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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

Devanagarihipublished168 pages

सत्यलोकके हंसोंके रूपका वर्णन

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१३६

कबीरकृष्णगीता ।

कृष्णवचन ।

इतना सुन कृष्ण कबीरपहँ हेरा । तब कबीर भगटे तेहि बेरा ॥

सत्यनाम कहि शब्द उचारा । अडुत लीला कला विस्तारा ॥

सोभा लोक रोम एक प्रगटा । अडुत चंद सूर भौ घटा ॥

दोहा-सिंहासन पर बैठे, सट्टरु सत्यकबीर ।

अमित कला छबिको कहे, अडुत हंस मन हीर ॥

धन्य भाग्य वैकुंठके, जहँ प्रगटे सत्यनाम ।

सट्टरु देव अनंदही, रजगुण तमगुण धाम ॥

कला गुप्त किये सत्यकबीरा । जैसेको तैसे यतधीरा ॥

सबे देव थरहर पग लागे । परसत चरण सकल भगभागे ॥

अजहरवचन ।

अजहर सबे कहे हरसेती । सबे शरण गहो यही सुनेती ॥

दोहा-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सबन कृष्ण समुझाय ।

फिर यह अवसर कहाँ मिले, गहो कबीरके पाँव ॥

हरषत अजहर लीन्हो पाना । नारि पुरुष एक मत निरवाना ॥

चरणाभूत सबहिन कहँ दीन्ह। सबन माँग प्रीतिसो लीन्ह। ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर सुनो त्रियदेवा । आपन अंस रचहु जग सेवा ॥

ठीका पुरे तुम लोक सिधावो । पितुके सेवा अंस बैठावो ॥

सट्टरु भाकि हृदय महँ राखहु । मात पिता सेवा सत भाषहु ॥

माता पिता सबे भल होई । सट्टरु सेय तरे कुल दोई ॥

काम क्रोध आपा घट काढव । सेवा साध सखा घर बाढव ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

१३७

कहैं कबीर सत्यकी चाली । तरे शिष्य ठागे सुर नाली ॥
सत्य कहे होय कारज जिवके । सत्य गहे मिलिहै निज पियके ॥

दोहा-सत्य ताहि कहैं कहिये, रती न मिथ्या जाहि ।

कहैं कबीर कृष्णगीता, विष्णु व्यास चित चाहि ॥

कहैं कबीर सुनो सब कोई । भाषों काया प्रचे सोई ॥
काया सो जो अमर ना रहई । जिवरा योनी नहि औतरई ॥
षोडश शशि सोहंसन भाला । चकित चंद है कलात्रियभाळा ॥
यनिमाली कंठ माल विराजे । कोटिन रवि शशि नखछविछाजे ॥
छत्र सिंहसन जगमग जोती । हंस खान शशि तिहुँ पुर पोती ॥
अमरलोक सो अमर हंसा । अमृतफल भोजन निहंससा ॥
अमर चीर तन विमल विराजे । देह सुवास प्राणमें छाजे ॥
श्वेत भंवर पंकज विन नाला । अभी सिंधुतट कुंज रिसाला ॥
कमोदनि विमलश्वेत उजियारी । मन पृथ्वी तन फल फुलवारी ॥
विमल सुगंध विटप फलपाता । पक्षी केलिकरें रंग राता ॥
त्रिधि विहंगम मय कर जूहा । चंद उदै फल फूल सबूहा ॥
विहसहि हंस महा रस खानी । दसनपांति मन जगमग वाणी ॥
काया अमर सुगंध अंजोरा । योजन शत सुवास धनघोरा ॥
हंस काया अस अमरलोक । परस पुरुष पद हंस निसोका ॥
यह शोभा संक्षेप वखाना । अद्भुत शोभा अकह अंमाना ॥
सत्यनामका लेय परवाना । निराकारका मर्दन माना ॥
सो पावे यह काया भाई । कहैं कबीर जिन मोहि लौलाई ॥
कोट सूर्य छवि हंसन काया । बहुत अंजोर संक्षेप सुनाया ॥

