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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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पातालवासी साम्बरने नवीन सृष्टि उत्पन्न करना आरम्भ किया वो अपनी सृष्टिके जीवधारियोंकी देहको मणि माणिकसे युक्त महासुन्दर शोभायमान बनाता था। देवता लोग उसको नष्ट कर जाते थे, इस कारण देवताओं और दैत्योंमें घोर युद्ध हुआ करता था। साम्बरने अन्तमें तीन पुरुष ऐसे उत्पन्न किये जिनमें वासनाका लेश भी न था। तीनों वासना रहित पुरुषोंने देवताओंको जीतकर भगा दिया, जिससे उनको ऐसा भय उत्पन्न हुआ कि, पहाड़की घाटियों गुफायें आदि गुप्त स्थानोंमें छिपने लगे। अन्तमें विचार कर उन तीनों साम्बर रचित निष्काम पुरुषोंमें वासना उत्पन्न कराई। इससे वे भय खाकर देहकी बचावट करने लगे। भय और चिन्ता हुई तो देवताओंने उनके ऊपर बड़ी प्रबलताके साथ आक्रमण किया वे लड़ाई छोड़कर पाताल भाग गये, जहाँ यमराजाका स्थान था वहाँ जाकर छिपे। पीछे दैत्यराजा साम्बरने ऐसे तीन पुरुष उत्पन्न किये जिनको कि, कभी वासना होवेही नहीं। तीनों आत्मज्ञानी थे उन्होंने देवताओंको मार भगाया। पीछे स्वयं विष्णु भगवान्ने जाकर उनसे महान् युद्ध करके उनका बध किया। यह देख दैत्यराज साम्बर स्वयं विष्णु भगवान्से युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें उपस्थित हुआ, अन्तमें असुरारि विष्णु भगवान्ने उसे भी मार गिराया। इस प्रकार स्वयं भगवान् विष्णु इस ब्रह्माण्डके अधिपति हैं, इसमें दूसरा हस्ताक्षेप नहीं कर सकता। सहस्रों ऋषि मुनि ईश्वरपदको प्राप्त हो नया ब्रह्माण्ड रच ईश्वरी करते हैं, पर वे भी इसमें कुछ हस्ताक्षेप नहीं करते।

पठित मूर्ख—विश्वामित्र मध्य श्रेणीके ऋषि थे, हजारों उनसे बढ़कर उच्चपदपर स्थित हैं जिनके ऐश्वर्य और प्रतिष्ठाका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। विद्याभिमानियोंको उनकी श्रेष्ठता और प्रभावकी क्या सुधि है, ऐसे २ ऋषि मुनि हैं जिनकी अपेक्षा ब्रह्मा, विष्णु आदि तुच्छ हैं। उन ऋषियोंको विद्याके अहङ्कारी पठित मूर्ख क्या जान सकते हैं।

विद्याभिमानी कूवेंके मंडकीके समान हैं, कूवेंकी मंडकीको अपने कूवेंकी सुधि होती है, उसे असीम सागरकी क्या सुधि है? कबीर साहबने ऋषियोंकी बड़ाईमें कहा है कि, सच्चे सन्त और साहब, एक हो जाते हैं। जिन्होंने सत्यपदको प्राप्त किया है, जो गुरुपदकी सुधि रखते हैं, निर्माण होकर रहने पर भी साहबके तुल्य हैं, जो ऐसी महिमा युक्त सन्तोंकी ठट्टा और निन्दा करते हैं, वे भक्ति मुक्तिके सत्यमार्गको नहीं प्राप्त होते, विषयवासनाके वश संसार सागरमेंही पड़े हुये बारम्बार आवागमन किया करते हैं।