कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
by युगल आनंद विहारी
Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)
About this granth
Kabir Krishna Gita (कबीरकृष्णगीता) is a Kabirpanthi text in which Krishna and other Puranic figures proclaim the greatness of Kabir and of the True Name (satyanam). Its title page calls it the first volume of the Kabir Darshan Granthamala, compiled by Swami Yugalanand Vihari, 'Bharat Pathik', associated with the Hazuri Mahant Shri Yugaldas of Kabir Dharmanagar and known for restoring Kabirpanthi texts.
Its episodes include the court of Dharmaraja, the glory of the True Name, the story of King Chhatrajit, a dialogue between Narada and Krishna, Yama's messenger questioning Krishna about a devotee of Kabir, accounts of Satyaloka, the soul and Niranjan, the play of Kal and the way to escape it, a dialogue of Niranjan and Vishnu, Shukadeva's many births, King Nirmoh, the marks of a true guru, the Pandavas with Krishna, the sage Kapila, Vyasa asking Kabir to show him Satyaloka, and the way across the Kali age.
The book is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai; the copy scanned is the edition of September 2015. Its 168 pages help readers understand the Kabirpanth's own mythology and cosmology.
कवीरकृष्णगीता ।
१०३
व्याससुखदेववचन ।
व्यासदेव सुखदेव मिल बोले । देहु शरण यम डर मह डोसे ॥
विलखत वदन व्यास सुनि भाषी । कवीर शरण लेहु मोही राखी ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सोइ यमसे बांचा । निज२शब्द कहा यम सांचा ॥
अब तुम होहु निहसंक यमसेती । देउ बीरा चल यमसो जीती ॥
दीन्ह प्रवाना त्रिण तोढाई । व्यासदेव सुखदेव कयाई ॥
चरणोदक महाप्रसाद तब दीन्हा । बहुरसिखापनजीवदयाकोकीन्हा
हम कहैं गुप्त हृदय महाँ राखहु । साधु गुरु हरि महिमा भाषहु ॥
साधु गुरु हरिरूप हमारा । हमरे नाम भज यमसो न्यारा ॥
बेदशास्त्र सुभत जहाँ ताई । सबपर ज्ञान सदुरुको साई ॥
कृष्ण अर्जुन गीता तुम भाषहु । ज्ञान पाठ गीता अब राखहु ॥
हम कह इच्छा देहु प्रवाना । सतकवीर कहैं सुना भगवाना ॥
हमरे भेटहु आवा गवना । लेचल निज घरबहुनअवना ॥
सुनेउ राम बसिष्ठसे रामा । कौन नाम दीन्हो गुरु रामा ॥
जो तोहि पान दे लोक पठाई । तो सतरंजबाजी उठ जाई ॥
विष्णुसयान तिहु लोक न कोई । सतनाम सभ वरत न कोई ॥
क्रितम उपज विनस दुख पायो । आद अजर घर अमर रहायो ॥
जो तुम जैहो अमरलौका । निराकार कहैं होइहै शोका ॥
हम विष्णु जो नाती आज्ञा । बाप तुरक कह कौने काजा ॥
सपूत पुत्र तेहि प्रोजन देई । विन सुचील सुत पान न लेई ॥
कृष्ण कबीर सम्वाद
१०४
कबीरकृष्णगीता ।
निरंजनके वंश यज्ञारा । एक विष्णु तेहि पुरमें सारा ॥
सांच विना बांचे नहिं कोई । भक्त बेपुस तेहि काल बिगोई ॥
तुम कहैं विष्णु चिंता कछुनाहौं । तुम्हरे पास हम सदा रहार्हौं ॥
नरक परे नहिं देहो तोहौं । जो तुम ध्यान शासिहो मोहौं ॥
कि होय सेवक या होय स्वामी । संत गाढ पहुंचे सुरत गामी ॥
जो जेहि नाम न ध्यावे प्राणी । तासु लोक पहुंचे निज गामी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण कबीर बल मोश । करताके करता बंदी छोरा ॥
दोहा-मैं कबीर कहैं चीन्हा, कबीर रूप करतार ।