ब्रह्मा और कबीर सम्वाद - लोक द्वीपका वर्णन

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१३८

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-सत्यनामके एक रोम छवि, तुले न कोटि अनंत ।
अदुत शोभा कह कहों, कोट अनंत सूर चंद ॥
शीतल रवि सतलोक मझारा । अगिनसूरज भयो तब निराकारा
अगिनको रास निरंजन काया । अभितरास पुरुष पगु छाया ॥
हंसन काया कंचन सूंचा । कोटिन रवि विधि सरिस न पहुँचा
विष्णुके काया कंचन आभा । जैसे अन्नके अगुवा भाभा ॥
स्याम भये हरि पितके खोजा । अरि विष झार स्यामतन बोजा ॥
ब्रह्मा ताम रुद्र तन लोहा । लरगा इंद्रका मत फंद मोहा ॥
प्रेत खान विष्टाके देहा । नरक देह नर नार उरेहा ॥
चौरासी लक्ष योनी खानी । नरककी नार सो अंकुर जानी ॥
कोइ एक हंस अंकुरी होई । अंकुर पावहिँ अभिष न जोई ॥
अंकुरी जो भजे सतनामा । तो सब सुधरे वाको काया ॥
सत्यनाम कबीर बखाना । कहैं जनार्दन वचन प्रवाना ॥

विष्णुवचन ।

कहैं विष्णु सुन नारद व्यासा । नाम कबीर भजो सुखरासा ॥

दोहा-सकल जीव गायत्री, बांध निरंजन राय ।

सत्यकबीर सो रक्षक, कहैं कृष्ण समुझाय ॥

ब्रह्मावचन ।

ब्रह्मा कहैं सीस सुई लाई । सत्यकबीर मोहिँ कहहु बुवाई ॥

केतिक दूर आहि सतलोक । जहां रहहिँ सब हंस निसोका ॥

सत्यकबीर सत्यपुरुष अमाना । न्यारा सबसे सकल अमाना ॥

अजर अमर सत्पुरुष अजावन । जिन भज सतकबीर गुरुपावन ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

१३९

कहैं ब्रह्मा हम सब बड भागी । उवरे चरण कबीरके लागी ॥
पायउं सुत्कको खान प्रवाना । जीवत सुत्क भये अज जाना ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो चतुरानन । सत्यनाम भज मन वच करमन ॥
एक आस सत्यनामकी कीरये । और आस सकलो परिहरिये ॥
सत्यनामते अधिक न कोई । सत्यनाम भज अविचलहोई ॥
अब तुम सुनहु लोक जत दूरी । गुरु ज्ञानीको हाल हजुरी ॥
निर्जनके सुखसे बाहर । सत्यलोक अमरपुर ठाहर ॥
सात तबक नभ सात पताल । चौदह यम विच जीव विहाला ॥
चौदह तबक चौदह यम ईशा । यमकी सेना रोम तन दीसा ॥
सिद्धदास सतनाम कबीरा । गज रथ यम सैना घर चीरा ॥
पृथ्वी उर्ध योजन लक्ष मेघा । तासु पुन नभतर विषेधा ॥
रवि उर्ध लक्ष योजन है चंद । चंद उर्ध तन नखत अनंदा ॥
तेइस लक्ष योजन उर्ध अपक्षरा । तेहि तत उर्ध सुरासन ठहरा ॥
सूर आस तत उर्ध यम साला । तेहि तत उर्ध निर्जन काला ॥

दोहा—ताके आगे तत दूरी, महाक्षेत्र सो नारि ।

तेहि तत मानसरोवर जहैं, कामनी रचि धमारि ॥
ताके आगे सहज सो दीपा । योगजीतके दीप सनीपा ॥
सबे दीप अग्र महकाई । घ्राण सुगंध सकल रहु छाई ॥
पुरुषलोक जाय सो हंसा । ताको तरे इकोतर बंसा ॥

ब्रह्मावचन ।

ब्रह्मा मम होय पगु धारा । कर जोरे भाभी स्तुति सारा ॥
कहैं ब्रह्मा धन्य कृष्ण व्यासा । जिन कियो प्रगट कबीर प्रकाशा

महादेव और कबीर सम्वाद - योगका वर्णन

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१४०

कबीररुणगीता ।

कहैं अज सत्यकबीर संवादी । हम सब शिशु क्रीतमलघुवादी ॥
अन चीन्है हम बाद बहु कीन्हा । बरुसहु सत्यकबीर प्रवीना ॥
अब तो शरण तुम्हारी आये । यम अवगुण क्षमा प्रभु लाये ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो अज वाणी । मात पिता शिशु घट नहिं यानी ॥
जो हम क्रोध करो तुव सबपर । को तोहिराख सके अज हरिहर ॥
तुन तीनोंके पितु महकाला । निराकार सब करे विहाला ॥
हम तुम सबको प्रथम चेतावा । गहो शरण होय जिव सुत्कावा ॥
तब तुम गर्भवासमहैं भूले । ताते फिर २ योनी झूले ॥
जब सिर टेकेउ ऋषिदेव कारा । तब कबीरके शरण पवैरा ॥
कबीरके नाम शरण प्रतापा । उलटहिं जाय कालहिं चांपा ॥
कहैं कबीर सुनहु तुम चित दे । हृदय कबीर नाम जप हितकै ॥
जो जेहि नाम सुमरे चितलाई । हृदय कबीर नाम लौलाई ॥
दोहा-निशि दिन सुमरहु नाम मम, यमते रहहु निसंक ।

