कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
by युगल आनंद विहारी
Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)
About this granth
Kabir Krishna Gita (कबीरकृष्णगीता) is a Kabirpanthi text in which Krishna and other Puranic figures proclaim the greatness of Kabir and of the True Name (satyanam). Its title page calls it the first volume of the Kabir Darshan Granthamala, compiled by Swami Yugalanand Vihari, 'Bharat Pathik', associated with the Hazuri Mahant Shri Yugaldas of Kabir Dharmanagar and known for restoring Kabirpanthi texts.
Its episodes include the court of Dharmaraja, the glory of the True Name, the story of King Chhatrajit, a dialogue between Narada and Krishna, Yama's messenger questioning Krishna about a devotee of Kabir, accounts of Satyaloka, the soul and Niranjan, the play of Kal and the way to escape it, a dialogue of Niranjan and Vishnu, Shukadeva's many births, King Nirmoh, the marks of a true guru, the Pandavas with Krishna, the sage Kapila, Vyasa asking Kabir to show him Satyaloka, and the way across the Kali age.
The book is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai; the copy scanned is the edition of September 2015. Its 168 pages help readers understand the Kabirpanth's own mythology and cosmology.
कबीरकृष्णगीता ।
१३९
कहैं ब्रह्मा हम सब बड भागी । उवरे चरण कबीरके लागी ॥
पायउं सुत्कको खान प्रवाना । जीवत सुत्क भये अज जाना ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो चतुरानन । सत्यनाम भज मन वच करमन ॥
एक आस सत्यनामकी कीरये । और आस सकलो परिहरिये ॥
सत्यनामते अधिक न कोई । सत्यनाम भज अविचलहोई ॥
अब तुम सुनहु लोक जत दूरी । गुरु ज्ञानीको हाल हजुरी ॥
निर्जनके सुखसे बाहर । सत्यलोक अमरपुर ठाहर ॥
सात तबक नभ सात पताल । चौदह यम विच जीव विहाला ॥
चौदह तबक चौदह यम ईशा । यमकी सेना रोम तन दीसा ॥
सिद्धदास सतनाम कबीरा । गज रथ यम सैना घर चीरा ॥
पृथ्वी उर्ध योजन लक्ष मेघा । तासु पुन नभतर विषेधा ॥
रवि उर्ध लक्ष योजन है चंद । चंद उर्ध तन नखत अनंदा ॥
तेइस लक्ष योजन उर्ध अपक्षरा । तेहि तत उर्ध सुरासन ठहरा ॥
सूर आस तत उर्ध यम साला । तेहि तत उर्ध निर्जन काला ॥
दोहा—ताके आगे तत दूरी, महाक्षेत्र सो नारि ।
तेहि तत मानसरोवर जहैं, कामनी रचि धमारि ॥
ताके आगे सहज सो दीपा । योगजीतके दीप सनीपा ॥
सबे दीप अग्र महकाई । घ्राण सुगंध सकल रहु छाई ॥
