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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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युरोपमें भेजा, जिसको पाकर युरोपके कई एक सन्नाटोंने अपनी सेना भेजकर अमेरिका का बहुतसा भाग अपने आधीन कर लिया।

इस अमेरिकाको नई दुनियाँ बोलते हैं। वहाँके लोग बहुत सरल हृदय और छल कपटसे रहित थे। इससे प्रमाणित होता है कि, यह देश कोलम्बसके सङ्कल्पसे उत्पन्न हुआ था। उसका ऐसा सङ्कल्प हुआ कि, यह देश ऐसाका ऐसाही बना रहा, वही अबतक चला जाता है। इसको पहले कोई भी नहीं जानता था, इसकी रचना भी गन्धर्वनगरके समान है।

नारदजीकी कथा।

एक समय नारदजीने कठिन तपस्या की, जिसको देखकर इन्द्र भयभीत हुआ कि, नारद मेरा राज्य ले लेगा। इसी भयके कारण नारदजीकी तपस्याको नष्ट करनेके लिये कामदेवको भेजा। कामदेवने नारदजीके निकट जाकर शक्तिके अनुसार बहुतसी युक्तियाँ कीं पर मुनि कामातुर न हुये। पश्चात् इन्द्रके निकट गया कहा कि, नारदमुनि पर मेरा कुछ भी बल नहीं चलता, नारदजीने मुझे जयकर लिया। नारदजीको (कामके निष्फल होनेके कारण) अहङ्कार हुआ कि, मैं कामजीत हुआ, मेरे बराबर दूसरा कोई नहीं है। इसीमें नाना प्रकारके सङ्कल्प विकल्प करते हुये इन्द्रके पास पहुँचे। वहाँ इन्द्रसे अपनी अपनी बड़ाई आपही करने लगे कि, मैंने कामको जीता। इन्द्रने कहा—क्यों न हो? आप जैसे तपस्वी, महात्मा ज्ञानीका काम क्या कर सकता है। इन्द्रसे यह अपनी प्रशंसा सुन नारदमुनि वहाँसे सीधे चलकर ब्रह्मलोकको पहुँचे। ब्रह्माजीने कुशल मङ्गल पूछनेके बाद पूछा कि, ऐ बेटा ! कहाँसे आ रहा है ? नारदजीने कहा मैं अमुक बनमें तपस्या कर रहा था, वहाँ काम मुझे छलने गया, पर मैंने उसको जीत लिया, इतना कहकर अपने तप तथा कामदेवका सब हाल कह सुनाया। यह बात सुनकर नारदजीको अभिमान देख ब्रह्माने कहा कि ऐ बेटा ! ऐसा अभिमान मत कर काम बड़ा बली है, उसके कारण बहुत लोग नष्ट भ्रष्ट हुये हैं। अबसे यह अभिमान मनसे निकाल दे, मेरे सामने कहा सो कहा, विष्णु भगवानके सामने भूलसे भी न कहना।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनी अनसुनी कर नारद शिवजीके पास गये। शिवजी बड़े प्रेमसे मिले। नारदजीने वहाँ भी अपनी वही बात चलाई, जिसको सुनकर शिवजीने कहा कि, यहाँ जो कहा सो कहा विष्णुके पास यह कभी न कहना। पर नारदजी शिवजीके वचनको भी न मानकर सीधे विष्णुलोकको गये, भगवान्ने बड़े प्रेमके साथ नारदका सत्कार कर कुशल मङ्गल पूछा।