कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextश्रद्धा विश्वास—शिष्यको गुरुके उचित वाक्य पर विश्वास श्रद्धा रखना मुनासिब है । क्योंकि, गुरुके वचनकी श्रद्धाही भक्ति मुक्तिको प्राप्त कराती है । विश्वास श्रद्धाहीके साथ गुरु है, श्रद्धा विश्वासके छूट जानेपर नहीं रहती, विश्वास श्रद्धाही पर गुरु बैठा है । मुहम्मद साहबके नूरनामेमें लिखा है कि, खुदाने यकीनका एक वृक्ष उत्पन्न किया उसके ऊपर मुहम्मदकी रुहको मोरके समान बैठाया ।
आदि भक्ति शिवयोगी केरी । राखी गुप्त न जगमें फेरी ।
आदि गुरु विश्वासके वृक्षपर बैठाया गया, इस लिये गुरुकी बैठक वहीं हुई । जहाँ विश्वास नहीं, वहाँ गुरु नहीं, इसी लिये सब गुरुमुख लोगोंको ताकीद की गई है कि, अपने २ गुरुपर श्रद्धा विश्वास रखो यदि विश्वास नहीं रहेगा तो गुरुभी नहीं रहेगा । समस्त स्वसंबेद पुकारता है कि, गुरुको छोड़कर गोविन्दको कदापि नहीं पावेगा ।
गुरुदर्शन—चेलाको उचित है कि, गुरुका नित्य दर्शन करे । नित्य न हो सके तो दूसरे तीसरे दिवस तो अवश्यही करे, वह भी न हो सके तो सप्ताह अथवा पन्द्रह दिनमें जरूर करे । यदि पक्षपक्ष भी दर्शन न हो तो महीनामें एक बार, यदि यह भी न हो सके तो तीसरे महीने, यदि किसी कारण ऐसा भी न हो सके तो छठे महीने भेट पूजा सहित गुरुका दर्शन जरूरही करने जावे । यदि छठे महीने भी न हुआ तो वर्षमें दिन तो अवश्य सेवा बजावे । यदि वर्षमें दिवस भी गुरुकी सेवा पूजा न कर सके तो उसका कहीं भी ठिकाना नहीं । जैसे वृक्ष बिना जलके सूख जाता है उसी प्रकार चेला गुरुके दर्शन बिना अशुद्ध अंतः-करणका हो जाता है ।
गुरुमुखका कृत्य—इस संसारमें दो प्रकार मनुष्य हैं । गुरुमुख और मनमुख । गुरुमुख वे लोग हैं जो कि, गुरुकी सेवामें किसी प्रकारकी भी त्रुटी नहीं करते सर्वदा गुरुकी आज्ञा पालनमें ही लगे रहते हैं गुरुकी आज्ञाको पूर्णरीतिसे समझने और उसपर चलनेवाले पुरुष, पारखपदको प्राप्त होकर, सत्यपदको पहचान लेते हैं, ऐसेही मनुष्य अपना तन मन धन सब सत्यके लिये अर्पण करते हैं ।
मनमुख—वे लोग हैं जो गुरु और गुरुकी वाणीका कुछ आदर नहीं करते जो मनमें आता है वही करते हैं । ऐसे पुरुष अव्यवस्थित चित्तके होते हैं इसी कारण स्वेच्छाचारी तथा दूषित हृदयके भी होते हैं । मनमुख मान बड़ाई और वृथा अभिमानसे ग्रस्त होते हैं ।
दोनोंके कृत्य—गुरुमुख ईश्वर पूजक है और मनमुख बुत्तपरस्त है गुरुमुख