करता निरंजन कितम, कहैं कृष्ण निरवार ॥
कबीरवचन ।
यह सुन कबीर कृष्णकंठलावा । सीस हांथ दे निकट बैठावा ॥
कहैं कबीर तुम हमरे अंशा । हम चीन्हे विन काल विधंसा ॥
निराकार कहैं जब उपजाया । स्वास तेज कंभी तन आया ॥
आगम तास होय यह काला । जीवन कहैं यम करे बेहाला ॥
तब पुन पुरुष दीन्ह तेहि आषा । योगजीत तेरो सिर खाषा ॥
योगजीत तब उत्पन्न दीन्ह। ताके आस निरंजन छीना ॥
चौंसठ युग सेवा लव लावा । सेवा वस्य राज तिन पावा ॥
अमरलोक ते गये निकास। जब अछूंगा कीन्हे आसा ॥
योगजीत डर काल डराई । नाम कबीर सुनत छिप जाई ॥
वस्तु जीव सब साज हमरा । निरंजन कहैं सौपाल भारा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०५
पुरुष आज्ञा तज मन मत ठाना । निरंजन तोपे काल दिवाना ॥
जीवन कहैं तिन करे अहारा । जीव विवश हो परे बिचारा ॥
तव मोहिँ दाद जीवनकी आई । दासा तन धर भाके दहाई ॥
जो जिव भाके हमारी करि हैं । ताको काल खूंट नहिँ धरि हैं ॥
चारों युग जिवलोक पठावा । युग प्रवान नाम जिव गावा ॥
दोहा--सतयुग सत सुकृत अंचित, त्रेता नाम मुनीन्द्र ।
द्वारपर करुणामय भये, कलयुग नाम कबीर ॥
कहैं कृष्ण तोहि तबहीं चीन्हा । जब पताल राख मोहि लीन्हा ॥
औ सबके गाढे उपकरहू । प्रेमवश्य तुम ओट न धरहू ॥
अहो साहेब मैं तुम्हरे दासा । अजर मुक्त है तुम्हरे पास ॥
पिताके उर छल शुद्ध कछु करहूँ । पिता निरंजन डर हम डरहूँ ॥
बहुर भरोस तुम्हारो सोई । पुण्य धर्मके बात चलाई ॥
निरंजन जाना हमरी वाता । कबीर कृष्ण दोह एके मतराता ॥
जीव दया गुरु भक्त बखानहु । सतसंगति महिमा कथि आनहु ॥
रामनाम गुरु साधुसे नेहा । कहैं कबीर राम गुरु देहा ॥
ठाकुर कहैं मानुष जनि जानहु । राम कृष्ण करता पाहिचानहु ॥
रामकृष्णके हम लघु जेठा । जैसे फेर जन्मपितु बेटा ॥
दोहा--राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके दास ।
स्वामी सेवक होयके, करहिं भक्त प्रकाश ॥
तुम हो व्यास विष्णु औतारा । चौविस महीं तुम भक्त सियारा ॥
हम हरि वंश विष्णु मम अंसा । भक्त रूप हम विष्णु प्रशंसा ॥
१०६
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णु दया जब कीन्ह पुकारा । तब जानो हमरे संचारा ॥
जवहिं निरंजन विष्णु समाई । तब कर विष्णु कपट चतुराई ॥
सबपर श्रेष्ठ जानो सतनामा । कहैं कबीर गुरुपद विश्रामा ॥
गुरुसोई जो यमसो उबारे । जन्म मरण दुख दारुण तारे ॥
कहैं कबीरसो सद्गुरु जानो । राम कृष्णको स्वयं बखानो ॥
कृष्ण वचन ।
कहैं कृष्ण हम निहचे जाना । हम सब पर कबीर प्रवाना ॥
निरंजन आद सो अजर कबीरा । स्वासरूप रमै सकल शरीरा ॥
हममहैं तुममहैं सोहंग जीऊ । स्वास रूप तन जीवके पीऊ ॥
जीव सब अंश कबीरके भाई । देह निरंजन राय बनाई ॥
जो जिव लैहो कबीरके पाना । ताके डर निराकार डेराना ॥
कोटिन केर काल मोहि खावा । निराकार अज शिवहिं नचावा
और जीव केहि लेखा माहीं । रहटके घरिया आवहिं जाहीं ॥
दोहा-रहटके घारिया सरगुण, रीते भर उत्तराय ।
भरी उरध भर खाली, निडर कूपके जाय ॥
जब नहिं धरती अकाश पताला । जब नहिं देह जगत कित काला
नाहिं निरंजन आद भवानी । वहिं तब त्रिगुण पवन औ पानी
तब नहिं दश अवतार मम भयऊ गंगा जती सती नहिं रहऊ ॥
तबकी कहैं कबीर सहिदानी । जबकी काहु मर्म न जानी ॥
कबीर बढाई हम कह दीन्हा । आप मै दास करता मोहि कीन्हा
कहैं कृष्ण सुन आद कहानी । जाके आद वेद नहिं जानी ॥
निर्गुण आद पुरुष अविनाशी । कबीर कहाये प्रगट भये कासी ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०७
