कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextबहुत हैं । बाजीगरने कहला भेजा कि, मैं शहर भरके मच्छरोंको बाँधे देता हूँ, राजा साहब आकर मेरा खेल देखें । बाजीगरने अपने मंत्रके बलसे शहर भरके मच्छरोंको क़ैद कर दिया । राजा बाहर आया । बाजीगरने बहुत प्रकारके कौतुक दिखाये पीछे वही कौतुक दिखलाया वैसाही कर्तव्य किया जैसा कि, शाहजहाँ बादशाहके वृत्तान्तमें लिखा गया है । अन्तमें राजाने उपरोक्त बाजीगरको कतल करनेकी आज्ञा दी । अंतमें गिड गिडानेपर भी, अपने प्राणको बचाता हुआ न देखा तो बाजीगरने शाप दिया कि, “ऐ राजा ! तू कोढ़ी होकर बहुत दुःख पावेगा, तेरा राज्य नष्ट हो जावेगा, महान् कष्ट भोगकर प्राण त्यागेगा ।” पीछे बाजीगर तो मारा गया पर राजाको भी ठीक वैसेही विपत्ति, दुःख और कष्टोंका सामना कर प्राण त्यागना पड़ा ; जैसा कि, बाजीगरने शाप दिया था ।
बाजीगरकी समाधि—उपरोक्त बाजीगरकी समाधिपर एक खजूरका वृक्ष उगा जो कि, सीधा शहतीरके समान खड़ा था । राजाके वंशवाले उसपर खारूयेकी गिलाफ लगाते और उसकी पूजा किया करते थे । यदि वे उसकी पूजा नहीं करते तो उनको नाना प्रकार के विघ्नोंद्वारा बहुत दुःख हुआ करता था । नियत समयपर समाधिपर मेला लगा करता था, जिसमें हजारों आदमी इकट्ठे होते थे । राजाका किला टूट फूट कर दरियामें गिरता जाता था । राजाकी संतान, किला खजूर का वृक्ष, मेला और समाधिकी पूजा, मैंने अपनी आँखोंसे देखी थी ।
अनुमान होता है कि, उपरोक्त बाजीगर वही था, जिसने शाहजहाँ बादशाहको कौतुक दिखलाया था क्योंकि, बादशाह और राजा एकही समयमें हुए थे ।
राजाके परिवारका बालक—मूख राजाने विचारा था कि, यदि इस बाजीगरको मार डालूंगा तो यहाँके मच्छर ऐसे ही बँधे रहेंगे । अज्ञानतासे यह न सोच सका कि, जिस शरीरके सुखके लिये मैं ऐसा अनर्थ करता हूँ वह कबतक रहनेवाला है । इसका सुखही क्या है । उस पापका जो फल उसको प्राप्त हुआ वो तो ऊपर लिखा गया पर उसकी संतान भी महान् दुःखमय जीवन व्यतीत कर रही थी । उसी राजाके वंशका एक विद्यार्थी मेरे साथ पाठशालामें पढ़ने आया करता था जो महान् दुःखी था । उस समयके आजमगढ़ जिलाके मजिस्ट्रेट और कलेक्टरको धन्य है जिन्होंने, उसकी सब दशा देख उसके खानदानका हाल जान दया कर उसके पोषण पालनके लिये एक तहसीलदारीकी जगह दिलवा