कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
by युगल आनंद विहारी
Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)
About this granth
Kabir Krishna Gita (कबीरकृष्णगीता) is a Kabirpanthi text in which Krishna and other Puranic figures proclaim the greatness of Kabir and of the True Name (satyanam). Its title page calls it the first volume of the Kabir Darshan Granthamala, compiled by Swami Yugalanand Vihari, 'Bharat Pathik', associated with the Hazuri Mahant Shri Yugaldas of Kabir Dharmanagar and known for restoring Kabirpanthi texts.
Its episodes include the court of Dharmaraja, the glory of the True Name, the story of King Chhatrajit, a dialogue between Narada and Krishna, Yama's messenger questioning Krishna about a devotee of Kabir, accounts of Satyaloka, the soul and Niranjan, the play of Kal and the way to escape it, a dialogue of Niranjan and Vishnu, Shukadeva's many births, King Nirmoh, the marks of a true guru, the Pandavas with Krishna, the sage Kapila, Vyasa asking Kabir to show him Satyaloka, and the way across the Kali age.
The book is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai; the copy scanned is the edition of September 2015. Its 168 pages help readers understand the Kabirpanth's own mythology and cosmology.
कबीरकृष्णगीता ।
१२३
गुरुआज्ञाते जो रमे, रमतें तजे शरीर ।
ताके सुक्त हजूर हैं, सदुरु कहें कबीर ॥
गुरुके सन्मुख जो रहे, सहे कसौटी दुःख ।
कहें कबीर वा दुःख पर, वारों कोटिन सुख ॥
सदुरु अधम उधारन, दयासिंधु गुरु नाम ।
गुरु विन कोई न तर सके, क्या जप अल्लह राम ॥
गुरु सुक्तावे जीव कहें, चौरासी बंद छोर ।
सुक्त प्रवाना देहिं जो, यमसो तिनका तोड़ ॥
वेद पुराण साधु गुरु, सवन कहा निज बात ।
गुरुते अधिक न दूसर, क्या हरि क्या पितु मात ॥
ताते शब्द विवेक कर, कीजिये सो साज ॥
जोहि विध गुरुसो प्रीत रह, कजि सोई काज ॥
गुरुसो प्रीत निवाहिये, जेहि तत निवहे संत ।
प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रीत निकट गुरु कंथ ॥
सोइ नाचना नाचिये, जेहि निवहे गुरुप्रेम ।
कहें कबीर गुरु प्रेम विन, कितहु कुशलना क्षेम ॥
तन मन सीस निछावर, दजि सरबस प्राण ।
कहें कबीर दुख सुख हरे, सदा रहे गलतान ॥
तब जो गुरु प्रिय बैन कहि, शिष्यहि चितवे दीठ ।
तो रहिये गुरु सन्मुख, कबहुं न दजि पीठ ॥
गुरु मारे झटकारे, गुरु बोरे गुरु तात ।
गुरुसों प्रीत निवाहिये, गुरु भौ निधि काडिहार ॥
ज्ञान दशा और मनकी दशाका वर्णन (गुरुमुखी और मनमुखी)
१२४
कबीरकृष्णगीता ।
सनेह प्रेम गुरु चरणमें, जेहि प्रकार सो होय ।
क्या नरे क्या दूर बस, प्रेम भक्त सुख सोय ॥
जेहि विधि शिष्यके मन बसे, गुरुपद परमसनेह ।
कहैं कबीर काफर ठिग, क्या पर्वत बन ग्रेह ॥
सोई साधपतिव्रता जो, सदा जरे पिय आग ।
लाभ हानि बिसराइके, रहे चरण गुरु लाग ॥
जो गुरु पूरा होय तो, शिष्यहिं लेय निवाह ।
शिष्यभाव सुत जानिये, सुतते श्रेष्ठ शिष्य आय ॥
अबुध सुबुध सुत मात पितृ, सबहिं करे प्रतिपाल ।
अपनी और निवाह गुरु, शिष्य सुख लहे निज चाल
जैसे सती संग जरे, आस पतीकी त्याग ।
