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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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कबीर साहबकी साखी ।

कोठी तो है काठकी, ढिग ढिग दीन्हीं आग ।

पढ़ पण्डित झोली भये, साकट उधरे भाग ॥

हजरत ईसाकी वाणी ।

मतौफी इज्जोल ८ बाब, २० आयत—ऐ बाप ! तूने विद्याभिमानियोंसे ओट रखा अपने बच्चोंपर परदा खोल दिया ।

एक फकीहा (कर्मकाण्डी विद्वान्) ने हजरतसे कहा कि, आप जहाँ जावें मैं भी आपके साथ जाऊँगा । इस बातपर हजरतने जवाब दिया कि, लोमड़ियोंके वास्ते माँद और पक्षियोंके लिये घोंसले हैं, पर मनुष्योंके लिये शिर धरनेकी जगह नहीं, इतना कहकर उसको शिष्य नहीं बनाया ।

लोमड़ियोंसे आशय विद्याभिमानियोंसे है । क्योंकि, वह फकीहों विद्याभिमानी था, अतः विद्याभिमानियोंको लोमड़ी कहा क्योंकि, विद्याभिमानी लोमणियोंके समान चतुर और चालाक होते हैं, वे पृथिवीमें रहते हैं, पक्षीके घोंसले वृक्षपर होते हैं, विद्याभिमानी जनोंका आवागमन नहीं छूटता । वे मातृगर्भरूपी माँदोंसे कभी छुट्टी नहीं पाते । जब ऐसेही विद्याभिमानी लोग संसारके उपदेशक बने तो किस प्रकार जीवोंका कल्याण हो सकता है ।

तपस्वी और भजनीक भक्त ज्ञानी लोग जो अपने भजनके बलसे स्वर्गमें जाते हैं, यह पक्षियोंके कहनेका आशय है समय पाकर वे भी पतित हो जाते हैं ।

मनुष्योंके कहनेका आशय उन लोगोंसे है, जो कि, विषय वासनासे मुक्त होकर तीन लोकसे बाहर होगये उनको तीन लोकमें शिर धरनेकी जगह नहीं है क्योंकि, यह तीन लोक वासनिकोंके लिये है । ये तीन लोक सच्चे मनुष्योंके लिये नहीं है । ज्ञान तिलकमें लिखा हुआ है ।

स्वामी रामानन्द वचन ।

पढ़ पढ़ राते गुण गुण माते हृदया शुद्ध न होई ।

नानक वचन

पढ़ पढ़ गढ़ी लादिया, लिर लिख भरीं साख ।

नानक लेखे एक गुरु, हौं मैं श्रवकड़ झाख ॥

प्रह्लाद वचन ।

पढ़ूँ न विद्या सो लिख पाटी । विषेक राम भगतकी टाटी ॥

क्या पौड़े तूँ लिखे जँजाला । लिख कीरतन राम नाम गुपाला ॥

इज्जोलमें करीनतूनको पोलूस रसुलका पत्र कि—जो कोई पण्डित