दोहा-निर्गुण मूल सकलके, निर्गुण मता अगाध ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास मुनी, कबीर भजे सो साध ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम सब देवन मैं प्रधाना ॥
श्रीमुखसे तुम मोहि वखाना । तुम त्रियलोक धनी हम जाना ॥
सेवक कहैं स्वामी पत देई । स्वामी सेवे सेवक सोई ॥
दोहा-कबीर नाम हरि गावहीं, गुरुके ध्यान अधार ।
गुरु गोविंदके लेखहीं, साधराम रूप अधार ॥
कृष्णवचन ।
कृष्ण कपिल कबीर पगु गहा । सुन स्वामी तुम कैसे कहा ॥
तुम्हरे समान न देखौं काहू । हम सब कर तुम हाथ निवाहू
और सबे सरिता चौमासा । जेठ झुराय सिंधको आसा ॥
सिंधुको जल संसार बिडाई । मेघमाला छपनकोट बरसाई ॥
सरिता सिंधुको सेवक आहीं । स्वामी सरवर कबहुँ नहीं चाहीं
निरगुण वास फूल भये सरगुण । सरगुण देह बोलता निरगुण ॥
कहैं कृष्ण मोहि देहू पाना । तब डर काल मोहि नहीं जाना
जो २ जीव शिष्य सब तोरा । तुव बल जाहि लोक बल जोरा
हमहू कहैं इच्छा यह आई । तुव प्रताप लोक हम जाई ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर तुम हमरे आहू । राज करहु तुव रक्षक साहू ॥
जो तुम होहु प्रगट मम चेल। निराकारको मिटि है सेला ॥
गुप्त हृदय मैं हमकहैं राखहु । प्रगट निरंजन महिमा भाषहु ॥
१०८
कबीरकृष्णगीता ।
जासो गीत हृदय बस जीवा । अंतकाल प्राप्त सोह पीवा ॥
सबसो गीत खसस सो सेजू । सत पग हिय विषै कित तेजू ॥
मुखसो गीत सबहिं प्रभु जानी । गुप्त प्रगट पिथा व्रत चित ठानी
भली छांड नहिं करिय सदाई । भली भला सुरत संतन गाई ॥
कोई मदवारे सो मदफल पावे । विजधर भे मद माद समावे ॥
दोहा-कहैं कबीर श्रीकृष्णसों, जानि छांडहु सत व्योहार ।
सत्ताहिं ते गत पाईये, झूठहिं नरकमें डार ॥
कोटिन काल निरंजन आवै । जो माहि जपै ताहि नहिं पावे ॥
युग २ नाम हमारो गावे । यम विण तोड प्रवाना पावे ॥
हर स्वांस सतनाम समावे । गगन गगन सतनाम सुहावे ॥
अघर सघर दृग दश प्रकाशा । भीतर बाहर राम निवासा ॥
यंत्र मंत्र औषध तप योगा । तीर्थ व्रत देव चंदन भोगा ॥
सबे आस तज भज गुरु साधू । कहैं कबीर सब भेर उपाधू ॥
डरे न यमसो बल कै मोरा । सुमरे नाम कबीर बंदीछोरा ॥
पूजे बोलता सब जिव राधा । मन वच कर्म सतनाम विश्रामा ॥
राधे ध्यान तो जियत तेहि भेटै । विश्वासी जियहिं अंत दुख भेटै ॥
सुन आतुर हरि साज मंगावा । नरिअर पान मिष्टान्न सुहावा ॥
सबे साज आनेउ बहुताई । घृत पकवान सुवास बसाई ॥
सकल देवतन भोजन कीन्हा । तेहि पाछे हरि वीरा लीन्हा ॥
यम विण तोर काल मुख थूँका । दीन्हो पान भेट सब चूका ॥
सतगुण देवता कोट इकादस । सनन पान लीन्हा हरि पारस ॥
रजगुण तमगुण पेल पराने । विष्णु व्यासको निंदा ठाने ॥
कबीरका अपने पन्थकी बात कृष्णसे कहना
कवीरकृष्णगीता ।
१०९
कृष्णवचन ।
यहा आनंद कृष्ण मन भयऊ । मन हम राज निकंटक पायऊ ॥
जेहि रक्षक भये सत्यकबीरा । बार न बंके तासु शरीरा ॥
कृष्णके दुरवासा ऋषि गुरु हैं । सत्य कबीर सबके सटुर हैं ॥
सत् मिले सतकबीरके हाटा । सत् विना जिव वारा बाटा ॥
तीन लोक महीं डंका परिया । सबते श्रेष्ठ कबीर ठहरिया ॥
जीव उबारन ताके सब दासा । विष्णु व्यास सतनाम प्रकाशा ॥
कहैं कृष्ण सेवक जत वाणी । हम तुम सेवक सेवक जानी ॥
जगमहैं कौतुक पंथ चलाई । निज पंथ इस ताहि बलताई ॥
दूत हमार तासु रह दासा । जो कोई होय कबीर गुरु आसा ॥
सबीर नाम प्रति स्वास जप प्राणी । कबीर नाम भज लहे सुखधामी