पुरुषलोक जाय सो हंसा । ताको तरे इकोतर बंसा ॥
ब्रह्मावचन ।
ब्रह्मा मम होय पगु धारा । कर जोरे भाभी स्तुति सारा ॥
कहैं ब्रह्मा धन्य कृष्ण व्यासा । जिन कियो प्रगट कबीर प्रकाशा
महादेव और कबीर सम्वाद - योगका वर्णन
१४०
कबीररुणगीता ।
कहैं अज सत्यकबीर संवादी । हम सब शिशु क्रीतमलघुवादी ॥
अन चीन्है हम बाद बहु कीन्हा । बरुसहु सत्यकबीर प्रवीना ॥
अब तो शरण तुम्हारी आये । यम अवगुण क्षमा प्रभु लाये ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो अज वाणी । मात पिता शिशु घट नहिं यानी ॥
जो हम क्रोध करो तुव सबपर । को तोहिराख सके अज हरिहर ॥
तुन तीनोंके पितु महकाला । निराकार सब करे विहाला ॥
हम तुम सबको प्रथम चेतावा । गहो शरण होय जिव सुत्कावा ॥
तब तुम गर्भवासमहैं भूले । ताते फिर २ योनी झूले ॥
जब सिर टेकेउ ऋषिदेव कारा । तब कबीरके शरण पवैरा ॥
कबीरके नाम शरण प्रतापा । उलटहिं जाय कालहिं चांपा ॥
कहैं कबीर सुनहु तुम चित दे । हृदय कबीर नाम जप हितकै ॥
जो जेहि नाम सुमरे चितलाई । हृदय कबीर नाम लौलाई ॥
दोहा-निशि दिन सुमरहु नाम मम, यमते रहहु निसंक ।
शब्द निरख पंथ गवनहु, गुरु पितु जेहि न कलंक ॥
चरण चूम अज सीस चढाये । तत्क्षण रुद्र जो गमन लाये ॥
कहैं महादेव विनय बहूता । कहहु कबीर योग सतमता ॥
केतिक स्वास चले दिन राती । किम घर बरे तेल विन वाती ॥
केते हांथ धरती आकाशा । कौन देवको कहां निवासा ॥
केतिक नदी केतिक गिरवरतन । कौन सिंधुको गाय कहावन ॥
कौन अमावस कौन परीवा । कौन पुत्रवा कौन ग्रह धरिवा ॥
केतिक रुधिर कायाभैं आही । वगन ओंकार फेर कित आही ॥
पांच तचहैं काहे नामा । और पचीस नाम पंच बाभा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४१
काया माहिं कै अंस हैं ताता । सोकहु कै अंस आहिं तन माता ॥
कौन तत्त केहि जोनी साजा । योग भलाके भोगे राजा ॥
श्रुतुक मरे जरे तन क्षारा । परम पुरुष होय तनते न्यारा ॥
कौन देह धरि नरक भोगाई । को है सेवक लेय भिलाई ॥
चौदह सुवन कायामहैं काही । कहिये तन प्रचे मोहि पाही ॥
पांच सत्तका रंग कौन है । विन मंदिरका है सो कौन है ॥
कौन योगीको सिंगी बजावे । कौन आसन कौन विभूत रमावे ॥
काहेकी डिब्बी काहेका ढकना । कौन बेगाना को है अपना ॥
कौनसो चावल कौनसो दाली । कौनसी अगिन जात कहिवाली ॥
कौन कपिल को देवता आही । केतिक अनपा कहाँ जपाही ॥
विनती कर शिव पूछहिं भेऊ । कहैं कबीर सुनहु सब कोऊ ॥
योग यज्ञ तप तीर्थ कर्म काटा । यह मत चलि जिव बारह वाटा ॥
सार भक्त विन तरे न कोई । चहुं युग भक्ति श्रेष्ठ गुरु सोई ॥
कहैं कबीर सुन प्रेतके ईशा । गहहु देव पथ तारहु सीसा ॥