सुघर कूर सोचे नहीं, शिष्य पतिव्रत सोहाग ॥
सरबस सीस चढाइके, तन कृत सेवा सार ।
शुभ पियास सहि ताड़ना, गुरुकी सुरति निहार ॥
गुरुको दोष रतिक नहीं, शिष्य न साथे आप ।
शिष्य ना छोड़े मनमता, गुरुहिं दोष दे पाप ॥
जैसी सेवा शिष्य करे, तस फल प्राप्त होय ।
जो बोवे सो लुवे, कहैं कबीर विलोय ॥
कहैं कबीर गुरु सो मिले, नाम होय प्रकाश ।
गुरु मिलिशिष्य भौनिधि तरे, सुनहुकृष्ण मुनिव्यास
सुनियो संतन साध मिल, कहैं कबीर समुझाय ।
जेहि विधि गुरुसो प्रीत होय, कीजे सोइ उपाय ॥
कविरत्नमणिगीता ।
१२५
व्यासवचन ।
चिनती व्यास कीन्ह पंग देकी । तुमसन काहु न देख विवेकी ॥
ज्ञान दसा औ मनकी दसा । सत्यकवीर करो प्रकाशा ॥
कवीर वचन ।
कहैं कवीर निरनै टकसारा । मनमत ज्ञानमता निरुवारा ॥
ज्ञान अंग प्रथम गुरु करई । गुरुको शब्द हृदय गह धरई ॥
गुरु तो ऐसा कीजे भाई । पूर्ण ज्ञान सत चाल ददाई ॥
सचलोकले जीव पहुँचावे । दया क्षमा सुखसिंधु समावे ॥
पूछे गुरुसे होय गलताना । जो गुरु कहे सोई सतमाना ॥
गुरुसुख ज्ञान विचारे लीन्हा । मन औ ज्ञान भिन्न तब कीन्हा ॥
दया क्षमा औ शील संतोषा । ज्ञान दया औ जीवपंथ मोषा ॥
विष्णो ज्ञान साकट अज्ञानी । शीतल ज्ञान क्रोध मन जानी ॥
असंत औ आतुर ज्ञाना । शील ज्ञान बेशील अज्ञाना ॥
निरगुण ज्ञान औ ज्ञान अतीला । धीरज ज्ञान अज्ञान हडीला ॥
आप खाय औरहिं देय ज्ञाना । गुरु साधू तज खाय अज्ञाना ॥
सेवा ज्ञान न उस अज्ञाना । कामी मन निहकामी ज्ञाना ॥
तीर्थ व्रत तप मनको भाऊ । नाम भक्त पुन ज्ञान लखाऊ ॥
चंचल मन स्थिर गुरु ज्ञाना । चंद भान ज्ञान अगनित भाना ॥
दिवस ज्ञान अज्ञान भौ राती । अवरण ज्ञान अभै नाजाती ॥
आतम पूजा ज्ञान बखाना । मनमत सिला धात व्रत ठाना ॥
दुबल सुपद ज्ञान प्राति ठाना । डिम धार को पूजे अज्ञाना ॥
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कवीरक्षणगीता ।
मात पिता सेवे शुभ ज्ञाना । तात जननी तज त्रिय मन माना ॥
डिंभ अहंकार दुर्ता मन छाया । अछत दीन लघु ज्ञान सुभाया ॥
पालक ज्ञान घालक यम बाजी । जैसे जग मनमत दिज काजी ॥
बोलता ज्ञान तन मन अंकारा । जाग्रित ज्ञान स्वप्न मन चारा ॥
ज्ञान परमार्थ स्वार्थ मन मूढ़ । जुवा मनुज ज्ञान पद बूढ़ ॥
अपन पराया एक सम जाना । और तोर मन बुध विगराना ॥
मात पिता सिर देय सो ज्ञाना । अहिब नारी विष खोट अज्ञाना ॥
भीस अजाची ज्ञानको अंगा । धूमधाम जांचक मनरंगा ॥
देह दाग मनमता कहावा । मन दागे जो ज्ञान सुभावा ॥
नाच छाछ विश्वा नट ठाढी । यह मनमता यम चौकी गाढी ॥
भीन नास मद क्षण मन बाजी । कसतुरी मिमयाय असत बन खाजी ॥
चाहे बैराग तजे नहिं रानी । सन्यासी संग्रह मन चारी ॥
झंसे मन पुलकित होय आना । सरगुन गुरु मन सट्टुर ज्ञाना ॥
चाहे भिस्त तजे नहिं मोहा । मोह अज्ञान ज्ञान निरमोहा ॥
सतगुण ज्ञान रज तम मन दीसा । मन मलेश गुण पांच पचीसा ॥
जागे ज्ञान सोय अज्ञाना । सो जागा जिन राम पहिचाना ॥
सोइ अज्ञान गुरु सेवा नहिं कीन्ह ॥ गुरुको सार असार नहिं चीन्ह ॥
ज्ञान अमर मन मरे नसाई । ज्ञान पारस मन सुरत होय जाई ॥
ज्ञान अमर पद सार सो बाहर । सट्टुर भिल आवे शिष्य ठाहर ॥
बाहरसे घट ब्रह्म समाना । सो जिवलोक ते न्यारा निरवाना ॥
अभी ज्ञान सो सत्य कवीर । बिबै निरंजन नीर सरिर ॥
जीव अभी सो नाम कवीरा । देह निरंजन बिबै शरीरा ॥
कलियुगमें कबीर साहब क्यों प्रकट हुए ?