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम हमरे महीं सकल समाना ॥
जब तुम चाहो दरस मम किया । नाम सरूप प्रेम चित दिया ॥
जाके नाम सरूप चितलावे । गुप्त प्रगट ते दर्शन पावे ॥
अब तुम इच्छा हमरे हांथा । हमरे दास कहैं देहौ साथा ॥
धर्मदास मम अंस औतारा । थापेउं ताहि जम्बूद्वीप कडिहारा ॥
दोहा—धर्मदासके अगुवा, जाग्रित च्छ्रामनदास ।
हम जग होय जगाइब, करव पंथ प्रकाश ॥
जा गुरु नांद पुत्र धर्मदासा । व्यालिस वंश धर्म दास प्रकाशा ॥
पुन एक सुरत गोपाललेव नाऊ । तुम्हरो प्रीत गोपाल सुन भाऊ ॥
तुम्हरी सुरत रहे मम अंगा । हम तुम व्यापक सकलो संगा ॥
११०
कबीरकृष्णगीता ।
राम कबीर कबीर सोइ रामा । अविनाशी सेज संत विश्रामा॥
सब पर दाय़ा करहु गोविन्द । एक भजुरी भक्त अनंद ॥
निरंजनके सुख टेके रहे । सत्यनामके रहनी गहे ॥
सती पतिव्रता सतपंथ सुरा । आपा भेटि मिल सर्व हजुरा ॥
राजयोग छवि गृह विश्रामा । तनसे उद्यम मनसे नामा ॥
जो जिव जपे कबीर धर्मदासा । औ जो सुरतवंश व्यालिस आसा
हमरे पंथके टीका इत जागू । धर्मदासके मिल मोहे लागू ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण जंबूद्वीप धर्मदासा । जागूदास वंश सुरत पास ॥
औरो कौनो दीप तुम सेवा । सो कंडहारा नाम कह देवा ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर कृष्ण सहिदानी । करनाटक वंकेज बखानी ॥
दरभंगा दक्षिण चत्रभुज राऊ । सीलदेश सहने जी सुभाऊ ॥
हम सब ठौर भक्त तुव गाऊं । तुम हमरी महिमा परचारऊं ॥
अपनी महिमा आपहि लाजा । कोइ कहे हम मिथ्या काजा ॥
आपहि आप बडा किये होय पापा । गुरुकी महिमा कहि मिल आपा
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण अब पायऊं जानी । एको जीव तुव गहिं अवखानी ॥
सांचे भाजिहैं सत्यकबीरा । भज कबीर ठेरे भौ पीरा ॥
दोहा-कहे कृष्ण सुन व्यास सुख, औ गऊरस सबकोय ।
सत्यकबीर मुक्तके दाता, सब जीवहिं गत देय ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१११
काल निरंजन बड सुख देई । जार झरकाय पापा खोय लेई ॥
धन्य विष्णु जो कछु सुखदाता । तुम सब कृष्ण कबीर विधाता ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सबहिं जिव तारों । कालहिं बांध रसातल डारों ॥
अषपत सो राजा कंहैं भावे । जो परजाहिं सुख देय न सतावे ॥
कहा करें। निज शब्द हितार्की । नातो छिनयहैं भेट देवे पापी ॥
अब याहि भला बुरा नहिं लेखा । कपुत सपूत भात पितु एका ॥
सब सुत पर पितु करे जो छोहा । निकट अबुध भक्ष देय तोहा ॥
ऐसे निरंजन हमरे वंसा । महाकाल जग घालक संसा ॥
ताते विष्णु तुम मम सिख लीन्हो । प्रगट निरंजन मम चित दीन्हो ॥
हम डर यम थरहर अब कांपे । जो मोहि मजे ताहि लख आपे ॥
कबीरके भक्त विहून जो प्राणी । ताहि काल झरकावे आनी ॥
विष्णुकी भाक्ति संपूर्ण करई । एक रोम तब यमके डरई ॥
और देवनको भक्षे काला । एकहि सत्तकबीर रसवाला ॥
सब मिल भक्ति कबीरके मानी । सत्यनाम महिमा विध आनी ॥
कहैं कृष्णसे सत्यकबीरा । मम वचन सुनहु यदुवीरा ॥
अब हम पंथ जगत विस्तारा । धर्मदास कहैं थापव कंडहारा ॥
जीवलोक कंहैं जाय हमारा । ताहि न पकड़े काल लबारा ॥
भजव जीव सकल कल लोका । सब जीवन कर मेव सोका ॥
ठीका पुन्य सती औ गंगा । सबके सत्त करे निरंजन भंगा ॥
यसि है सकल जीव धर काला । तब हम प्रगटे रूप दयाला ॥
११२
कबीरकृष्णगीता ।
गुरु सद्गुरु साधु दुखभंजन । कबीरनाम ठर डरे निरंजन ॥
कालहिं येट सकल जग तारों । आवागवन दुख सुख निवारों ॥
कृष्णव्याससुखदेवगुरुडवचन ।
