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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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अब जानना चाहिये कि, यह (०) दो शब्दोंमें दो स्वरूप धारण करता है, दोनोंका अर्थ भी दो प्रकारका होता है । एक दुःख और आपत्ति आदिक और दूसरा अर्थ-ऋणी । यह ऋणी जबतक अपने ऋणदायकका ऋण न चुका दे तबतक उसका छुटकारा नहीं हो सकता । आपत्ति और दुःखसे उसकी मुक्ति न होगी । जब यह (०) प्रगट हुआ तब उसमें नाना प्रकारकी वासना भरी हुई थी, यह वासनासे भरा हुआ प्रगट हुआ उसकी छाया पड़ी एक रूपके दो दृष्टि आने लगे । एक असल, दूसरी नकल है जब दो रूप प्रगट हुए तो उसका स्वरूप (००) हुआ । एक साइफर से दो हुये अथवा दो-ओ कहो, जब दोनों साइफर एक रूपके हुये तो उनसे कुछ काम न हुआ तब प्रकृतिने उनके स्वरूपमें विभिन्नता करदी । तब दो रूप बन गये अर्थात् दोनोंमें केवल इतना भेद हुआ कि, एकका आधा शिर टूट गया, तब उनका रूप ऐसा (a) हुआ, यानी जो दो-ओ (००) था सो एक ए (a) हो गया, यह अंग्रेजी वर्णमालाका प्रथम अक्षर हुआ । यथार्थमें इन दो-ओ (००) को प्रकृतिने-ए- (A) बना दिया । यथार्थमें दोनों साइफर हैं : एक असल, दूसरा नकल, एक स्त्री, दूसरा पुरुष । जब एकसे दो हुये तो इनमें दूसरोंको उत्पत्ति करनेकी सामर्थ्य हुई । जब दोनों का रूप बदल गया तो वे दोनों परस्पर मिलकर क्रशमः (EIOU) को उत्पन्न किया (A) के साथ मिलनेसे पांच अंग्रेजी भाषाके ब्हाविल कहलाते हैं । इन्हींसे आगेकी उत्पत्ति हुई, फिर तो क्रमशः (BCDFGHJKL MNPQRSTV-WXYZ) यह अंग्रेजी भाषाके इक्कीस कोन्सोनेन्ट (CONSONANT) हुये । इन अक्षरोंको युक्तिपूर्वक संयुक्त करनेसे शब्द बना । उससे वाक्य, वाक्यसे श्लोक, मन्त्र, पदार्थ पुस्तकें इत्यादि सब बनाई गई यथार्थ, और कृत्रिम, अमली और नज़री सब विद्याएं प्रगट हुई । समस्त संसार, वाणी और पुस्तकोंसे भर गया । सब केवल ओ (O) का प्राकट्य है सब ओ (O) हैं । अगणित पुस्तकों और वाणीसे संसार भर गया । नकल में असल छिप रहा है । यथार्थ और कृत्रिम एकरूप होकर संसारमें पूर्ण हो रहे हैं । पहचानने में नहीं आते कि, कौन यथार्थ कौन कृत्रिम है ? यथार्थ और कृत्रिम दोनों क्या हैं ? क्योंकर है ? किस प्रकार इनका स्पष्टीकरण हो ? सब एक दूसरेके पीछे चले जाते हैं । सब मनुष्य बन्धनमें पड़े हैं यथार्थ मूलको न कोई जानता है न कोई जाननेका प्रयत्नही करता है । इन्हीं पांचोंसे सारा संसार चैतन्य होता है, कोई नहीं जानता कि, ये पांचों कौन हैं । इसी प्रकार सृष्टि और उसका कर्ता, जगत् और ईश्वर, स्वामी सेवक सब प्रगट हो बन्धनमें पड़े । इन सब जगत्