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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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तरेगा, मनमुख डूब मरेगा। सब प्रशंसा गुरुमुखके लिये है, सब धिक्कार और निन्दायें मनमुखके लिये हैं। गुरुमुखमें पूर्ण मनुष्यत्व वर्तता है मनमुख पशु धर्मोंमें रहनेके कारण बन्ध व वासनाओंमें फँस रहा है।

मनमुखके मुक्त न होनेका कारण—कितने लोग गुरुसे उपदेश तो ले लेते हैं पर सेवा करनेके समय भाग जाते हैं मनमुख होकर अपना जन्म गँवा देते हैं। वे मूर्ख यह नहीं सोचते विचारते कि, गुरुकी सेवा भक्ति बिना ईश्वर कैसे प्रसन्न होगा। पत्थरपर चक्रमक्क लगता है तब अग्नि निकलती है यदि पत्थर और चक्रमक्कका संयोगही न हो तो चिनगारी कैसे निकले? इसी प्रकार यदि चेला गुरुका सच्चा प्रेम-सम्बन्ध न हो तो ज्ञानका प्रकाश कैसे हो। यदि लोहा और पारसका संयोगही न हो तो सोना कैसे बनेगा? लोहा पारसका सम्बन्ध भी हो पर जब तक उनमें तनिक भी भेद रहे, तो सोना होना असंभव है।

गुरुपूजाका महात्म्य—गोविन्दको कोई भी नहीं देख सकता गुरुको सब देख सकते हैं। गोविन्दके स्थानपर गुरुदेव पूजता है गुरुही की पूजा गोविन्दकी पूजा है। जो अपने गुरुको परमात्माका स्वरूप जानकर उसकी सेवा करता है वह तत्काल सत्यपुरुषको पा लेता है। गुरुकी उत्कृष्टता तीन लोकसे परे है। ये तीनोंलोक मनमुख हो रहे हैं इस कारण कोई भी मनुष्य गुरु की यथार्थ सेवा नहीं करता। गुरुके ऊपर संदेह करनेसे धर्मकी ध्वजा टूट जाती है। जिन्होंने गुरुको पूजा उनके दोनों लोक सुधरे जिन्होंने गुरुको न पूजा वे गुरुविमुख होकर उभय लोकसे भ्रष्ट हुये। सब मतवालोंमें कोई ही गुरुमुख होगा नहीं तो मनमुखोंकी संख्या अधिक है।

मजहिबीयोंकी ओर दृष्टि—प्रथम हिन्दुओंकी ओर ध्यान दो, इनमें प्रायः सभी गुरुविमुख देख पड़ते हैं सभीने गुरुसे मुख फेर लिया जब कभी किसी बातके जाननेकी आवश्यकता होती है, तो किसी से पूछ कर दान पुण्य कर दिया नहीं तो कुछ चिंताही नहीं। लाखों करोड़ोंमें कोईही गुरुमुख होगा।

मुसलमानोंकी ओर ध्यान दो तो मालूम होगा कि न कोई किसीका गुरु है न कोई किसीका चेला है प्रचलित रीतिसे किसी मुल्ला, मौलवी आदिसँ पूछकर रोजा निमाज सीख लेते हैं। न किसीका कोई गुरु न चेला है केवल बातोंही बातोंका मेला है।

फकीरोंमें कोई २ फ़िरका ऐसा है जहां गुरु चेलेका बिचार है।

यही दशा ईसाई (ख्रिश्चिटी) धर्मकी है। मूसई (यहूदी) भी उन्हीं की पैरवी करते हैं। इन दोनों धर्मोंमें तो नाम मात्रको भी गुरु शिष्यकी रीति