कृष्ण व्यास सुखदेव खगराया । चरणटेक सब विनती लाया ॥
हम सेवकपर दाय़ा करिये । पल २ छोह हमारो धरिये ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर हम निकट प्रेमत । नाम भजे भौ तरे क्षमाते ॥
प्रेम बैन कहि गावे वीरा । संग सबनके स्वास शरीरा ॥
बहुर ध्यान विनति प्रकाशा । वरणहु कृष्ण चाल हरिदासा ॥
संसारी जिव कैसे तरि हैं । सत्यनाम विन भौजल परि हैं ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण जिवको निरतारा । विन कबीरको जीवहि तारा ॥
पूर्ण पुण्य जब जीवहि होय पूरा । तबसों नाम कबीर भज सूरा ॥
कबीर नाम प्रताप बड भागी । मुक्त होय सो संत सोहागी ॥
कबीर शरण तब प्राप्त होई । परम पुनीत कबीर भज सोई ॥
कोट जन्म पुण्य प्रकासा । पूरण पुण्य होय सद्गुरु दासा ॥
सत्यकबीरको सद्गुरु जाना । सद्गुरु अंश मोहिं पहिंचाना ॥
हमहू सत्यनामकी आसा । वांचहि काल निरंजन फांसा ॥
जिम जगकी इसलता नहि सेवा । खातिर चटै न पाइक देवा ॥
तैसे शरण कबीर प्रतापा । होय निश्चित छूटे तिहु तापा ॥
जो लागि बनि जीवको निरतारा । विन कबीरको जीवहि तारा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
११३
पूर्ण पुण्य होय जिव पूरा । तब जिन नाम कबीर भज सुरा ॥
कबीर नाम प्राप्त बड भागी । संत सोहागिल सो अतुरागी ॥
कबीर शरण तब प्राप्त होई । परम पुनीत कबीर भज सोई ॥
कोटिन जन्म पुण्य प्रकाश । पूरण पुण्य होय सदुरु दासा ॥
सत्यकबीरको सदुरु जाना । सदुरु अंश मोहिं पहिचाना ॥
हमहुं सत्यनामकी आसा । बांचहि काल निरंजन फांसा ॥
जौलग बनिज न हीरालाला । तौलग संग्रह धोधी रिसाला ॥
जौलग पारस हांथ न आवे । रती हेम दुलैभ कहैं पावे ॥
जौलग अमी वृक्ष सुध नहीं । तौलग ताड खजुरहिं खांही ॥
अस कबीर बिना सब धर्मा । कबीर बिना जिव मिटे न भर्मा ॥
गरुडवचन ।
कहैं गरुड सुन त्रिभुवन राई । तुम अंतर करेहु गोसाई ॥
तुम कबीर मिल जीव बचाहू । समय परे कस जीव नचाहू ॥
तुम यम दिशि होय बोलत अहहु । दुर्वल जीव लस दष्ट न खोलहु ॥
श्रीकृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन गरुड सज्जानी । बातकी जड तुमहु नहीं जानी ॥
हम हैं निराकारके बेटा । पितु आज्ञा जाय नहीं मेटा ॥
कहा निरंजन मोहि बुझाई । चित्र गोपित्र औ जहां रिसाई ॥
कहिन केहैं निरगुण दासा । दूतन जायहु तिनके पास ॥
तिनके दास छुयेहु जिन कोई । निरगुण भक्त कबीर निज सोई ॥
कबीर प्रताप राज हम करहीं । कबीरके श्रोह किये जरि माहीं ॥
सत्यकबीर सो अलगहि जीऊ । तेहि तर लावहु कर हद धीऊ ॥
अवतारोंमें सर्वश्रेष्ठ अवतारका नाम
११४
कबीरकृष्णगीता ।
निरंजनवचन ।
दोहा—कहैं निरंजन कृष्ण सुन, निर्गुण भक्तहिं छांड ।
निर्गुण भक्त विहून जो, ताहि नरक ले डार ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन पत्तग आसी । यह विध जीव भयें चौरासी ॥
उत्तम भक्त कबीरको आहीं । महिमा जीव विरल लखताहीं ॥
आद अनाद निरगुण कबीरा । स्वासरूप रम सकल शरीरा ॥
जब कबीर तब और न कोई । कबीरके किये सृष्टि सब होई ॥
सवते उत्तम सत्य कबीरा । तिनके निकट विष्णु धर धीरा ॥
विष्णु निकट ब्रह्मा ठहरायै । ब्रह्मा निकट रुद्र चल आयै ॥
देवी निरंजन ऊपर नीचे । सत्यकबीर न्यारा सब बीचे ॥
सत्यकबीर प्रसंग सतोगुण । सद्गुण विष्णु देव सो निरगुण ॥
निरंजन अंश ब्रह्मा मन रूपी । अर्धंगी अंस रुद्र अंधकृपी ॥
एक भाव जग बरते कैसे । ताते पृथक् २ भौ ऐसे ॥
सद्गुण बसो रजतमके माहीं । ताते विष्णु सत्य विरथाहीं ॥
दोहा—सत्यकबीरके शिष्य सुत, ताते सद्गुण विष्णु ॥