तुम सब लीन्ह पान परवाना । भक्ति चावल चित तज मम कामा ॥
एक २ अंश देहते काढहु । तेहि पितु सेव राख पितु बाढहु ॥
दोहा—अपनी अकित दुतिअन, सिरजा तीनो देव ।
बनिजा तीनो छट्टुर मिले, क्रीतम देव पितु सेव ॥
छै सौ बीस सहस्र इकईसा । येतिक स्वास दिवस निशि ईसा ॥
मनु पवनाको धायियो तारी । विना तेल औ दीपक वारी ॥
साठे तीन कर क्षीनीजहैंथा । आंगुर चार अकाशको माथा ॥
मल निकास बछ गनपत राजा । रिद्ध सिद्ध समसावत्री विराजा ॥
सकल सिद्ध मिल गुरुपद सेवा । गुरु विन गनपति भक्ति बहेवा ॥
१४२
कबीरकृष्णगीता ।
पृथ्वी तत्त्व तिष्ठत तेहि बारिज । पृथ्वी समान साध तेह कारिज ॥
सोह चतुरदल विधु सूरंगा । नाम बीच अजपा सोहंगा ॥
सोहंगका विन डोर कमला । जपे सो अमृत नाम दयाला ॥
षट्पत्रपद इंदी अस्थाना । बला सावित्री तहँवा जाना ॥
रजगुण पीत वरण सो पंकज । षट्सहस्र अजपातहँआपअज ॥
आप तच तहँ कीन्ह निवासा । विषै निरंजन काम यम फांसा ॥
केवल सो अष्टदल नील सुरंगा । विष्णु देवता लक्ष्मीसंगा ॥
सबगुण षट्सहस्र अजपा जप । सत्यनाम सम नहिँ कोइ तप ॥
वायु तत तहँ गांठ वंधानी । नाभचक पवना घर जानी ॥
कीतम घर तन पवन सोहंगा । आद अमर घर सदुरु संगा ॥
जाके बस सोहंग है भाई । सोई सत्यकबीर गोसाई ॥
दोहा--आद पवन सोहंग है, क्रीतम वायु तत पांच ।
जहांते सोहंग ऊपजा, कहैं कबीर सो सांच ॥
शिव शारदा दस हियकमला । स्फटिक वर्णअतिसोहेपदअमला
तेज तत वडवानल चितंगी । हृदय दरश गुरु सदुरु संगी ॥
षट्सहस्र अजपा तहँ होई । शिव सक्ती गुरु शिष्यधरसोई ॥
द्वादसदल पंकज कंठ अथर । तत अकाश त्रिगुण मनस धर ॥
अय परम शिव दस द्वादसी । स्वांतकीलक्ष्मीमहाविष्णुसंगवसी
एक सहस्र अजपा तहँ होई । सञ्ज रंग बरते पद सोई ॥
सञ्ज स्याम जेठ लघु भाई । सञ्ज रिस्वाम लखि जाई ॥
कंठ केवल दल षोडश पूरा । तहां वस्तु जिवसकलरंगसूरा ॥
अजपा छै सो नाम विहंगा । सुरत निरत सो सदुरु संगा ॥
भंवर गुफा दोय दल पद सोहा । परमहंस बसे नृप निरमोहा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४३
एक निरमोह सुरत सतनामा । दुतिय निरमोह कबीरशिष्यराभा
स्याम लालभी रंग सोहाई । अजपा सहस्र कबीर लखाई ॥
सहस्रकमलदलाझलमिलझलके । मन पवन झीर मानसरोवरसे ॥
सुरत कमलपर सट्टुर वासा । एक सहस्र अजपा प्रकाशा ॥
गुन गुहिंज निरगुण सरबादी । शब्दसरूप सुरत संग स्वादी ॥
वतिस पट्टम पत्र गुण गाना । सुखा कंबल गुरु दरश पयाना ॥
दलअसंख्यकोकरवलसो भूला । जेहि २विन शून्य २ अस्थूला ॥
असंख्यदलकंबलकेदेखहुआगे । सतसाहेब दसमे बढभागे ॥
सतसाहेब सतनाम कबीरा । कहै कबीर हम सकल शरीरा ॥
हंस हमार सकल भत ताते । जीवधातके निकट न जाते ॥
कहै कबीर सुनो वृषवासन । काया लखहु देवन जहँ आसन ॥