कवीरकृष्णगीता ।
१२७
आवत स्वास सो सत्य कबीरा । निकसत मरे निरंजन कीरा ॥
गौर हथीर मन माया जानो । अजर पीर कबीर बखानो ॥
व्यास कहैं कस पीर कबीरा । सत्य कबीर भलदास गंभीरा ॥
कवीरवचन ।
कहैं कबीर कलमुगके आदी । मीन मांस भाखिहैं नर वादी ॥
होय मलेश महदेव ऐहैं । गौ द्विज वधि सिरिया नैगी ऐहै ॥
महादेवहिं महम्मद कहिये । हिंदू केर धर्म नहिं रहिये ॥
तब हम पीर कबीर कहाउव । साथि मलेश गौ द्विजहिं बुचाउव ॥
विष्णु पक्षका भयो प्रकाश । हमरे विष्णुसों कस दुइ भासा ॥
दोहा—दास कबीर कहाउव, रजव गुरु करव संसार ।
सत्यकबीर कहाउव, संतनके निस्तार ॥
जन कबीर भये नरतन धारा । कबीर कहाये जिव तन सारा ॥
हंस कबीर होय भजव सतनामा । अम्बर कबीर अमर सो जाभा ॥
गैनी नाम कबीर कहाउव । बहु बंधनते जीव मुक्ताउव ॥
अविगत कबीर कहाउव तबहीं । स्वयं च अधम उवारव जवहीं ॥
अकह कबीर केह को लीला । अविनाशी नहिं विनस शरीरा ॥
नाम कबीर वास सब देहा । रमैं कबीर रामतन खेहा ॥
रमैं कबीर होय रमता रामा । रमता स्वास जिव तन विश्रामा ॥
दीन दयाल कबीर कहाये । दीन दुखित जिव पालन आये ॥
खसम कबीर कहाये तबहीं । जीव सोहंगदे व्याहेउ जवहीं ॥
काल भरदन कबीर कहाये । यमहिं जीत जिवलोक पठाये ॥
१२८
कबीरकृष्णगीता ।
जोगजीत तब नाम हमारा । जब जीते योग माया निराकारा ॥
सतसुक्ति तब नाम हमारा । जब सत् प्रकाश कीन्ह संसारा ॥
बंदीछोर तबहिं कहलावा । जब यम बंदिछोर सुकावा ॥
मनकहैं जीत सुनीन्द्र कहाये । करुणामय होय दया ददाये ॥
सब फुलवा बेलि हमारी । निरंजन कहैं सौंपा वारी ॥
निरंजन पुत्र पुत्री अष्टंगी । मम द्रोही जो ताको संगी ॥
हमरे दुष्ट मित्र नहीं कोई । सर्वहिं व्यापक न्यारा सोई ॥
साधु द्रोह सोई मम द्रोहा । साधुसेवक मम सेवक बोहा ॥
जो मम संतकी सेवा करई । हमहिं जानके गुरुको धरई ॥
ताहि सुकिका संशय नहीं । गुरु साध भक्ता मम आहीं ॥
गुरुदोही सो साधुको द्रोही । अपने राम न भेटेउ बोही ॥
जगमहैं चहुंयुग गुरुऔ रामा । राजा राम गुरु सुखधामा ॥
गुरु राम दोय नाम हमारा । राम असोच गुरु भौकंडहारा ॥
अगम ज्ञान मन पूछहिं बाला । बहुहरहिं पूछेऊं पीर व्याला ॥
पीर परा ईसब दिन मेरा । सोई पीर जेहिपीर जिव केरा ॥
कहौकहां लग विकृत कलाजग । निरंजन एक मम रोम तनलग ॥
व्यासवचन ।
व्यास चरण गहि पुलकितभयऊं । सत्य कबीर मोहिं मानद दियऊं
बडे भाग मम सुखदेवकेरा । और गडुरके भाग बधेरा ॥
व्यासदेव कृष्णहिं सिर नाये । धन्य तुम कृष्ण कबीर चिन्हाये ॥
कबीर बिना को राखे जिवको । गुरु बिन कौन चिन्हावे पिवको ॥
गुरु विष्णु सत सतको अंशा । सोई सत्यकबीर कुलवंशा ॥
सब देवताओंका कबीरसाहबका शिष्य होना
कवीरकृष्णगीता ।
१२९
सबके मूल कवीर ठहराने । कवीरके डर यमराज डराने ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास मत धीरा । सब सट्टुणके गुरु कवीरा ॥
लेहु पान सबही मम दीक्षा । सत्यकवीर कहैं अर्णहु सीसा ॥
सट्टुर कवीर गुरु करहु रे भाई । श्रीकृष्ण सबको ससुझाई ॥
जहैलग सट्टुण देवता रहऊ । सबन धाय सट्टुर पद गहऊ ॥
उभै कहे विष चक्षु नीरा । देहु प्रवाना सत्य कवीरा ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सुनो सब देवा । कृष्णसो पूछहु हमरी भेवा ॥
हम हैं अजर भुक्तके दाता । हमरे शरण यम त्रास निपाता ॥
जो हम कहा शब्द सहिदानी । शब्दकी चाल चले सो ज्ञानी ॥
सबन कहा अपौं शिर तोही । देहु पान आपन कर मोही ॥
सत्यकवीर तब आरती कीन्हा । अभी अंक सो वीरा दीन्हा ॥
चरणोदकदे तिलक कर दीन्हा । तुलसि माल दे सिखवनकीन्हा ॥
सब जिव जानहु एक समाना । जीवघात तज ब्रह्म अभिमाना ॥
साधु गुरु सम सेवा मानी । सुख स्थिर सट्टुरकी वाणी ॥