शब्द निरख पंथ गवनहु, गुरु पितु जेहि न कलंक ॥

चरण चूम अज सीस चढाये । तत्क्षण रुद्र जो गमन लाये ॥
कहैं महादेव विनय बहूता । कहहु कबीर योग सतमता ॥
केतिक स्वास चले दिन राती । किम घर बरे तेल विन वाती ॥
केते हांथ धरती आकाशा । कौन देवको कहां निवासा ॥
केतिक नदी केतिक गिरवरतन । कौन सिंधुको गाय कहावन ॥
कौन अमावस कौन परीवा । कौन पुत्रवा कौन ग्रह धरिवा ॥
केतिक रुधिर कायाभैं आही । वगन ओंकार फेर कित आही ॥
पांच तचहैं काहे नामा । और पचीस नाम पंच बाभा ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

१४१

काया माहिं कै अंस हैं ताता । सोकहु कै अंस आहिं तन माता ॥
कौन तत्त केहि जोनी साजा । योग भलाके भोगे राजा ॥
श्रुतुक मरे जरे तन क्षारा । परम पुरुष होय तनते न्यारा ॥
कौन देह धरि नरक भोगाई । को है सेवक लेय भिलाई ॥
चौदह सुवन कायामहैं काही । कहिये तन प्रचे मोहि पाही ॥
पांच सत्तका रंग कौन है । विन मंदिरका है सो कौन है ॥
कौन योगीको सिंगी बजावे । कौन आसन कौन विभूत रमावे ॥
काहेकी डिब्बी काहेका ढकना । कौन बेगाना को है अपना ॥
कौनसो चावल कौनसो दाली । कौनसी अगिन जात कहिवाली ॥
कौन कपिल को देवता आही । केतिक अनपा कहाँ जपाही ॥
विनती कर शिव पूछहिं भेऊ । कहैं कबीर सुनहु सब कोऊ ॥
योग यज्ञ तप तीर्थ कर्म काटा । यह मत चलि जिव बारह वाटा ॥
सार भक्त विन तरे न कोई । चहुं युग भक्ति श्रेष्ठ गुरु सोई ॥
कहैं कबीर सुन प्रेतके ईशा । गहहु देव पथ तारहु सीसा ॥
तुम सब लीन्ह पान परवाना । भक्ति चावल चित तज मम कामा ॥
एक २ अंश देहते काढहु । तेहि पितु सेव राख पितु बाढहु ॥
दोहा—अपनी अकित दुतिअन, सिरजा तीनो देव ।
बनिजा तीनो छट्टुर मिले, क्रीतम देव पितु सेव ॥
छै सौ बीस सहस्र इकईसा । येतिक स्वास दिवस निशि ईसा ॥
मनु पवनाको धायियो तारी । विना तेल औ दीपक वारी ॥
साठे तीन कर क्षीनीजहैंथा । आंगुर चार अकाशको माथा ॥
मल निकास बछ गनपत राजा । रिद्ध सिद्ध समसावत्री विराजा ॥
सकल सिद्ध मिल गुरुपद सेवा । गुरु विन गनपति भक्ति बहेवा ॥

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१४२

कबीरकृष्णगीता ।

पृथ्वी तत्त्व तिष्ठत तेहि बारिज । पृथ्वी समान साध तेह कारिज ॥
सोह चतुरदल विधु सूरंगा । नाम बीच अजपा सोहंगा ॥
सोहंगका विन डोर कमला । जपे सो अमृत नाम दयाला ॥
षट्पत्रपद इंदी अस्थाना । बला सावित्री तहँवा जाना ॥
रजगुण पीत वरण सो पंकज । षट्सहस्र अजपातहँआपअज ॥
आप तच तहँ कीन्ह निवासा । विषै निरंजन काम यम फांसा ॥
केवल सो अष्टदल नील सुरंगा । विष्णु देवता लक्ष्मीसंगा ॥
सबगुण षट्सहस्र अजपा जप । सत्यनाम सम नहिँ कोइ तप ॥
वायु तत तहँ गांठ वंधानी । नाभचक पवना घर जानी ॥
कीतम घर तन पवन सोहंगा । आद अमर घर सदुरु संगा ॥
जाके बस सोहंग है भाई । सोई सत्यकबीर गोसाई ॥