अट्ट कोट पर्वत तहँहाडा । नौ सौ नदी समानीजेहिभांडा ॥
ज्ञानहीन जिव रात अमावस । पूनम चाँद गहुजगतगुरुआवस ॥
गुरु सट्टुर कबीर मिल तरना । कलश सवांरहु रतन सुवरणा ॥
सवा हाथ नभको गगन घर । वरणहु एक २ सुन संकर ॥
पृथ्वी आप तेज वायु अकाशा । यही नाम पंच तत्व प्रकाशा ॥
और सुनहु पांचहुके भाजा । ताते जीवन पोत दो मरजा ॥
पृथ्वीतत्वकी सुनहु प्रकृती । गुरु प्रताप कहैं संतन जीती ॥
असत भेद नारि तुच रोमा । बंधु पंच यह पृथ्वी तत भोमा ॥
लाल भसेव सुकल सोभ सुनं । पंच बंधु वह आपकी सुनं ॥
वायु तत्तकी भारजा बोली । लिये पवन फिरे उठन खटोली ॥
गावन धावन बोलन अगोचर । अटवा नतसी प्राणन दूसर ॥
क्रीतम वायु पंचतत्त संग तेहि बंधु।तेहि मुख बैन बोले भज नंद ॥
१४४
कबीरकृष्णगीता ।
नासिका वाट आवे जाई । रमता राम स्थिर न रहाई ॥
स्थिर पुरुष सत्यनाम कबीरा । मरे न जरे न धरे शरीरा ॥
तेज तत्तकी बंधु कहाई । तृषा क्षुधा आलस जमुहाई ॥
निद्रा मिल पांचो तजे दासी । नाम भक्त विन यमकी फांसी ॥
लज्जा शंका हर्ष शोक मोहा । यह अकाश बंधु संदोहा ॥
कहे कबीर सांचा मोहि भावे । सांचा सो जो सद्गुरु गुण गावे ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर हम नाम लखाई । सद्गुरु विन कोइ सुक्ति न पाई ॥
मम भये शिव नाचन लागे । कर गहि हरको दुलारन लागे ॥
सुनहु शंभु पूछहु प्रचारई । इतना सुन नाचत हो भाई ॥
जो पूछेहु तेहि महाँ कछु बाकी । सो सुन लेहु मह पंथ ताकी ॥
दूत तुम्हार फिरहि संसारा । पुण्यहि पापी दोनो लै जारा ॥
महादेववचन ।
कहे महादेव सुन सतनामा । तुव सेवक जो हम तेहि कामा ॥
पाप पुण्य है त्रिगुण बाजी । बेद ठेल त्रिपतात्रिक साजी ॥
पाप पुण्य है यमके खेती । दया सत् प्रधारथ सुनेती ॥
हमहु चले कुपंथ ढर ताता । तापर प्रबल अष्टंगीमाता ॥
अपने पुत्रहि जो धर खाई । आनहिं कस छोडे भाई ॥
पितु आज्ञा हम बहु जिव चांपा । परे आन हमरे सिरपापा ॥
ताते शरण तुम्हारी आये । काल पितारे आप बचाये ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर भल होय सब केश । जरा मरण सतनाम निबेरा ॥
अब तुम जात भातु तन बूझहु । तन स्वासा स्वासा गम सुझहु ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४५
एकको लोहु एकको पानी । दौय मिल सिरजा विदेहनिस्सानी ॥
निहअक्षर निहतत्तसो निरगुण । अमी नीर विन कुंभक सरगुण ॥
सट्टुर शब्दसे खागी धरनी । उर्ध्व सुरत सोहंग परवनी ॥
पितुके बुंदसो हाड औ गूदा । मांस रक्त औ येद औजूदा ॥
पुन पितु अंस रुधिर तन तबलों । तबलहि तन श्रोनित जिव जबलों ॥
चार अंस तनमहँ पितुकेरा । पांच अंस माता वन घेरा ॥