दस चौबिस विष्णु तन तामो, सृष्टि राम विष्णु ।
रजगुण तमगुण देह बनाई । सतोगुण अंस जिव आन समाई ।
रजमता अर्धंगी भवानी । तमगुण पिता निरंजन जानी ॥
सत्यकबीरके अंस सतोगुण जीऊ कहैं कृष्ण जिव सब जग पीऊ ॥
दोहा—जीव जगमें पीउ है, जीव कबीरके आहिं ।
कबीरसो आप सत्पुरुष हैं, अमरलोक रहाहिं ॥
कबीरकृष्णगीता ।
११५
जव जिव डेह निरंजन राई । तवै जीव रोवे चिल्लाई ॥
जाकर जीव ताहि दुख न्यापे । कबोर कहाय प्रगट प्रभु आपे ॥
जीव जरत उबारैउ कबीरा । करे भक्त जब धरे शरीरा ॥
जीवहिं धोखे परे खुलाई । सार असार चीन्ह नहिं पाई ॥
देह धरे विसरे सब ज्ञाना । देहसे न्यारा भये सब जाना ॥
जगको वेद शास्त्र अरुझावे । कबीरके भक्त नहिं विप्र हटावे ॥
कुसहा ब्राह्मण अगुवा काला । कर्मवश्य जिवपरे बिहाला ॥
दे विश्वास जो पुण्य करावे । मृतक आस जो पूर्व फल पावे ॥
जियत कर्मफल नेक न दृष्टा । पूर्वल आस मरे सो मिष्टा ॥
सौदा सोई जो दीखे दृष्टा । फल औ फूल दृष्टि सुख चिष्टा ॥
दोहा--उपजन विनसनको मता, ब्राह्मण काजी भाष ।
स्थिर घर जो पहुँचे जो, सत्यकबीर व्रत राख ॥
षोडश रवि शशि भाल छवि, अग्र अमी रस चाख
अस सुख सत्य पुर मई, शब्द भेद मत भाष ॥
रजगुण तमगुण जोत सतंगी । सतगुण विष्णु कबीर प्रसंगी ॥
सत्य कबीरके पारस सेती । सतोषुण राम कृष्ण विष्णु केती ।
फिर २ जीव भ्रमें चौरासी । निरगुणको निंदक त्रिगुण उपासी
धन्य एक जासो भय तीनी । माय बाप गुरुते सब चीन्ही ॥
दोहा--माय बाप गुरु सद्गुरु, साध संत द्विज एक ।
पवन एक बाजा बहुत, कहैं कृष्ण सत देक ।
११६
कबीरकृष्णगीता ।
विनय विष्णु जो परम सुहाई । आज्ञा करहिं कबीर गोसाईं ॥
आज्ञा सब जिव दियोसुत्काई । ऐसी करब हमसों किम भाई ॥
तात मातते गुरु अधिकार्ई । सद्गुरु शरण बिना जिव खाई ॥
बिना कबीर न वांचे भाई । कबीर साहेब सद्गुरु साईं ॥
कोटि माहिं कोई जीवमुनीता । संत साध संग पाठ कृत गीता ॥
गीतामाहिं बहु संघ कबीरा । मिले ताहि जो मथे अर्थ क्षीरा ॥
मथे क्षीर ले याखन तावे । तब घृत वास सुवास बसावे ॥
तिम कबीर सतघृत कुल वासा । और पंथ विन आसतिक आसा ॥
दोहा-वेद मथके गीता कीन्हा, गीता मथके सार ।
सार सो सार कबीर बखानहि, भाषे कृष्ण सुरार ॥
जिमि सब तनमें चक्षु नाका । तस तनमें स्वासा जिव ताका ॥
सबे कबीर कहि २ गोहरावा । तत्क्षण सत्यकबीर चलि आवा ॥
सबे कबीर घ्राणमें होतहि पहुँचै । परे सवनमें दृष्टि कबीरके ॥
थरहर उठे सबे भहराई । चरण परवार सिंघासन बैठाई ॥
चरणोदक ले विनती कीन्हा । कहँ गयउ साहेब दरश विन दीन्हा ॥
कबीरवचन ।
कहँ कबीर गये जिवके खोजा । दयावंत मिले सुनीई इन सोझा ॥
दया सत् जहाँ वास हमारा । राम कबीर एक चटसारा ॥
का हिंदूका तुरक सब जाती । तारों नाम भक्त मिल पाती ॥
जात पात है त्रिगुण पसारा । विष्णु अवरण चौथे निसतारा ॥
चौथे कबीर तिनते श्रेष्ठा । सद्गुरु भक्त बिना जिव नष्टा ॥
व्यास और कृष्ण सम्वाद
कबीरकृष्णगीता ।
११७
दोहा- विष्णु देह धर खेले, अलख निरंजन कृष्ण ।
सब लहुरे हैं कबीरते, राम कृष्ण शिव विष्णु ॥
गुप्त प्रगट निरगुण वो सरगुण ।
व्यास उक्ति मति श्रेष्ठ सो निरगुण ॥
कहैं कबीर व्यासकी बाणी । गीता मता सार सब ठानी ॥
करहु प्रकाश भागवत गीता । सुने ज्ञान जिव मिटे मन चीता ॥
हम कबीर जिव दाया ददावे । जहां सत् ताके हिं अावे ॥
सत्यकबीर हमारो नाऊं । दया सत्यके निकट रहाऊं ॥
तुम पूछेहु कव गवनेहु स्वामी । मक्का पहुँचेउ सुन नभगाभी ॥