गुरु कर्ता गुरु सम नहीं कोई । गुरु कर्ता ते भेछ है सोई ॥
करता देही धर गुरु करही । तो करता करता होय परही ॥
सब महाँ करता नाम कवीरा । रमें राम होय सकल शरीरा ॥
सर्व यई सो राय लखाहीं । राम सो अंश कवीरके आहीं ॥
जग महाँ उलटी भाव दिखाये । जो स्वामी सो दास कहाये ॥
करता आद कवीर भये दासा । राम कृष्णकी महिमा प्रकाशा ॥
लक्ष्मी आदि देवियोंके गुरुमुख होनेका वृत्तान्त
१३०
कबीरकृष्णगीता ।
सबमो राम सो रमहिं कबीरा । जैसे घृत व्यापक है क्षीरा ॥
बैठा नवर बराबर पोखे । पाप नाचि तबै पुण्य कर चोखे ॥
ना कोइ पाप जिवघातसमाना । साधुसेवासम पुण्य न आना ॥
गुरुके भक्तसमान नहिं दूजा । पतिव्रता जिमि भियपद पूजा ॥
सद्गुरु पिव सो जीवके आहीं । पतिव्रताते गुरुभक्तभेदआहीं ॥
तिन स्वामीके भक्त सुरलोक । गुरु भियभक्त सो जीवनिसोका ॥
भ्रान मंजार देह धर सोई । गुरु साधुको निन्देउ सोई ॥
हरदम नाम कबीरको गावे । तासु हृदय कबीर सयावे ॥
तजे अभक्ष सुभक्ष सो पावे । भीन मास यदार रत नहिं भावे ॥
दोहा--मधुर मम पाय कसतुरी, माक्षी घोंघी चुन ।
मत्स्य मास मद त्यागे, पहुँचे पुरुष सनीप ॥
पान परवाना पावे, सुमरे सत्य कबीर ।
कहे कबीर घर पहुँचे, बहुर न धरे शरीर ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी । लक्ष्मी गायनि सकुचानी ॥
हम सब गुरुविनकोहिपंथ जायव । ना जानो केहि खान समायव ॥
हमरे स्वामी तेहि सिर दीन्हा । हम तीनों मिल केहि पग लीन्हा ॥
लक्ष्मीवचन ।
लक्ष्मी कहे सुनो ब्रह्माणी । सुन सेवहु कबीर सुखवाणी ॥
चहिये कबीरके दीक्षा लीजे । सत्यकबीर चरण चित दीजे ॥
कह लक्ष्मी मम पति सिरदारा । थो मम पतिके सद्गुरु सारा ॥
यह कह लक्ष्मी विष्णुपहँआई । सीस नाय चरण चित लाई ॥
आज्ञा करिये स्वामी मोरा । तब गुरु करो कबीरबदिछोरा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१ ३१
विष्णुवद्भन ।
हंसके विष्णु तवआयसु दीन्हा । हम जो चहत सोईतुम कीन्हा ॥
दोहा-धन्य भाग तेहि नारको, विष्णव जाको स्वामी ।
बहुर भाग तेहि पुरुषको, जेहि घर विष्णव वामी ।
कहैं कृष्ण नरिअर कर लेहू । सीस निछावर नरियर देहू ॥
दोहा-पान मिष्ठान्न नरियर, पुंगी फल पुष्प श्वेत ।
श्वेत वस्त्र सिंहोसन, साजहु थार समेत ॥
कंचन थार जोत प्रकाश । हीरा माणिक अथ सुवासा ॥
कृष्ण लाय पीछे निज नारी । चले भक्त राधे झझकारी ॥
पुन सत शिवको सिधाई । कबीरके चरण परससवआई ॥
कहैं कृष्ण सुन सत्यकबीर । दीजे शरण नार त्रिय धीर ॥
लक्ष्मीबचन ।
लक्ष्मी कहे विविध कर जोरी । हमको तारहु यमसोबांदिछोरी ॥
कबीरबचन ।
दोहा-कहैं कबीर सुन लक्ष्मी, सोई नार सुलक्ष ।
तन स्वामी जिव पीव कहैं, सेवा करती दक्ष ॥
अपने पति तज आन न जोवे । सोई नार पतिव्रता होवे ॥
पतिव्रता निज प्रियपद पूजा । जग महीं पतितज सृष्टि न दूजा ॥
दोहा-पिय चरणोदक जूठन, पतिव्रताको आधार ।
पियहे अंबू अगिन घसे, सिरदे हने पहार ॥
सवपर सत्यनाम गुरुरूपा । अजर अमर गुरु सत् सख्पा ॥
जीव सबे गुरु समर्थ केरा । जासु प्राण वस जाके चेरा ॥
१३२
कबीरकृष्णगीता ।
तुम तो लक्ष्मी सत्यकी माया । साधु संतपर करिहो दाया ॥
सुनहु कृष्ण स्त्री गुरु स्वामी । तन गुरुपति पति गुरु निज नार्मी।
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण हम दासी दासा । एक मत घर तब संत विलासा ॥
तब कबीर प्रसाद चढावा । सत्यनाम कहैं भोग लगावा ॥
यम त्रिण तोड दीन्ह परवाना । लक्ष्मी पान पाय सुख माना ॥
चरणामृत सीत प्रसादा । लीन्ह लक्ष्मी सचको स्वादा ॥
सात दंडवत कीन्ह स्वसम कहैं । तीन दंडवत संत तनपति कहैं ॥
कहा कृष्ण अब हम गतिपावा । घर साकट वैष्णव करवावा ॥
केते पुरुष आय गुरु शिष्या । नारी साकट घर प्रेत परेखा ॥