दोहा--आद पवन सोहंग है, क्रीतम वायु तत पांच ।

जहांते सोहंग ऊपजा, कहैं कबीर सो सांच ॥

शिव शारदा दस हियकमला । स्फटिक वर्णअतिसोहेपदअमला
तेज तत वडवानल चितंगी । हृदय दरश गुरु सदुरु संगी ॥
षट्सहस्र अजपा तहँ होई । शिव सक्ती गुरु शिष्यधरसोई ॥
द्वादसदल पंकज कंठ अथर । तत अकाश त्रिगुण मनस धर ॥
अय परम शिव दस द्वादसी । स्वांतकीलक्ष्मीमहाविष्णुसंगवसी
एक सहस्र अजपा तहँ होई । सञ्ज रंग बरते पद सोई ॥
सञ्ज स्याम जेठ लघु भाई । सञ्ज रिस्वाम लखि जाई ॥
कंठ केवल दल षोडश पूरा । तहां वस्तु जिवसकलरंगसूरा ॥
अजपा छै सो नाम विहंगा । सुरत निरत सो सदुरु संगा ॥
भंवर गुफा दोय दल पद सोहा । परमहंस बसे नृप निरमोहा ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

१४३

एक निरमोह सुरत सतनामा । दुतिय निरमोह कबीरशिष्यराभा
स्याम लालभी रंग सोहाई । अजपा सहस्र कबीर लखाई ॥
सहस्रकमलदलाझलमिलझलके । मन पवन झीर मानसरोवरसे ॥
सुरत कमलपर सट्टुर वासा । एक सहस्र अजपा प्रकाशा ॥
गुन गुहिंज निरगुण सरबादी । शब्दसरूप सुरत संग स्वादी ॥
वतिस पट्टम पत्र गुण गाना । सुखा कंबल गुरु दरश पयाना ॥
दलअसंख्यकोकरवलसो भूला । जेहि २विन शून्य २ अस्थूला ॥
असंख्यदलकंबलकेदेखहुआगे । सतसाहेब दसमे बढभागे ॥
सतसाहेब सतनाम कबीरा । कहै कबीर हम सकल शरीरा ॥
हंस हमार सकल भत ताते । जीवधातके निकट न जाते ॥
कहै कबीर सुनो वृषवासन । काया लखहु देवन जहँ आसन ॥
अट्ट कोट पर्वत तहँहाडा । नौ सौ नदी समानीजेहिभांडा ॥
ज्ञानहीन जिव रात अमावस । पूनम चाँद गहुजगतगुरुआवस ॥
गुरु सट्टुर कबीर मिल तरना । कलश सवांरहु रतन सुवरणा ॥
सवा हाथ नभको गगन घर । वरणहु एक २ सुन संकर ॥
पृथ्वी आप तेज वायु अकाशा । यही नाम पंच तत्व प्रकाशा ॥
और सुनहु पांचहुके भाजा । ताते जीवन पोत दो मरजा ॥
पृथ्वीतत्वकी सुनहु प्रकृती । गुरु प्रताप कहैं संतन जीती ॥
असत भेद नारि तुच रोमा । बंधु पंच यह पृथ्वी तत भोमा ॥
लाल भसेव सुकल सोभ सुनं । पंच बंधु वह आपकी सुनं ॥
वायु तत्तकी भारजा बोली । लिये पवन फिरे उठन खटोली ॥
गावन धावन बोलन अगोचर । अटवा नतसी प्राणन दूसर ॥
क्रीतम वायु पंचतत्त संग तेहि बंधु।तेहि मुख बैन बोले भज नंद ॥

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१४४

कबीरकृष्णगीता ।

नासिका वाट आवे जाई । रमता राम स्थिर न रहाई ॥
स्थिर पुरुष सत्यनाम कबीरा । मरे न जरे न धरे शरीरा ॥
तेज तत्तकी बंधु कहाई । तृषा क्षुधा आलस जमुहाई ॥
निद्रा मिल पांचो तजे दासी । नाम भक्त विन यमकी फांसी ॥
लज्जा शंका हर्ष शोक मोहा । यह अकाश बंधु संदोहा ॥
कहे कबीर सांचा मोहि भावे । सांचा सो जो सद्गुरु गुण गावे ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर हम नाम लखाई । सद्गुरु विन कोइ सुक्ति न पाई ॥
मम भये शिव नाचन लागे । कर गहि हरको दुलारन लागे ॥
सुनहु शंभु पूछहु प्रचारई । इतना सुन नाचत हो भाई ॥
जो पूछेहु तेहि महाँ कछु बाकी । सो सुन लेहु मह पंथ ताकी ॥
दूत तुम्हार फिरहि संसारा । पुण्यहि पापी दोनो लै जारा ॥