एक अधिक माता गुण भयऊ। चित देखो पन सतगुण कियऊ ॥
पौन आगे परा चल पाछे । धरिया माहिँ तन कछनी कांछे ॥
पिता पौन ले सांचहि दारी । तब जिव परा परातम नारी ॥
आतम परमातप जिव संग। नांद बिंदु मिलना मत रंगा ॥
अब जो अंस सुनहु शिव आही। जे जननी सो जो इन होय खाही ॥
जेहि जननी तन पांच प्रकृती । रोम चाम नख दंत भगोती ॥
जत द्वार तन तत भग जानी । आद लिंग सोहंग बखानी ॥
आठो पहर करे रति सोई । आवागवन महा दुख होई ॥
जबलग अमरलोक नहि पहुँचे । आवागौन भग भोगि विगूचे ॥
भक्त करे तो बारहि नीकी । भक्त बिहून सकल जग फीकी ॥
कीतम निरंजन पितु मम आही। तनके मात पिता यह साही ॥
जीव सब सत्यनामके आही । सत्यकबीर सतनाम लखाही ॥
महादेववचन ।
कहैं शंखु संसे गढ़ मोरी । तुम दयाल मम बंदीछोरी ॥
अब साहेब कहु जीवत लेखा । कौन तत्त कोहि जोनि परेखा ॥
योगियोंके तत्त्वोंका वर्णन व मुक्तिका मार्ग
१४६
कबीरकृष्णगीता ।
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन उमापति ईशा । नरतन त्रिगुण पांच पचीसा ॥
चार खान महैं नर तन ईशा । सकल भेद जानहु जगदीशा ॥
नरपिंडज चौरासी नारा । नाम भक्त बिन यमके चारा ॥
पिंडज गौ गज चौपग पहिषा । अरना बाध सिंह बनगोहिषा ॥
श्वान मंजार अजिया सुत बीगा । पृथ्वी आप वाय तेज अंगा ॥
त्रिगुण भेराय सकल जिव दीन्हा । सतगुण रज तम भासे चीन्हा ॥
रजगुण बहु छल झूद परबंदा । रोग वियोग भोग यमदंडा ॥
मिथ्या बोल सोग संतापा । छुतहिँ छूत जिव छूतहिँ थापा ॥
वैष्णवसे नहिं नवीहिं अभागे । वैष्णवन असंखहिं द्विज नागे ॥
तिनहु भागह बड वैष्णो बखाना । जीव दया कथि जग पतिथाना ॥
बहुर युद्ध महाभारथ करावा । तब करता हरि धका दियावा ॥
कृष्ण सीस जब वसे कबीरा । तबलग्ण राम कृष्ण मत धीरा ॥
निरंजन अधा परवेसा । तब से कृष्ण कालकर भेसा ॥
दोहा—जबलग्ण जाकर नाम लिख्य, तब लहि तेह यह सोय
कहैं कबीर मोहिं सुमेर, एकमत सब सुख लोय ॥
पांच तीनकी काया कांची । अमरपुरी अमर तन सांची ॥
सतगुण सत्यकबीरके आसा । निरंजन अवा रज तम फांसा ॥
जैसे तुलसी भांमे राई । औ गुर राम तुलसी सार लाई ॥
रज तम गुंभा भांग बखाना । भांग महादेव अज गुमा जाना ॥
तुलसी विष्णु अंस विनाशी । औ अविनाशी कबीर सुखराशी ॥
दोहा—कहैं महादेव विष्णु अज, सुन सतनाम कबीर।
निराकार डहनसे, राख लेहु गुरु पीर ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४७
कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुनहु त्रिय देवा । सब मिल करहु साधुकी सेवा ॥
जगमहैं वैष्णव भेष मम दासा । प्रेमवस भये ताके पास ॥
सत रज तम जिव सबहैं मेरा । अभष पंथ राक्षस जिव चेरा ॥
वीज वंस तेहि रहे न कोई । मीन गऊ वध जत जिव खोई ॥
