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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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नारदका तो मन तरङ्गोंमें था वहाँ भी अपनेको कामजीत प्रगट किया । विष्णु भगवान्ने नारदकी बात सुनकर मुसकुरा कर प्रगट किया कि, आप सब तप-स्वियोंके शिरोमणि हैं आपके सन्मुख कामका जीतना कौन बड़ा भारी काम है ? भगवान्ने मनमें विचार किया, इस समय नारदको अड़कार हुआ है । यदि इसको न सम्हाल लिया जावेगा तो बहुत दुःख होगा । इतना विचार कर अपनी शक्तिको आज्ञा दी । मायाने वहाँसे चलकर एक स्थान पर जो नारदजीके जानेका मार्गमें ही एक नगर बनाया, जिसमें राजा प्रजा सहित सब सांसारिक सामग्री । उपस्थित कर दीं ।

उधर तो यह कौतुक हुआ, इधर नारदजी भगवान्के पाससे चलकर उस नगरमें पहुँचे, नगर देखनेकी लालसासे शहरमें प्रवेश किया । नारदजीके आनेका समाचार राजाके पास पहुँचा, वह दौड़ा हुआ आया नारदजीकी अगवानी करके अपने राजमहलमें ले गया, अर्घ्य पाछ दे पूजन कर उच्च आसनपर बैठाया ।, पीछे अपनी एक पुत्रीको जिसका कि वह शीघ्रही स्वयम्बर करनेवाला था बुलाकर नारदजीके सन्मुख खड़ा किया । कहा कि, महाराज ! दया करके इसके भाग्य अभाग्यका विचार बतलाइये इसको कैसा पति मिलेगा ? यह भी कहिये नारदजीने देखकर कहा कि, यह बालिका बहुत भाग्यशालिनी है, इसका पति सब विद्या सम्पन्न कला कौशल संयुक्त महाऐश्वर्यवान् चक्रवर्ती राजा होगा । नारदजीने प्रगटमें तो यह कहा पर अन्तःकरणमें उसके प्रेमका तीर खाया । यह चिन्ता हुई कि, किसी प्रकार इस राजकुमारीको व्याहना चाहिये । इसी चिन्तामें विचार करते २ यह निश्चय किया कि, यदि मैं अत्यन्त सुन्दर बन जाऊँ तो यह मुझे अवश्यही स्वीकार कर लेगी । अन्तमें विचार करते २ यह निश्चय किया कि, विष्णुसे बढ़कर कोई सुन्दर नहीं है, अब चलकर विष्णुसे सुन्दरता माँगनी चाहिये । यह निश्चय करतेही उलटे फिरकर विष्णुलोक पहुँचे । विष्णु भगवान्ने देखकर कहा, बहुत शीघ्र लौटे । कहो क्या चाहिये नारदजीने कहा कि, आप अपनी सुन्दरता दीजिये, श्रीनगरके राजा की पुत्रीका स्वयम्बर है । विष्णु भगवान्ने कहा कि, बहुत अच्छी बात है जिसमें आपकी भलाई होगी वही करूँगा । इतना सुननेके बाद नारदजीने देखा कि, मेरा शरीर परम सुन्दर हो गया, पर यह सुधि नहीं हुई कि, मेरा मुंह कैसा है ? भगवान्ने समस्त शरीर तो नारदका अपने समान बना दिया पर मुख बन्दरोंकासा बनाया । नारदजी बकुण्डसे चलकर फिरसे उसी नगरमें पहुँचे, वहाँ देखा कि, राजकुमारीके स्वयम्बरकी बड़ी तैयारी हो रही है, रङ्गभूमिमें देश देशके अनेक राजे