महादेववचन ।

कहे महादेव सुन सतनामा । तुव सेवक जो हम तेहि कामा ॥
पाप पुण्य है त्रिगुण बाजी । बेद ठेल त्रिपतात्रिक साजी ॥
पाप पुण्य है यमके खेती । दया सत् प्रधारथ सुनेती ॥
हमहु चले कुपंथ ढर ताता । तापर प्रबल अष्टंगीमाता ॥
अपने पुत्रहि जो धर खाई । आनहिं कस छोडे भाई ॥
पितु आज्ञा हम बहु जिव चांपा । परे आन हमरे सिरपापा ॥
ताते शरण तुम्हारी आये । काल पितारे आप बचाये ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर भल होय सब केश । जरा मरण सतनाम निबेरा ॥
अब तुम जात भातु तन बूझहु । तन स्वासा स्वासा गम सुझहु ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

१४५

एकको लोहु एकको पानी । दौय मिल सिरजा विदेहनिस्सानी ॥
निहअक्षर निहतत्तसो निरगुण । अमी नीर विन कुंभक सरगुण ॥
सट्टुर शब्दसे खागी धरनी । उर्ध्व सुरत सोहंग परवनी ॥
पितुके बुंदसो हाड औ गूदा । मांस रक्त औ येद औजूदा ॥
पुन पितु अंस रुधिर तन तबलों । तबलहि तन श्रोनित जिव जबलों ॥
चार अंस तनमहँ पितुकेरा । पांच अंस माता वन घेरा ॥
एक अधिक माता गुण भयऊ। चित देखो पन सतगुण कियऊ ॥
पौन आगे परा चल पाछे । धरिया माहिँ तन कछनी कांछे ॥
पिता पौन ले सांचहि दारी । तब जिव परा परातम नारी ॥
आतम परमातप जिव संग। नांद बिंदु मिलना मत रंगा ॥
अब जो अंस सुनहु शिव आही। जे जननी सो जो इन होय खाही ॥
जेहि जननी तन पांच प्रकृती । रोम चाम नख दंत भगोती ॥
जत द्वार तन तत भग जानी । आद लिंग सोहंग बखानी ॥
आठो पहर करे रति सोई । आवागवन महा दुख होई ॥
जबलग अमरलोक नहि पहुँचे । आवागौन भग भोगि विगूचे ॥
भक्त करे तो बारहि नीकी । भक्त बिहून सकल जग फीकी ॥
कीतम निरंजन पितु मम आही। तनके मात पिता यह साही ॥
जीव सब सत्यनामके आही । सत्यकबीर सतनाम लखाही ॥

महादेववचन ।

कहैं शंखु संसे गढ़ मोरी । तुम दयाल मम बंदीछोरी ॥
अब साहेब कहु जीवत लेखा । कौन तत्त कोहि जोनि परेखा ॥

योगियोंके तत्त्वोंका वर्णन व मुक्तिका मार्ग

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१४६

कबीरकृष्णगीता ।

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुन उमापति ईशा । नरतन त्रिगुण पांच पचीसा ॥
चार खान महैं नर तन ईशा । सकल भेद जानहु जगदीशा ॥
नरपिंडज चौरासी नारा । नाम भक्त बिन यमके चारा ॥
पिंडज गौ गज चौपग पहिषा । अरना बाध सिंह बनगोहिषा ॥
श्वान मंजार अजिया सुत बीगा । पृथ्वी आप वाय तेज अंगा ॥
त्रिगुण भेराय सकल जिव दीन्हा । सतगुण रज तम भासे चीन्हा ॥
रजगुण बहु छल झूद परबंदा । रोग वियोग भोग यमदंडा ॥
मिथ्या बोल सोग संतापा । छुतहिँ छूत जिव छूतहिँ थापा ॥
वैष्णवसे नहिं नवीहिं अभागे । वैष्णवन असंखहिं द्विज नागे ॥
तिनहु भागह बड वैष्णो बखाना । जीव दया कथि जग पतिथाना ॥
बहुर युद्ध महाभारथ करावा । तब करता हरि धका दियावा ॥
कृष्ण सीस जब वसे कबीरा । तबलग्ण राम कृष्ण मत धीरा ॥
निरंजन अधा परवेसा । तब से कृष्ण कालकर भेसा ॥