सतगुणको सो भाव बखानी । रज तम तज सतपंथ चल्लानी ॥
सत्य दया पर आतम पूजा । सदुरु साथ चरण मन बूझा ॥
सकल देव मिल निरगुण नामा । कबीर अंस तन रमता रामा ॥
सबसे प्रेम क्षमा धीरज तन । अपने जानत न दुखवैं काहु मन ॥
कौनहु जीव जंतु न दुखवैं । समष्टी निज सबपर भावे ॥
काहूके तन मांस न खाई । मीन मास मद निकट न जाई ॥
वृत्त मिष्टान्न पान फुलवारी । यह सब सात्वकी भक्ष विचारी ॥
अभ्यागत आवे कोइ बरणा । सबकर पोषन सब मिल करना ॥
सात्वकी चाल मुक्त नर नारी । रज तम भौ सब भ्रम संसारी ॥
भक्षित भाव गलतान लिय नामा । परनारी द्रव्य अपंथ कर कामा ॥
कच्छ मच्छ सकलो जिवजंता । सब जिव परा क्षमा शुभ संता ॥
तीर्थ व्रत तप त्रिगुण जोगा । बनोवास अधर्म तज भोगा ॥
भोग सात्वकी भजन सतनामा । इच्छा दशा समर्थ निहकामा ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण पुलकित होय वाणी । सत्य कबीर तुमहिं सुख खानी ॥
हम सब कहैं तुम दीन्ह बढाई । आप दास होय सेवा लाई ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर बडेकी रीती । सब जिव पोषव सबसे प्रीती ॥
त्रिगुणका प्रभाववर्णन
१४८
कबीरकृष्णगीता ।
बमन दीनता लघुता माती । पतिव्रता सब लाब तेहि क्रांती ॥
सद्गुरु नाम कबीर अटोटा । कबीर कंथ भज कछु नहिं टोटा ॥
विष्णुवचन ।
कहे कृष्ण अज हर शुक्र व्यासा । अब सद्गुरु कहिय तथासा ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर तमगुणके लक्षण । दरिद्री भिखारी क्रोध यत तिक्ष्ण
मारन मरन राते षट् उरमा । सत्य नाम भजे सो जिवघरमा ॥
सत्यनाम सो अम्बर काया । जगमग जीत सो अंस सुहाया ॥
अमरलोक सो अटल रहाहीं । जीव दया वद जग प्रगटाहीं ॥
असुरहिं साथ चतुर सुख साखा । रज तम भक्त असुर जग लाखा
सुगुप्त मोह बस तक्षक भासा । राक्षसी भोजन पेत पिशाचा ॥
विष्णु भक्तके दोह कराहीं । शिव जोगी सिष साथे नाहीं ॥
और कहे शिव जोगी सिध्या । कलयुगद्विज मिल शिव शिष्यगिधा
मीन मास मद भष गिद्ध भाना । मीन मास मद है अब खाना ॥
चोरी और करहिं बटपारी । झूठा लंपट चुगल जुवारी ॥
षट् उर मास रसके संगी । रज तम शिष कुपंथ अभंगी ॥
छीन सतगुण रज तम बहुताई । यहि जीवको ढर विचल न जाई ।
नहिं विचलहिं सतगुरुजेहिमाहीं । सच चीन्ह रज तम मिन डाहीं ॥
सचहिं दिन २ बाढ सवाई । गुरु साथ विमुख यम खाई ॥
दिना चार कलि श्रेष्ठ मलेच्छा । झष भखहिं गौ भखहिं अभक्षा ॥
जहँ लग अवगुण रज तम जानो । सतगुण रज तम चाल बखानो ॥
रज तम आधार ते वैष्णव नाहीं । वैष्णव सतकबीर सतगुणमाहीं
हमरे दासहिं जो कोइ मनिहै । तेहि सुख होय यम नहिं दहिहै ॥
सत्य भक्ति तथा योग भोगका वर्णन
कबीरकृष्णगीता ।
१४९
एक २ रोम वैष्णव सतोगुण । रज तम देवी पंथहै दुर्जन ॥