दोहा-भक्ति करे जो स्त्री, तो वीसिये घर माहिं ।
साकट स्त्री भुंभनी; नहिं जैये तेहि पाहिं ॥
स्त्री बेटी बेटा भानजी । मात पितु बंधु परिजन काजी ॥
ये सब सरगुण भ्रम पसारा । मोर मोर कर मरे संसारा ॥
मोर मोर का करहु रे भाई । मोर आप पगु देख तवाई ॥
सब गुण शूद्र तासु धराई । भक्ति बिना कछु काम न आई ॥
अपने मन सब भक्त कराहीं । सार भक्त विन नरक भोगाहीं ॥
सार भक्त सतनाम कबीरा । भजै कबीर न घरै शरीरा ॥
चौथा पद सदुरु स्थाना । सदुरु सत्य कबीर निरवाना ॥
निरगुण भक्त पतिव्रत शरीरा । एक स्वसम सो सत्य कबीरा ॥
त्रिगुण भक्त सो आवा जाहीं । चौरासी मई भटका खाहीं ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३३
दोहा--सतगुण रजगुण तमगुण, तिनके तीन सुभाव ॥
कौन सिरजे कौन पोखे, कोइ संहार कराव ।
रजगुण तमकी उत्पत जाना । सतगुण सोवत जन्म सिराना ॥
तमगुण रुद्र काल संहारे । त्रिगुण निरंजन भसम कर धारे ।
बांचे विष्णु सतगुण सत ठाई । सत्यके मूलसत्य कबीर सतसोई
जेहि जस रुचे तैसो गुरु कीजे । विन गुरुजीव काल वस दीजे ॥
दोहा--सावित्री ओ गौरा, मगन भये हरि बैन ।
कहैं हमहू गुरु करों, सत्य कबीर सुख चैन ॥
कहैं कृष्ण कबीरसे वाणी । शिष्य होन चाहैं त्रिय दाय प्राणी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर खीवस स्वामी । पति कहैं पूछ नाम भज नामी ॥
गायत्रीगौरावचन ।
कहैं गायत्री गौरा बहोरी । सबके स्वामी तुम बंदिछोरी ॥
दुतिया माहि कोइ हित नाहीं । दिन दश कच्चा सुख जगमाहीं ॥
अंतकाल जब काल गरासे । तब गुरु विन नहिं कोइ निकसे ॥
अधा अंछंगी तेहमें तानी । लक्ष्मी तुव शरण हम कालअधीनी
सत्यकबीर तुम गुरु पितु माता । तुम्हरी दया बने सब वाता ॥
हम चीन्हा तुम साहेब आहूँ । सब बनजिया तुमही गुरु साहूँ ॥
तुम जेहि चितबहु सो तर जाईं । तुम विन जियरा नरक भोगाईं ॥
गौरा कहैं विहसिके वाणी । हमहू लखा कबीर सहिदानी ॥
जबहिं विष्णु हरिनाकुश मारा । शिव गुणसुत छिन असुरहिं मारा
हमहू शिवगण आईं हां । बैठे हरिनाकुश सिरमाहा ।
जब कबीर विष्णुके माथे । तब देखा मैं शिवके साथे ॥
१३४
कवीरुक्षणगीता ।
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सही तुम कहा । होहू शिष्य कपिलमुनि पहा ॥
दोहा-कपिला गऊ कपिल मुनि, हो सट्टरु हो तास ।
तास शिष्य मम पुत्री, तुम्हरे होय निवाह ॥
कृष्णवचन ।
कहा कृष्ण गौरा सावित्रिहिं । एके वृक्ष डारभै निवधिहिं ॥
भूल कवीर निरंजन डारा । साखा त्रिगुण पत्र संसारा ॥
पाँच पचीस जीव संग परऊ । हंस चाल तज बक मग गहू ॥
हंस सोई जिन सट्टरु चीन्हा । सट्टरु सत्यकवीर चित दीन्हा ॥
दोहा-सावत्री औ गौरा, भई कपिलमुनि शिष्य ।
विष्णुआदिक कवीर प्रमोधा, भयो सवन मन हर्ष ॥
तेहि छिन मात्र रुद्र अज आये । देश सुल्क सुख हरहि सुनाये ॥
पूछा विष्णु मृत्युलोक कहानी । चतुरावन शिव कहा बखानी ॥
ब्रह्माशिववचन ।
महा आनंद होत सब ठाऊं । भौ मृत्युलोक वैकुंठ सुभाऊं ॥
विष्णव मया सकल जग जाई । सत्यकवीर जपे दुनियाई ॥
राम कवीर करे पंथ जागा । जग सब भक्त भयउ मद त्यागा ॥
विष्णव होय सो गिने न काहू । कहैं के को तुम अज शिव आहू ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण यह भलि है बाता । तुम अंकुल काहे अकुलाता ॥
तुमहु भक्त करहु भल चाहहू । तजहु क्रोध सट्टरु पहिचानहू ॥
महादेववचन ।
कहैं महादेव तमकके बाता । सट्टरु तुमहि विष्णु जगदाता ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३५
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण हम सदुरु नाहीं । सदुरुके पदरजको छाहीं ॥
सदुरु एके सत्य कबीरा । काया वीर सतनाम कबीरा ॥