दोहा—जबलग्ण जाकर नाम लिख्य, तब लहि तेह यह सोय
कहैं कबीर मोहिं सुमेर, एकमत सब सुख लोय ॥
पांच तीनकी काया कांची । अमरपुरी अमर तन सांची ॥
सतगुण सत्यकबीरके आसा । निरंजन अवा रज तम फांसा ॥
जैसे तुलसी भांमे राई । औ गुर राम तुलसी सार लाई ॥
रज तम गुंभा भांग बखाना । भांग महादेव अज गुमा जाना ॥
तुलसी विष्णु अंस विनाशी । औ अविनाशी कबीर सुखराशी ॥

दोहा—कहैं महादेव विष्णु अज, सुन सतनाम कबीर।
निराकार डहनसे, राख लेहु गुरु पीर ॥

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कबीरकृष्णगीता ।

१४७

कबीर वचन ।

कहैं कबीर सुनहु त्रिय देवा । सब मिल करहु साधुकी सेवा ॥
जगमहैं वैष्णव भेष मम दासा । प्रेमवस भये ताके पास ॥
सत रज तम जिव सबहैं मेरा । अभष पंथ राक्षस जिव चेरा ॥
वीज वंस तेहि रहे न कोई । मीन गऊ वध जत जिव खोई ॥
सतगुणको सो भाव बखानी । रज तम तज सतपंथ चल्लानी ॥
सत्य दया पर आतम पूजा । सदुरु साथ चरण मन बूझा ॥
सकल देव मिल निरगुण नामा । कबीर अंस तन रमता रामा ॥
सबसे प्रेम क्षमा धीरज तन । अपने जानत न दुखवैं काहु मन ॥
कौनहु जीव जंतु न दुखवैं । समष्टी निज सबपर भावे ॥
काहूके तन मांस न खाई । मीन मास मद निकट न जाई ॥
वृत्त मिष्टान्न पान फुलवारी । यह सब सात्वकी भक्ष विचारी ॥
अभ्यागत आवे कोइ बरणा । सबकर पोषन सब मिल करना ॥
सात्वकी चाल मुक्त नर नारी । रज तम भौ सब भ्रम संसारी ॥
भक्षित भाव गलतान लिय नामा । परनारी द्रव्य अपंथ कर कामा ॥
कच्छ मच्छ सकलो जिवजंता । सब जिव परा क्षमा शुभ संता ॥
तीर्थ व्रत तप त्रिगुण जोगा । बनोवास अधर्म तज भोगा ॥
भोग सात्वकी भजन सतनामा । इच्छा दशा समर्थ निहकामा ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण पुलकित होय वाणी । सत्य कबीर तुमहिं सुख खानी ॥
हम सब कहैं तुम दीन्ह बढाई । आप दास होय सेवा लाई ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर बडेकी रीती । सब जिव पोषव सबसे प्रीती ॥

त्रिगुणका प्रभाववर्णन

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१४८

कबीरकृष्णगीता ।

बमन दीनता लघुता माती । पतिव्रता सब लाब तेहि क्रांती ॥
सद्गुरु नाम कबीर अटोटा । कबीर कंथ भज कछु नहिं टोटा ॥
विष्णुवचन ।

कहे कृष्ण अज हर शुक्र व्यासा । अब सद्गुरु कहिय तथासा ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर तमगुणके लक्षण । दरिद्री भिखारी क्रोध यत तिक्ष्ण
मारन मरन राते षट् उरमा । सत्य नाम भजे सो जिवघरमा ॥
सत्यनाम सो अम्बर काया । जगमग जीत सो अंस सुहाया ॥
अमरलोक सो अटल रहाहीं । जीव दया वद जग प्रगटाहीं ॥
असुरहिं साथ चतुर सुख साखा । रज तम भक्त असुर जग लाखा
सुगुप्त मोह बस तक्षक भासा । राक्षसी भोजन पेत पिशाचा ॥
विष्णु भक्तके दोह कराहीं । शिव जोगी सिष साथे नाहीं ॥
और कहे शिव जोगी सिध्या । कलयुगद्विज मिल शिव शिष्यगिधा
मीन मास मद भष गिद्ध भाना । मीन मास मद है अब खाना ॥
चोरी और करहिं बटपारी । झूठा लंपट चुगल जुवारी ॥
षट् उर मास रसके संगी । रज तम शिष कुपंथ अभंगी ॥
छीन सतगुण रज तम बहुताई । यहि जीवको ढर विचल न जाई ।
नहिं विचलहिं सतगुरुजेहिमाहीं । सच चीन्ह रज तम मिन डाहीं ॥
सचहिं दिन २ बाढ सवाई । गुरु साथ विमुख यम खाई ॥
दिना चार कलि श्रेष्ठ मलेच्छा । झष भखहिं गौ भखहिं अभक्षा ॥
जहँ लग अवगुण रज तम जानो । सतगुण रज तम चाल बखानो ॥
रज तम आधार ते वैष्णव नाहीं । वैष्णव सतकबीर सतगुणमाहीं
हमरे दासहिं जो कोइ मनिहै । तेहि सुख होय यम नहिं दहिहै ॥

