कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकर्ताओं में सब का राजा ओ (०) है। समस्त साहित्य और सब कला कौशल और विद्याकी जड़ यही है। यहाँतक तो बुद्धि और विचारकी पहुँच है इससे आगेकी किसीको सुधि नहीं कि क्या है ?
जब यह गुप्तसे प्रगट हुआ तो दुःख और शोकसे पूर्ण था। उसी दुःख शोकसे अनन्त दुःख उत्पन्न करके संसार को बन्धनमें डाल दिया समस्त संसार में आपही आप बना आपहीमें समस्त संसार है। यथार्थमें यह ओ (०) है सो ( WOE ) है, इस पर शोक है यह दुःख और आपत्तिका घर है। यह ओ (०) तो स्वयं बन्धनमें है जबतक अपने छुड़ानेवाले को न पहचाने तबतक कदापि न छूटेंगे। यह ओ (०-Ow-c) ऋणी है जबतक अपने ऋणको न चुकावे तबतक छुटकारा न होगा। जब यह अपना ऋण ऋणदाताको चुकावे तो भाग्यवान् हो। यह जाने कि, मेरे ऊपर क्या ऋण है ? किसको देना है ? इसको पहचाने तो मालम करे कि, तन, मन धन ये तीनों आपत्तियां इसको लग रही हैं। इन तीनों आपत्तियोंमेंसे यह फँस गया है। ये तीनों आपत्तियां ही इसके नष्ट और भ्रष्ट होनेके कारण हैं। इन्हीं तीनों में बँधा हुआ इसका आवागमन हुआ करता है। जबतक इनसे पृथक् न हो तबतक मुक्ति की आशा नहीं। उनमें यह जीव ऐसा फँसा है कि. नाना दुःख कष्ट सहनेपर भी उनको छोड़ने नहीं चाहता।
ऐ ओ ! (०) तेरा कहना लिखना सब साइफर, झूठ और निर्मूल है। जब तक इन तीनों (तन, मन, धन, को सद्गुरुके समर्पण न करदे। तब तक तेरा कुछ न होगा क्योंकि, तू वासनासे पूर्ण है। तू इनके मूलको विचार कर कि ये क्या है ? ये तीनों अत्यन्त अशुद्ध है तू शुद्ध है। तू वह है जो मनवाणी और शब्दके परे है। इनसे जो तूने प्रेम किया है इसी कारण अशुद्ध होगया है तुम्हें इन्हीं तीनोंने कँद रखा है। इन तीनोंकी व्याख्या तू सुन।
पहले मनको पहचान कि, यह कौन है। ? यही मन कालपुरुष निरञ्जन है, यह स्वयं बड़ा विषयी है। सब विषय वासनासे पूर्ण है। विषय वासना और काम, भोग इसीसे उत्पन्न हुये हैं इसी मनने मुझे पशुधर्मकी तृष्णा की ओर खींचकर बन्दी बनाया है। जब तक तू इस मनको मारके मृतक न करे गुरुकी आज्ञा-कारितामें पूर्ण उतरे तब तक यह मन मुझ पर प्रबल रहेगा, तू उसके शासन के नीचे दबा रहेगा। जब यह मृतक हो जावेगा। तब तेरा बल उसके ऊपर चलेगा उसको विजय कर सब सुखको प्राप्त करेगा।
दूसरा तन-इस शरीर पर ध्यानकर कि, यह कैसे अशुद्ध मन्त्रकी बँदसे बना है। इस शरीरको मनने बनाया है। जैसा मन है वैसीही तृष्णा और वासना-ओंसे भरा हुआ है, ये दोनोंही महान अपवित्र और नीच है।