काया वीर बोलता पवना । आद पवनसो स्वास अजौना ॥
खंस हंस सरवर तनयाहीं । अमी अहार सदा सुखयाहीं ॥
सोहंग हंस अंस सतनामा । सोहंग करता पुरुष वखाना ॥
सोहंग एक कबीरते छोटा । सबसे बडे सोहंग रूप मोटा ॥
सोहंग स्वास एकहि नाऊ । अनंत नाम स्वासके भाऊ ॥
दोहा—अनंत नाम एक स्वासके, स्वासा सबके माहिं ।
निरंजन अद्या अज हरिहर, जतरूवास विना कोई नाहिं
सो स्वासा स्वासा विस्तारहि । आद स्वासा सो भौ सोहंग छाही।
वास सोहंग सो ओंकार भो तीनी । सबके रचना कबीरजी कीन्ही
दोहा—राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके अंश ।
राम कबीरके वंश हैं, कबीर रामके वंश ॥
सत्य सो पिता पुत्र होय धाया । तबहिं पुत्र पिता कहलाया ॥
स्वासा सत्यकबीरको अंसा । देह निरंजन घट पर संसा ॥
ब्रह्माशिववचन ।
सुनि ब्रह्मा शिव अचरज भयऊ । तबहीं शिव अस बोले लियऊ ॥
सही कबीर बडे हैं भाई । मोह कहा भूतको राई ॥
जासे हम तुम सब मिल हारा । एक बेर नहिं कैयो बारा ॥
कबीर करता हम तबहीं चीन्हा । खरा जबाब जब हम कह दीन्हा
ब्रह्मा कहे कबीर करतारा । कबीर कला सो अपरम्पारा ॥
निरंजन जाके ढर भौ माना । कबीरके त्राससो काल डेराना ॥
सत्यलोकके हंसोंके रूपका वर्णन
१३६
कबीरकृष्णगीता ।
कृष्णवचन ।
इतना सुन कृष्ण कबीरपहँ हेरा । तब कबीर भगटे तेहि बेरा ॥
सत्यनाम कहि शब्द उचारा । अडुत लीला कला विस्तारा ॥
सोभा लोक रोम एक प्रगटा । अडुत चंद सूर भौ घटा ॥
दोहा-सिंहासन पर बैठे, सट्टरु सत्यकबीर ।
अमित कला छबिको कहे, अडुत हंस मन हीर ॥
धन्य भाग्य वैकुंठके, जहँ प्रगटे सत्यनाम ।
सट्टरु देव अनंदही, रजगुण तमगुण धाम ॥
कला गुप्त किये सत्यकबीरा । जैसेको तैसे यतधीरा ॥
सबे देव थरहर पग लागे । परसत चरण सकल भगभागे ॥
अजहरवचन ।
अजहर सबे कहे हरसेती । सबे शरण गहो यही सुनेती ॥
दोहा-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सबन कृष्ण समुझाय ।
फिर यह अवसर कहाँ मिले, गहो कबीरके पाँव ॥
हरषत अजहर लीन्हो पाना । नारि पुरुष एक मत निरवाना ॥
चरणाभूत सबहिन कहँ दीन्ह। सबन माँग प्रीतिसो लीन्ह। ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर सुनो त्रियदेवा । आपन अंस रचहु जग सेवा ॥
ठीका पुरे तुम लोक सिधावो । पितुके सेवा अंस बैठावो ॥
सट्टरु भाकि हृदय महँ राखहु । मात पिता सेवा सत भाषहु ॥
माता पिता सबे भल होई । सट्टरु सेय तरे कुल दोई ॥
काम क्रोध आपा घट काढव । सेवा साध सखा घर बाढव ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३७
कहैं कबीर सत्यकी चाली । तरे शिष्य ठागे सुर नाली ॥
सत्य कहे होय कारज जिवके । सत्य गहे मिलिहै निज पियके ॥
दोहा-सत्य ताहि कहैं कहिये, रती न मिथ्या जाहि ।
कहैं कबीर कृष्णगीता, विष्णु व्यास चित चाहि ॥
कहैं कबीर सुनो सब कोई । भाषों काया प्रचे सोई ॥
काया सो जो अमर ना रहई । जिवरा योनी नहि औतरई ॥
षोडश शशि सोहंसन भाला । चकित चंद है कलात्रियभाळा ॥
यनिमाली कंठ माल विराजे । कोटिन रवि शशि नखछविछाजे ॥
छत्र सिंहसन जगमग जोती । हंस खान शशि तिहुँ पुर पोती ॥
अमरलोक सो अमर हंसा । अमृतफल भोजन निहंससा ॥
अमर चीर तन विमल विराजे । देह सुवास प्राणमें छाजे ॥
श्वेत भंवर पंकज विन नाला । अभी सिंधुतट कुंज रिसाला ॥
कमोदनि विमलश्वेत उजियारी । मन पृथ्वी तन फल फुलवारी ॥
विमल सुगंध विटप फलपाता । पक्षी केलिकरें रंग राता ॥
त्रिधि विहंगम मय कर जूहा । चंद उदै फल फूल सबूहा ॥
विहसहि हंस महा रस खानी । दसनपांति मन जगमग वाणी ॥
काया अमर सुगंध अंजोरा । योजन शत सुवास धनघोरा ॥
हंस काया अस अमरलोक । परस पुरुष पद हंस निसोका ॥
यह शोभा संक्षेप वखाना । अद्भुत शोभा अकह अंमाना ॥