सत्य भक्ति तथा योग भोगका वर्णन

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कबीरकृष्णगीता ।

१४९

एक २ रोम वैष्णव सतोगुण । रज तम देवी पंथहै दुर्जन ॥
यह सब तन वैष्णव तन दूजा । रज तम देवी पंथ अरुझा ॥
जो नहिं संतहि माने भाई । झूठहिं थाप नरकमें जाई ॥
जन्मे घरे सो क्रीतम झूठा । अजर स्वास जिव संतन दूठा ॥
सत्यकबीर अजर अविनाशी । सत्यकबीर जो करे हुलासी ॥
दुलह कबीर अमर सुखरासी । दुलहिन जीव अमरघरवासी ॥
देह धरे भौ जिव चकलागा । खसम विसार जार मन वागा ॥
धगरा मनमत त्रिगुण निरंजन । खसम कबीर काल सिरभंजन ॥
जै जै स्वामी सत्य कबीर । स्तुति करें त्रिय देव सो धीर ॥
तीनों कहे हम तरे तुव दाय। मुक्त परवाना कबीर सिरवाया ॥
अगले हंसन वाट चिन्हाई । सर्व शास्त्र दाय। फरमाई ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण यह निश्चय जानी । मुक्ति कबीर चरण लपटानी ॥
कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो सब कोई । सांची भक्ति विना गत खोई ॥
सांच भक्ति गुरु साध विश्वास। भैरों भूत देवी यमफांसा ॥
कहैं कबीर सुन वृषभ सवारी । प्रच्छेहु प्रथम सो लेहु निरवारी ॥
सब योनिन तत गुण क्रीत विवरण । पांचतीन एक मिलनर जोहतन
पिंडज चार तत्त नभ त्यागी । और सकल नभहि ते लागी ॥
अबूज तीनते पृथ्वी वाई । उषमज दोय तत्त तेज औवाई ॥
एक तत्त अंकुर दलको थेका । पांच तत्त नर शब्द विवेका ॥
चार खान रचि त्रिगुण अछंगी । एक जीव तनका चित्रभंगी ॥
जोग भोग दोउ रोग समाना । नाम भक्त चहुँ युग निरवाना ॥

विशदका स्वरूप कथन

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१५०

कबीरकृष्णगीता ।

पांच तीन बस तन अघखानी । सट्टरु सेव हंस पिल जानी ॥
तन विदेह विन घरको भवन है । पांच तत्त यन कहांसोरंगहै ॥
यथयम कहेउं पंच सैल ततुरंगा । सुन भूलेहु तुम खाहु बहु भंगा ॥
योगी सोहंग तन सिंगी बजावे । सहज आसन तन विभूत रभावे ॥
हटताई दिब्बी अमीगत ठपना । सबे विगाना सट्टरु अपना ॥
चावल प्रीत चेतन दिल दाला । ब्रह्म अगिन कमल परजाला ॥
निरगुण नाम निमक सो सब रस। तेज पात विश्वास सो अदरख ॥
प्रेम सुचित सो घीव जीवन । काया क्षीर यथे कोई गुरुजन ॥
पारस पान प्रसाद चढाये । अमी नीर कबीर पियाये ॥
दया दही गऊ घृत सुच दूधा । खोवा काम क्रोध घर सोधा ॥
गरस प्रसाद विरान सुरत सेवक । शुभ आशिष देहिं गुरुदेवक ॥
अजर अमर घर वर मिल आशिष । पिया रूपरस जगमें अतिसुन ॥
पिष हिय पैठि सेवककेरा । जन्म मरनका करे नवेरा ॥
भया निवेरा सो कस हूवा । पांच पचीस त्रिगुन तन जूवा ॥
अजर अमर अविचल सो काया । अमर लोक सबे सुख पाया ॥
कहैं कबीर छूटेउ सब संसा । तरे इकोतर पिछले वंसा ॥
सट्टरु शरण हाथिगत पुरुषा । खसम कबीरहिं लखेन न सुरखा ॥
कहैं कबीर तन भुवन चतुर्दश । चौदह संग चालक जीव सर्वसा ॥
चौदह संग जब बाहर होई । सत कहे सट्टरु शरण समोई ॥
अजरलोक पगु अधर बखाना । निज पगु अरध चितल परजाना ॥
तीन लोक उरध तेह ताको । लोक तलातल जंघ अस्थापो ॥
लोक माहिं तल इंदुकी वारी । मलस्थान रसातल खारी ॥
कटि पताललोक विस्तारा । सान दीप नभ अधर उचारा ॥

