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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

Devanagarihipublished168 pages

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कबीरकृष्णगीता ।

चारों युग कबीर मोहि रासा । कहैं कृष्ण व्यास सत भाषा ॥
पूछहिं तारा अकाश घर स्वामी । कहैं सदुरु नखत निधायी ॥
केतिक तारा आहिं अकाश । कौन वरण तारागण भाषा ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर तारा यम रोवा । प्रबल निरंजन यम जिव हुवा ॥
उतरो याही यमकी काया । दिये छिटकाय रैन नम याया ॥
होत प्रात फिर सुन्य समाई । सात तबकके पार सो जाई ॥
सुन्य समाय रहा धर ध्याना । दिन गत बहुरि रैन प्रगटना ॥
रैन निरंजन दिवस कबीरं । सूर निरंजन शशि सत धीरं ॥
अनंत कोट उडगण तनवारा । चौदह योजन गोछ निराकार ॥
गोछ वीर जीवहिं दे सूरि । कबीरके भक्त करे भौभूरी ॥

दोहा-श्रीकृष्ण त्रिय देव मिल, स्तुति कराहिं अपार ।

सुखदेव व्यास सब विनवहीं, जै जै कबीर विचार ॥

कबीर काल सिर भंजन, और मुक्त देहिं जीव ।

विष्णु व्यास सत कहत हैं, सत्यकबीर निज पीव ।

इति श्रीकबीरकृष्णगीता समाप्ता ।