सत्यनामका लेय परवाना । निराकारका मर्दन माना ॥
सो पावे यह काया भाई । कहैं कबीर जिन मोहि लौलाई ॥
कोट सूर्य छवि हंसन काया । बहुत अंजोर संक्षेप सुनाया ॥
ब्रह्मा और कबीर सम्वाद - लोक द्वीपका वर्णन
१३८
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सत्यनामके एक रोम छवि, तुले न कोटि अनंत ।
अदुत शोभा कह कहों, कोट अनंत सूर चंद ॥
शीतल रवि सतलोक मझारा । अगिनसूरज भयो तब निराकारा
अगिनको रास निरंजन काया । अभितरास पुरुष पगु छाया ॥
हंसन काया कंचन सूंचा । कोटिन रवि विधि सरिस न पहुँचा
विष्णुके काया कंचन आभा । जैसे अन्नके अगुवा भाभा ॥
स्याम भये हरि पितके खोजा । अरि विष झार स्यामतन बोजा ॥
ब्रह्मा ताम रुद्र तन लोहा । लरगा इंद्रका मत फंद मोहा ॥
प्रेत खान विष्टाके देहा । नरक देह नर नार उरेहा ॥
चौरासी लक्ष योनी खानी । नरककी नार सो अंकुर जानी ॥
कोइ एक हंस अंकुरी होई । अंकुर पावहिँ अभिष न जोई ॥
अंकुरी जो भजे सतनामा । तो सब सुधरे वाको काया ॥
सत्यनाम कबीर बखाना । कहैं जनार्दन वचन प्रवाना ॥
विष्णुवचन ।
कहैं विष्णु सुन नारद व्यासा । नाम कबीर भजो सुखरासा ॥
दोहा-सकल जीव गायत्री, बांध निरंजन राय ।
सत्यकबीर सो रक्षक, कहैं कृष्ण समुझाय ॥
ब्रह्मावचन ।
ब्रह्मा कहैं सीस सुई लाई । सत्यकबीर मोहिँ कहहु बुवाई ॥
केतिक दूर आहि सतलोक । जहां रहहिँ सब हंस निसोका ॥
सत्यकबीर सत्यपुरुष अमाना । न्यारा सबसे सकल अमाना ॥
अजर अमर सत्पुरुष अजावन । जिन भज सतकबीर गुरुपावन ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३९
कहैं ब्रह्मा हम सब बड भागी । उवरे चरण कबीरके लागी ॥
पायउं सुत्कको खान प्रवाना । जीवत सुत्क भये अज जाना ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो चतुरानन । सत्यनाम भज मन वच करमन ॥
एक आस सत्यनामकी कीरये । और आस सकलो परिहरिये ॥
सत्यनामते अधिक न कोई । सत्यनाम भज अविचलहोई ॥
अब तुम सुनहु लोक जत दूरी । गुरु ज्ञानीको हाल हजुरी ॥
निर्जनके सुखसे बाहर । सत्यलोक अमरपुर ठाहर ॥
सात तबक नभ सात पताल । चौदह यम विच जीव विहाला ॥
चौदह तबक चौदह यम ईशा । यमकी सेना रोम तन दीसा ॥
सिद्धदास सतनाम कबीरा । गज रथ यम सैना घर चीरा ॥
पृथ्वी उर्ध योजन लक्ष मेघा । तासु पुन नभतर विषेधा ॥
रवि उर्ध लक्ष योजन है चंद । चंद उर्ध तन नखत अनंदा ॥
तेइस लक्ष योजन उर्ध अपक्षरा । तेहि तत उर्ध सुरासन ठहरा ॥
सूर आस तत उर्ध यम साला । तेहि तत उर्ध निर्जन काला ॥
दोहा—ताके आगे तत दूरी, महाक्षेत्र सो नारि ।
तेहि तत मानसरोवर जहैं, कामनी रचि धमारि ॥
ताके आगे सहज सो दीपा । योगजीतके दीप सनीपा ॥
सबे दीप अग्र महकाई । घ्राण सुगंध सकल रहु छाई ॥
पुरुषलोक जाय सो हंसा । ताको तरे इकोतर बंसा ॥
ब्रह्मावचन ।
ब्रह्मा मम होय पगु धारा । कर जोरे भाभी स्तुति सारा ॥
कहैं ब्रह्मा धन्य कृष्ण व्यासा । जिन कियो प्रगट कबीर प्रकाशा
महादेव और कबीर सम्वाद - योगका वर्णन
१४०
कबीररुणगीता ।
कहैं अज सत्यकबीर संवादी । हम सब शिशु क्रीतमलघुवादी ॥
अन चीन्है हम बाद बहु कीन्हा । बरुसहु सत्यकबीर प्रवीना ॥
अब तो शरण तुम्हारी आये । यम अवगुण क्षमा प्रभु लाये ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो अज वाणी । मात पिता शिशु घट नहिं यानी ॥
जो हम क्रोध करो तुव सबपर । को तोहिराख सके अज हरिहर ॥
तुन तीनोंके पितु महकाला । निराकार सब करे विहाला ॥
हम तुम सबको प्रथम चेतावा । गहो शरण होय जिव सुत्कावा ॥
तब तुम गर्भवासमहैं भूले । ताते फिर २ योनी झूले ॥
जब सिर टेकेउ ऋषिदेव कारा । तब कबीरके शरण पवैरा ॥
कबीरके नाम शरण प्रतापा । उलटहिं जाय कालहिं चांपा ॥