रायअमोलिक कहैंशिष्यकीन्हा । नाम पानदे सुक कर लीन्हा ॥
जम्बुदीप धर्मदास कंडहारा । ताके अगुवा जीवन कंडहारा ॥
जागु प्रगटके जगत जगैहैं । कबीर धर्मदासके भक्त दैहैं ॥
जागू कहायब सत्यकबीरा । लहुरा कबीर जागु गंभीरा ॥
कहैं कबीर हम जगमें नासक । दासातन धर दास हो दासक ॥
सो सुनिये त्रिभुवनपति राई । कबीरधर्मदासजीवजीवतरजाई ॥
व्यासबचन ।
कहैं कृष्णसों व्यास सुजाना । जब भगवान कहो कछु ज्ञाना ॥
अगले जीवन शब्द सहाई । परख शब्द पंथ ज्ञान चलाई ॥
ऊंच नीच तन सब जिव तरई । बहुरिन योनी संकट पाई ॥
बेर अनंत पूछहु मोहिं भाई । सुकदाता कबीर ठहराई ॥
कबीरके भक्त बडे तप पावे । त्रिगुण कर्म भर्म अरुझावे ॥
साधुके लक्षण - रमता और बैठाका भाव
११८
कबीरकृष्णगीता ।
जहँ कबीर समर्थ गुरु आपे । सुखपे पान नाक किम थापे ॥
पूछहु सत्यकबीरसे जाई । कबीर कहै सोइ बीज ठहराई ॥
कहै व्यास तुम करता स्वाधी । कबीर समर्थ करता सुखखानी ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण व्यास निज दासा । गुरुके एक रोम प्रति आसा ॥
करता हरता दाता भुगता । गूह बैरागी योगी जुगता ॥
कौनहु पंथ गुरु सम नहीं कोई । सबपर श्रेष्ठ कबीर गुरु सोई ॥
सुन सतनाम कबीर गोसाई । गूही विरक्त गत देहैं चिन्हाई ॥
गरुडव्यासवचन ।
गरुड व्यास हरि चरण लपटाने । कबीर चरण गहि विनती ठाने ॥
कबीरसे पूछहिं व्यास निरुवारा । रमता बैठे भाव विचारा ॥
स्थिर रमता भेद बताऊं । ग्रेही औ बैराग सुनाऊं ॥
तुम कहैं प्रिय रमताकी बैठे । बैरागी प्रिय औ गूह गूढा ॥
धर्मदास तुम्हरे कंडहारा । नाम बोहित तुव नाम अधारा ॥
और सबके तुम हो सुखदाई । सुक्त पंथ मोहि कहो समुझाई ॥
कबीरवचन ।
कहै कबीर गरुड सुख व्यासा । कृष्ण सभेत सुनहु सब दासा ॥
कहै कबीर सुनो सुनि व्यासा । भो मोहि प्रीत भजे मोहि दासा ॥
ग्रेही भक्त सो उत्तम आहि । बैरागी उत्तम गूह माही ॥
ग्रेही भक्त आपन कुल तारे । बैरागी औरन निस्तारे ॥
ग्रेही भक्तसो ना कर भाऊ । बैरागी पारस निरभाऊं ॥
साकट आमिष अहारी प्रेता । खोवे हीरा जन्म अचेता ॥
धन्य भाग जो राधेव नामा । नाम भक्त प्रीत सुखधामा ॥
कवीरकृष्णगीता ।
११९
बिन सतनाम तरे नहिं कोई । क्रीतम नाम ते काज न होई ॥
सत्यनाम सदुरु लख पावे । यम फंद काट सुकतावे ॥
अगरलोक ले राखें हंसा । छूटे जन्म मरणकी संसा ॥
सदुरुकी आसा चित राखे । सोई करे शिष्य जो गुरु भाषे ॥
केते शिष्य गुरुको तज भागे । तीर्थ व्रतकी आसा लागे ॥
तीर्थ व्रत कोइ तारे नाही । सबे सुकत गुरुसेवा भाहीं ॥
एक लाभ दिसंतर होई । साध दरश गुरु लाभ है सोई ॥
औ तन मन दृढ रहे गुरुसेवा । ते फल सब घर बैठे लेवा ॥
अथवा जो मन होय उदासा । देखिय संतनकेर विलासा ॥
तो गुरु सेवा महँ कोइ राखी। करहु दिसंतर दानेहं साखी ॥
गुरुकहैं अकेला तजे न भाई । कल्पे गुरु तेहि दोष बहु भाई ॥
गुरु आज्ञा जो करे दिसंतर । नाम सुरत गुरु ध्यान निरंतर ॥
दोहा—सात पांच संमत भरी, गुरु सेवा चित राख ।
तब गुरु आज्ञा लेयके, करे दिसंतर जाय ॥
करे दिसंतर देखे देश । देखे राजा रंक नरेशा ॥
ज्ञानीके दशा विचारे लेखे । काम क्रोधका सुरचा पेखे ॥
मनकी दशा चीन्हु विसरावे । मन मायाका रंग न भावे ॥
जहँलग कुपंथ धोखा भ्रमा । तहँलग आय मन माया कर्मा ॥
नागिन नारका चौंट बचावे । नाम ध्यानसो दशा जुगावे ॥
आपा त्यागे रहे दीनता । शब्द प्रकाशे नाम लीनता ॥
१२०
कबीरकृष्णगीता ।
सत्यनामकी यहिमा भाषे । तृष्णा लोभ न मनयें राखे ॥
रहे असोच सो आपन कामा । पल २ निशि दिन आठहु याभा ॥