यह सब तन वैष्णव तन दूजा । रज तम देवी पंथ अरुझा ॥
जो नहिं संतहि माने भाई । झूठहिं थाप नरकमें जाई ॥
जन्मे घरे सो क्रीतम झूठा । अजर स्वास जिव संतन दूठा ॥
सत्यकबीर अजर अविनाशी । सत्यकबीर जो करे हुलासी ॥
दुलह कबीर अमर सुखरासी । दुलहिन जीव अमरघरवासी ॥
देह धरे भौ जिव चकलागा । खसम विसार जार मन वागा ॥
धगरा मनमत त्रिगुण निरंजन । खसम कबीर काल सिरभंजन ॥
जै जै स्वामी सत्य कबीर । स्तुति करें त्रिय देव सो धीर ॥
तीनों कहे हम तरे तुव दाय। मुक्त परवाना कबीर सिरवाया ॥
अगले हंसन वाट चिन्हाई । सर्व शास्त्र दाय। फरमाई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण यह निश्चय जानी । मुक्ति कबीर चरण लपटानी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । सांची भक्ति विना गत खोई ॥
सांच भक्ति गुरु साध विश्वास। भैरों भूत देवी यमफांसा ॥
कहैं कबीर सुन वृषभ सवारी । प्रच्छेहु प्रथम सो लेहु निरवारी ॥
सब योनिन तत गुण क्रीत विवरण । पांचतीन एक मिलनर जोहतन
पिंडज चार तत्त नभ त्यागी । और सकल नभहि ते लागी ॥
अबूज तीनते पृथ्वी वाई । उषमज दोय तत्त तेज औवाई ॥
एक तत्त अंकुर दलको थेका । पांच तत्त नर शब्द विवेका ॥
चार खान रचि त्रिगुण अछंगी । एक जीव तनका चित्रभंगी ॥
जोग भोग दोउ रोग समाना । नाम भक्त चहुँ युग निरवाना ॥
विशदका स्वरूप कथन
१५०
कबीरकृष्णगीता ।
पांच तीन बस तन अघखानी । सट्टरु सेव हंस पिल जानी ॥
तन विदेह विन घरको भवन है । पांच तत्त यन कहांसोरंगहै ॥
यथयम कहेउं पंच सैल ततुरंगा । सुन भूलेहु तुम खाहु बहु भंगा ॥
योगी सोहंग तन सिंगी बजावे । सहज आसन तन विभूत रभावे ॥
हटताई दिब्बी अमीगत ठपना । सबे विगाना सट्टरु अपना ॥
चावल प्रीत चेतन दिल दाला । ब्रह्म अगिन कमल परजाला ॥
निरगुण नाम निमक सो सब रस। तेज पात विश्वास सो अदरख ॥
प्रेम सुचित सो घीव जीवन । काया क्षीर यथे कोई गुरुजन ॥
पारस पान प्रसाद चढाये । अमी नीर कबीर पियाये ॥
दया दही गऊ घृत सुच दूधा । खोवा काम क्रोध घर सोधा ॥
गरस प्रसाद विरान सुरत सेवक । शुभ आशिष देहिं गुरुदेवक ॥
अजर अमर घर वर मिल आशिष । पिया रूपरस जगमें अतिसुन ॥
पिष हिय पैठि सेवककेरा । जन्म मरनका करे नवेरा ॥
भया निवेरा सो कस हूवा । पांच पचीस त्रिगुन तन जूवा ॥
अजर अमर अविचल सो काया । अमर लोक सबे सुख पाया ॥
कहैं कबीर छूटेउ सब संसा । तरे इकोतर पिछले वंसा ॥
सट्टरु शरण हाथिगत पुरुषा । खसम कबीरहिं लखेन न सुरखा ॥
कहैं कबीर तन भुवन चतुर्दश । चौदह संग चालक जीव सर्वसा ॥
चौदह संग जब बाहर होई । सत कहे सट्टरु शरण समोई ॥
अजरलोक पगु अधर बखाना । निज पगु अरध चितल परजाना ॥