कहैं कबीर सुनहु तुम चित दे । हृदय कबीर नाम जप हितकै ॥
जो जेहि नाम सुमरे चितलाई । हृदय कबीर नाम लौलाई ॥
दोहा-निशि दिन सुमरहु नाम मम, यमते रहहु निसंक ।
शब्द निरख पंथ गवनहु, गुरु पितु जेहि न कलंक ॥
चरण चूम अज सीस चढाये । तत्क्षण रुद्र जो गमन लाये ॥
कहैं महादेव विनय बहूता । कहहु कबीर योग सतमता ॥
केतिक स्वास चले दिन राती । किम घर बरे तेल विन वाती ॥
केते हांथ धरती आकाशा । कौन देवको कहां निवासा ॥
केतिक नदी केतिक गिरवरतन । कौन सिंधुको गाय कहावन ॥
कौन अमावस कौन परीवा । कौन पुत्रवा कौन ग्रह धरिवा ॥
केतिक रुधिर कायाभैं आही । वगन ओंकार फेर कित आही ॥
पांच तचहैं काहे नामा । और पचीस नाम पंच बाभा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४१
काया माहिं कै अंस हैं ताता । सोकहु कै अंस आहिं तन माता ॥
कौन तत्त केहि जोनी साजा । योग भलाके भोगे राजा ॥
श्रुतुक मरे जरे तन क्षारा । परम पुरुष होय तनते न्यारा ॥
कौन देह धरि नरक भोगाई । को है सेवक लेय भिलाई ॥
चौदह सुवन कायामहैं काही । कहिये तन प्रचे मोहि पाही ॥
पांच सत्तका रंग कौन है । विन मंदिरका है सो कौन है ॥
कौन योगीको सिंगी बजावे । कौन आसन कौन विभूत रमावे ॥
काहेकी डिब्बी काहेका ढकना । कौन बेगाना को है अपना ॥
कौनसो चावल कौनसो दाली । कौनसी अगिन जात कहिवाली ॥
कौन कपिल को देवता आही । केतिक अनपा कहाँ जपाही ॥
विनती कर शिव पूछहिं भेऊ । कहैं कबीर सुनहु सब कोऊ ॥
योग यज्ञ तप तीर्थ कर्म काटा । यह मत चलि जिव बारह वाटा ॥
सार भक्त विन तरे न कोई । चहुं युग भक्ति श्रेष्ठ गुरु सोई ॥
कहैं कबीर सुन प्रेतके ईशा । गहहु देव पथ तारहु सीसा ॥
तुम सब लीन्ह पान परवाना । भक्ति चावल चित तज मम कामा ॥
एक २ अंश देहते काढहु । तेहि पितु सेव राख पितु बाढहु ॥
दोहा—अपनी अकित दुतिअन, सिरजा तीनो देव ।
बनिजा तीनो छट्टुर मिले, क्रीतम देव पितु सेव ॥
छै सौ बीस सहस्र इकईसा । येतिक स्वास दिवस निशि ईसा ॥
मनु पवनाको धायियो तारी । विना तेल औ दीपक वारी ॥
साठे तीन कर क्षीनीजहैंथा । आंगुर चार अकाशको माथा ॥
मल निकास बछ गनपत राजा । रिद्ध सिद्ध समसावत्री विराजा ॥
सकल सिद्ध मिल गुरुपद सेवा । गुरु विन गनपति भक्ति बहेवा ॥
१४२
कबीरकृष्णगीता ।
पृथ्वी तत्त्व तिष्ठत तेहि बारिज । पृथ्वी समान साध तेह कारिज ॥
सोह चतुरदल विधु सूरंगा । नाम बीच अजपा सोहंगा ॥
सोहंगका विन डोर कमला । जपे सो अमृत नाम दयाला ॥
षट्पत्रपद इंदी अस्थाना । बला सावित्री तहँवा जाना ॥
रजगुण पीत वरण सो पंकज । षट्सहस्र अजपातहँआपअज ॥
आप तच तहँ कीन्ह निवासा । विषै निरंजन काम यम फांसा ॥
केवल सो अष्टदल नील सुरंगा । विष्णु देवता लक्ष्मीसंगा ॥
सबगुण षट्सहस्र अजपा जप । सत्यनाम सम नहिँ कोइ तप ॥
वायु तत तहँ गांठ वंधानी । नाभचक पवना घर जानी ॥
कीतम घर तन पवन सोहंगा । आद अमर घर सदुरु संगा ॥
जाके बस सोहंग है भाई । सोई सत्यकबीर गोसाई ॥
दोहा--आद पवन सोहंग है, क्रीतम वायु तत पांच ।
जहांते सोहंग ऊपजा, कहैं कबीर सो सांच ॥
शिव शारदा दस हियकमला । स्फटिक वर्णअतिसोहेपदअमला
तेज तत वडवानल चितंगी । हृदय दरश गुरु सदुरु संगी ॥
षट्सहस्र अजपा तहँ होई । शिव सक्ती गुरु शिष्यधरसोई ॥
द्वादसदल पंकज कंठ अथर । तत अकाश त्रिगुण मनस धर ॥
अय परम शिव दस द्वादसी । स्वांतकीलक्ष्मीमहाविष्णुसंगवसी
एक सहस्र अजपा तहँ होई । सञ्ज रंग बरते पद सोई ॥
सञ्ज स्याम जेठ लघु भाई । सञ्ज रिस्वाम लखि जाई ॥
कंठ केवल दल षोडश पूरा । तहां वस्तु जिवसकलरंगसूरा ॥
अजपा छै सो नाम विहंगा । सुरत निरत सो सदुरु संगा ॥
भंवर गुफा दोय दल पद सोहा । परमहंस बसे नृप निरमोहा ॥