पर पोषण भिक्षा नहीं लाजा । निच पिच करहि बल सभाजा ॥
बेगमी रहे भरोसे साहेब । सोई संत सब माहि सुसाहेब ॥
आवे सहज विचार सो पावे । परिहरि आश्रिष अंकुर फल पावे
सत्यपुरुष कहैं भोग लगाने । महाप्रसाद संत मिल पावे ॥
कोइ जीव वचन नहीं पावे । सबर्म राम कबीर कहावे ॥
कोई फकीर होय पाले देहा । मकरा तजि गोहसो नेहा ॥
जो साहेब भेजे सो पावे । रुखा सूखा नहीं विलगावे ॥
क्या पाटम्बर क्या टाटम्बर । क्या चिंतामणि क्या पीतांबर ॥
जो साहेब भेजे सो सही । कलपत भिक्षा लेना नहीं ॥
विन मांगे कोइ कोट चढावे । सो लीजे कछु दोष न आवे ॥
सहज अजाची भिक्षा आवे । आप चुगे औ सबहि चुगावे ॥
गुरु पूजा संतन सेवकाई । सबसो भीत सुमत सुचिताई ॥
वह माया कहु कौने काजा । जो नहीं परमारथ पथ साजा ॥
एक जो माया जोगवहि भाई । विलसहि आप औरन डहकाई ।
यह माया है यमकी फांसी । नाम विना भरणें चौरासी ॥
दोहा-माया है दो भांतिकी, जो कोइ जाने खाय ।
एक मिलोवे नामको, एक नरक ले जाय ॥
आसुरी माया आपाहि पोवे, गाढे परे न हट ।
सातकी सो परमारथ, संतन घाले मूठ ॥
माया जुगवे कौन गुण, अंत न आवे काज ।
कबीरकृष्णगीता ।
१२१
सत्यनाम जुगावहु, माया परमारथ साज ।
संखपछन ले माया, भक्तिहीन जो होय ॥
ता तेहि यम ले आसे, नरक परे पुन रोय ॥
रंक जीव जो सोई, सोई माहि धनवंता ।
धनवंता तो हरि भजे, तो हरष मिले भगवंता ॥
रंक धनीको नहिं चाहे, चाहे प्रेम प्रतीत ।
गुरुभक्ता मोहि भावे, कहैं कबीर अतीत ॥
गुरुभक्ता मम भक्ता, साथ भक्त मम दास ।
हरिभक्ता सोऊ हम, कहैं कबीर हरि व्यास ॥
आत्मपूजा जिव दया, परआत्मको सेव ।
कहैं कबीर सत्यनाम भज, सहज परम पद लेव ॥
पांचहुको लखे परंपंचा । नाम भजे जिव पावे संचा ॥
पांचों परंपंची तन सुगता । पांच तीन साथे अवधूता ॥
सुर नर अज हरि हर सुनि जेतै । तन घर पांच तीन घर तेतै ॥
विरला गुरु गम परखि भये न्यारा । सो वांचे जिन शब्द विचारा ॥
जो राजामहैं थाको माना । शब्द महंत महातम जाना ॥
शब्द विना जग बाउर अंधा । शब्द विना जग परे यमफंदा ॥
सहुर शब्द परख पंथ चाला । जो जीते जग बरवस काला ॥
मन काल निरंजन अंसा । अज्ञानीको करे विधंसा ॥
ज्ञान प्रवेश होय मन सांचा । नाम बचे जिव यमसों वांचा ॥
भजे नाम जो मन चितलाई । पांच पचीस तीन थक जाई ॥
गगट होय कला सतनामा । शब्द परख चले तेहि शुभ कामा ॥
६
१२२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा—नैन नासिक जिभ्या, श्रवण इंद्री स्थान ।
पाचों आने सहज घर, सोई सिद्ध प्रवान ॥
जिभ्या बंका घाट जुगावे । मिथ्या चुगल आमिस न भावे ॥
जो बोले सो अक्षर सूचा । नाम भक्त सतसंगत ऊंचा ॥
जो साहेब देय धार वृत्त मेवा । सहज भाव कर दोनो लेवा ॥
जैसा भीठा दधि घृत खोवा । फिरका साग ताहि संजोवा ॥
जिभ्या अग्रवास रस भीठा । रसना उतर कंठ तर फीका ॥
दोहा—जैसा भीठा घृत पक, तैसा फीका साग ।
सत्यनाम सो राचे, कहैं कबीर वैराग ॥
ग्रेही साध सेवा करे, भाव भक्त आनंद ।
कहैं कबीर वैरागी, निरवानी निरद्वंद्व ॥
शब्द विचारे पंथ चले ज्ञान गली दे पांव ।
क्या रमता क्या बैठे क्या गृह कंदल छांव ॥
सुरत सोहागिल सो सही, जो गुरु आज्ञा माहिं ।
गुरु आज्ञा जो भेटे, ताहि कुशल हो नाहिं ॥
पिय सन्मुख सेवा करे, जो पतिव्रता जान ।
पिय तज जो जित तित रमे, वरत भंग तप मान ॥
गुरुआज्ञा ले आवे, गुरु आज्ञा ले जाय ।
कहैं कबीर सो संत प्यारे, बहुविध अमृत खाय ॥
कहैं कबीर गुरु प्रेमवश, क्या नेरे क्या दूर ।
जाको चित जासों बसे, सो तेहि सदा हजूर ॥