काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
by धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज
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से कहा था कि धृतराष्ट्र के जीवन के अभी तीन वर्ष शेष हैं ।
'तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम् ।
वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोऽस्य परमायुषः ॥'
( म० भा० आश्रमवासिक पर्व २०।३२ ) ।
महाभारत का युद्ध कलि और द्वापर की सन्धि में हुआ ।
'अन्तरे समनुप्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् ।
समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥'
( महाभारत आदिपर्व २।१९ )
अर्थात् द्वापर और कलि के मध्य में कौरव-पाण्डवों का युद्ध हुआ । महा-
भारत युद्ध के ३६ वर्ष बीतने पर परीक्षित का राज्याभिषेक हुआ । परीक्षित
ने ६० वर्ष तक राज्य किया ।
महाभारत युद्ध से ९६ वर्ष पर बाल्यकाल में ही जनमेजय का राज्या-
भिषेक हुआ । वयस्क होने पर विवाह हुआ । विवाह के कुछ ही दिनों बाद
उत्तङ्क की प्रेरणा से जनमेजय ने सर्पसत्र आरम्भ किया । उसी यज्ञ में वैश-
म्पायन ने महाभारत सुना था । उसी महाभारत को महर्षि व्यास ने जय
नामक महाकाव्य कहा । यह 'जय' ही विविध उपाख्यानों के सहित लिखा
हुआ भारतीय युद्ध का विशद् इतिहास है । महाराज युधिष्ठिर के विजय के
उपलक्ष्य में लिखे जाने के कारण उनके समय में ही इसका लिखा जाना
उचित है ।
तथा धृतराष्ट्र के समक्ष उनका पराभव लिखना उचित न होता, अतः
महाराज धृतराष्ट्र को परमपद प्राप्त होने के अनन्तर महाभारत युद्ध के बीस वर्ष
बाद और ३६ वें वर्ष के पहले ही महाभारत संहिता निर्माण का समय है।
अहं तु कीर्तिमेतेषां कुरूणां भरतर्षभ ।
पांडवानां च सर्वेषां प्रथयिष्यामि मा शुचः ॥
( म० भा० मौ० प० २।१३ )