नवनिधि ।

१-महापद्म; २-पद्म; ३-कच्छप; ४-मकर; ५-मुकुन्द; ६-खर्व; ७-शंख; ८-नील; ९-कुन्द ॥ इन ९ के भिन्न २ गुण हैं । प्रत्येक निधि पर देवताओंकी चौकी रहती है जब इन ९ निधियोंके अभिमानी देवते वशमें हो जाते हैं तो योगी इनको प्राप्त कर लेता है वह अपनी शक्तिसे जिसको चाहे राजा बना सकता है अथवा दरिद्र करदे उसमें सब ऐश्वर्य आजाते हैं । इसी स्थानको सहस्रदल कमल कहते हैं । यहाँ ही निरञ्जनका वास है । इस स्थानपर पहुँच कर योगी, निरञ्जनसे एकता कर परमानन्दका अनुभव करता है । इसी अवस्थामें आपको अजर, अमर, सर्व शक्तिमान् समझता है । इसकी सब सिद्धियाँ दासी हो जाती हैं ।

१ नेती धोता वस्ती आदि क्रियाएं शरीरकी शुद्धि के लिये हैं, चक्र भेद तो प्राण वायुसे होता है, पाठक स्वामीजीके चक्र भेदनको इससे सुधार कर पढ़लें ।

श्लोक— महापद्मश्च, पद्मश्च, शंखो, मकर, कच्छपो ।

मुकुन्द, कुन्द, नीलाश्च. खर्वश्च, निधयो नव ॥