चौदह यमका वर्णन व ग्रंथसमाप्ति

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कबीरकृष्णगीता ।

१५१

इंद्र सप्त दीप भुवलोके नाभी स्थानी । नामके वाम दहिने भै जानी ॥
रवर्गलोक हृदय अस्थापी । अमर लोक तन दोउ सुज दापी ॥
कंठ स्थान आहि जनलोक । हे पतलोक खिलोट विसोका ॥
कीतम सत्यलोक नर माथा । आद सतलोक अमरपुर ताका ॥
कुल अंगुष्ठ बुढ़ा पगु पाहीं । नाडि सकल सेस परवाहीं ॥
निज सुख देखहु तीनों लोका । रसना उर्ध सरम पंथ मोका ॥
रसना मृत्युलोक कोई थिर नाहीं । जिदा जग प्रगट रहाकोइ न माहीं
रसना अरध पतालके सो साता । अष्ट घात पिंजरा जिवराता ॥
निराकार प्रबल मंजारा । सत्यनाम विन तेहि दै मारा ॥
अष्टंगी मंजारी खोटी । तीन लोक जिव खायसि घोटी ॥
कहै कबीर जिन सुमरो मोही । यम सिर भंजन बचायेउ बोही ॥
चौदह यम तन जीवहि घेरा । चौदह यमका करो निवेरा ॥
प्रथमहि धर्म करे यम घाता । धर्मराय यम इस मन माता ॥
दुतिय काम त्रितय यम कोधा । चौथे लोभ पंचये भ्रम सोधा ॥
छठयै यम लक्ष बुध विकारा । सतयै परधन हर सत हारा ॥
अठयै अहंकार नौमै मोहा । दसयै दस इंद्दी सुख जोहा ॥
इकादसे आप तन पोषा । अश्यागत तज खाय न मोषा ॥
द्वादसयै लेय विश्वास घाती । त्रियदस तृष्णा लोभ जमाती ॥
चतुर्दश चिंता तन बन आगी । चिंताहि डाह कोई वैरागी ॥
चिंता सोइ जो सट्टर सेवा । सट्टर सब देवनकर देवा ॥

कृष्णवचन ।

कहै कृष्ण निरने निरवारा । सत्यकबीर औ तारनहारा ॥
हम सब मगन कबीरके पाछे । हमार निवाह कबीरकृत आछे ॥

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१५२

कबीरकृष्णगीता ।

चारों युग कबीर मोहि रासा । कहैं कृष्ण व्यास सत भाषा ॥
पूछहिं तारा अकाश घर स्वामी । कहैं सदुरु नखत निधायी ॥
केतिक तारा आहिं अकाश । कौन वरण तारागण भाषा ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर तारा यम रोवा । प्रबल निरंजन यम जिव हुवा ॥
उतरो याही यमकी काया । दिये छिटकाय रैन नम याया ॥
होत प्रात फिर सुन्य समाई । सात तबकके पार सो जाई ॥
सुन्य समाय रहा धर ध्याना । दिन गत बहुरि रैन प्रगटना ॥
रैन निरंजन दिवस कबीरं । सूर निरंजन शशि सत धीरं ॥
अनंत कोट उडगण तनवारा । चौदह योजन गोछ निराकार ॥
गोछ वीर जीवहिं दे सूरि । कबीरके भक्त करे भौभूरी ॥

दोहा-श्रीकृष्ण त्रिय देव मिल, स्तुति कराहिं अपार ।

सुखदेव व्यास सब विनवहीं, जै जै कबीर विचार ॥

कबीर काल सिर भंजन, और मुक्त देहिं जीव ।

विष्णु व्यास सत कहत हैं, सत्यकबीर निज पीव ।

इति श्रीकबीरकृष्णगीता समाप्ता ।

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