तीन लोक उरध तेह ताको । लोक तलातल जंघ अस्थापो ॥
लोक माहिं तल इंदुकी वारी । मलस्थान रसातल खारी ॥
कटि पताललोक विस्तारा । सान दीप नभ अधर उचारा ॥
चौदह यमका वर्णन व ग्रंथसमाप्ति
कबीरकृष्णगीता ।
१५१
इंद्र सप्त दीप भुवलोके नाभी स्थानी । नामके वाम दहिने भै जानी ॥
रवर्गलोक हृदय अस्थापी । अमर लोक तन दोउ सुज दापी ॥
कंठ स्थान आहि जनलोक । हे पतलोक खिलोट विसोका ॥
कीतम सत्यलोक नर माथा । आद सतलोक अमरपुर ताका ॥
कुल अंगुष्ठ बुढ़ा पगु पाहीं । नाडि सकल सेस परवाहीं ॥
निज सुख देखहु तीनों लोका । रसना उर्ध सरम पंथ मोका ॥
रसना मृत्युलोक कोई थिर नाहीं । जिदा जग प्रगट रहाकोइ न माहीं
रसना अरध पतालके सो साता । अष्ट घात पिंजरा जिवराता ॥
निराकार प्रबल मंजारा । सत्यनाम विन तेहि दै मारा ॥
अष्टंगी मंजारी खोटी । तीन लोक जिव खायसि घोटी ॥
कहै कबीर जिन सुमरो मोही । यम सिर भंजन बचायेउ बोही ॥
चौदह यम तन जीवहि घेरा । चौदह यमका करो निवेरा ॥
प्रथमहि धर्म करे यम घाता । धर्मराय यम इस मन माता ॥
दुतिय काम त्रितय यम कोधा । चौथे लोभ पंचये भ्रम सोधा ॥
छठयै यम लक्ष बुध विकारा । सतयै परधन हर सत हारा ॥
अठयै अहंकार नौमै मोहा । दसयै दस इंद्दी सुख जोहा ॥
इकादसे आप तन पोषा । अश्यागत तज खाय न मोषा ॥
द्वादसयै लेय विश्वास घाती । त्रियदस तृष्णा लोभ जमाती ॥
चतुर्दश चिंता तन बन आगी । चिंताहि डाह कोई वैरागी ॥
चिंता सोइ जो सट्टर सेवा । सट्टर सब देवनकर देवा ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण निरने निरवारा । सत्यकबीर औ तारनहारा ॥
हम सब मगन कबीरके पाछे । हमार निवाह कबीरकृत आछे ॥
१५२
कबीरकृष्णगीता ।
चारों युग कबीर मोहि रासा । कहैं कृष्ण व्यास सत भाषा ॥
पूछहिं तारा अकाश घर स्वामी । कहैं सदुरु नखत निधायी ॥
केतिक तारा आहिं अकाश । कौन वरण तारागण भाषा ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर तारा यम रोवा । प्रबल निरंजन यम जिव हुवा ॥
उतरो याही यमकी काया । दिये छिटकाय रैन नम याया ॥
होत प्रात फिर सुन्य समाई । सात तबकके पार सो जाई ॥
सुन्य समाय रहा धर ध्याना । दिन गत बहुरि रैन प्रगटना ॥
रैन निरंजन दिवस कबीरं । सूर निरंजन शशि सत धीरं ॥
अनंत कोट उडगण तनवारा । चौदह योजन गोछ निराकार ॥
गोछ वीर जीवहिं दे सूरि । कबीरके भक्त करे भौभूरी ॥
दोहा-श्रीकृष्ण त्रिय देव मिल, स्तुति कराहिं अपार ।
सुखदेव व्यास सब विनवहीं, जै जै कबीर विचार ॥
कबीर काल सिर भंजन, और मुक्त देहिं जीव ।
विष्णु व्यास सत कहत हैं, सत्यकबीर निज पीव ।
इति श्रीकबीरकृष्णगीता समाप्ता ।
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