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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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दुख देकर, चोरी और धूर्तता आदि नाना प्रकारके निषिद्ध पाप कर्मोंसे धनको कमावेगा, या परतन्त्र होकर नाना प्रकारकी झिड़कियोंको सहता हुआ दासपनसे कुछ प्राप्त करेगा । जो शरीरके ही पोषण पालनमें लगा रहेगा वह सत्यको नहीं प्राप्त कर सकता क्योंकि, सारे विकारोंका मूल आशक्ति है । शरीरकी आशक्ति छोड़े बिना अपने स्वरूपकी सुधि नहीं होती । शरीरकी आशक्तिमें पड़ा हुआ सारा संसार कोल्हूके बेलके समान दिनरात चढकर खा रहा है, इसको कभी भी सुख नहीं होता । इस पर कबीर साहिबने एक शब्द कहा है—

शब्द — खसम विन तेलीके बेल भये ।

बैठत नाहीं साधुकी संगति नांधे जनम गये ॥

बहि बाँह मरे पचे निज स्वार्थ यमको दण्ड सहे ।

सुत दारा धन राज काज हित माथे भार गहे ॥

खसमहिं छोड़ि विषय रंग राचे पापके बीज बोये ।

झूठ मुक्ति नर आश जिवनकी प्रीतिको झूठ खोये ॥

लख चौरासी जिया जन्तुमें सायर जात बहे ।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो उन स्वानकी पूछ गहे ॥

जीव विषयवासनामें पड़ा हुआ चौरासी लाख योनियोंमें मारा मारा फिरता है, उसको ज्ञान विवेकका अवकाशही नहीं मिलता, सदा भय और आशामें फँसा हुआ सन्देह सागरमें गोते खाया करता है ।

साखी—कबहुँ चित्त संसारमें, कबहुँ लोकको भीति ।

क्षणहूँ सुख पावे नहीं, कहा हार कहैं जीति ॥

यह अपने मनमें तनिक भी नहीं सोचता समझता कि, मातृगर्भमें पोषण करनेवाला कौन था ? किसने वहाँ भोजन पहुँचाया ? किसने रक्षा की ? किसने सुखपूर्वक बाहर निकाला ? जन्म लेनेके प्रथमही माताके स्तनोंमें दूध भर दिया । जब तक मातृगर्भमें उलटा लटकता था तबतक किसने किस युक्तसे पेटमें खानेको पहुँचाया ? गर्भसे बाहर निकालने पर किसने दो सेवक प्राणापन्न सेवा करनेवाले उपस्थित कर दिये । वे प्राण जाय तो जाय पर बालककी रक्षामें किसी प्रकारसे उत्साह नहीं हारते थे जब तक युवावस्थाको न पहुँचे तब तक अपना जान माल सब उसके ऊपर निछावर करते रहे जिस विश्वम्भर सर्व रक्षक माताके गर्भमें पोषण और रक्षा की, सुखपूर्वक जन्म दिया वो सर्वदा रक्षा किया करता है । ऐसे दयालु सर्व रक्षक सर्व शक्तिवान पिताको भूल कर असत्य संसारसे प्रेम करना मनुष्यत्व नहीं है इस संसारमें कोई किसीका नहीं होता, सब अपने २ स्वार्थके चाहनेवाले हैं ।