ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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About this granth
Jnana Yoga (ज्ञानयोग) collects Swami Vivekananda's (1863–1902) lectures on Vedanta, delivered mainly in London and New York. The foreword to this Hindi edition says he explained the deepest ideas of Vedanta so plainly that they appeal readily to educated readers today, and showed how Vedanta can shape both personal and social life.
The lectures take up the necessity of religion, the real nature of man, maya and illusion, maya and the evolution of the idea of God, maya and freedom, the Absolute and its manifestation, God in everything, realisation, unity in diversity, the freedom of the soul, the cosmos as macrocosm and microcosm, immortality and the Atman. Their common thread is that human nature is divine and that recognising this is liberation.
This translation was published in June 1950 by Shri Ramakrishna Ashrama, Nagpur, as No. 49 of its Shri Ramakrishna-Shivananda Smriti Granthamala, with Swami Bhaskareshwarananda, head of the Ashrama, as publisher; it was printed at the Rameshwar Printing Press, Nagpur. The 332 pages present Advaita Vedanta in a modern idiom.
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खोज करने का उन्हे साहस नही होता है। जब हम सुनते है कि प्राचीन काल के किसी साधु या ऋषि ने सत्य को प्रत्यक्ष किया है तो हम कह देते है कि वह सब भूल है; परन्तु यदि कोई कहे कि हक्सले का मत है या टिण्डाल ने बताया है तो हम तुरन्त सारी बाते मान लेते है। प्राचीन कुसस्कारों की जगह हम आधुनिक कुसंस्कार लाये है, धर्म के प्राचीन पोप के बदले हमने विज्ञान के आधुनिक पोप का स्वागत किया है! अतएव हमे मालूम हो गया कि स्मृति-सम्बन्धी शंका खोखली है। और पुनर्जन्म के बारे मे जिन आपत्तियो की अवतारणा की गयी है उनमे यही एक है जिसे विज्ञ लोग सामने ला सकते है।
हमने यह देखा है कि पुनर्जन्मवाद सिद्ध करने के लिये साथ ही साथ स्मृति भी रहे—यह प्रमाणित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर भी हम दावे के साथ यह कह सकते है कि अनेको मे ऐसी स्मृति आयी है और जिस जन्म मे तुम लोगो को मुक्तिलाभ होगा उस जन्म मे तुम लोग भी ऐसी स्मृति के अधिकारी बनोगे। तभी तुम्हे मालूम होगा कि जगत् स्वप्न-सा है, तभी तुम अन्तस्तल से अनुभव कर सकोगे कि तुम इस जगत् मे नट मात्र हो और यह जगत् रंग-भूमि है, तभी प्रचण्ड अनासक्ति का भाव तुम्हारे भीतर उदित होगा—तभी सब भोगवासनाएँ, जीवन से इतना प्रेम—यह संसार आदि, सब चिरकाल के लिये लुप्त हो जायेगे। तब तुम्हे स्पष्ट मालूम हो जायगा कि जगत् मे तुम कितने बार आये हो, कितने लाखो बार तुमने पिता, माता, पुत्र, कन्या, स्वामी, स्त्री, बन्धु, ऐश्वर्य, शक्ति लेकर इसी जगत् मे जीवन बिताया है। यह सब कितने बार हुआ था, फिर कितने बार चला गया था। कितने बार संसार-तरंग के सर्वोच्च शिखर पर तुम चढ़े थे और कितने ही बार नैराश्य के अतल गर्त में
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तुम गिर गये। जब स्मृति यह सब तुम्हारे मन मे ला देगी केवल तभी तुम वीर-से खडे हो सकोगे तथा ससार के कटाक्ष तुम हॅसकर उडा दे सकोगे। तभी वीर की तरह खडे होकर तुम कह सकोगे, “मृत्यो, तुझसे मै जरा भी नहीं डरता, तुम व्यर्थ क्यों मुझे डराने की चेष्टा कर रहे हो?” जब तुम जान जाओगे कि तुम पर मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं है, तभी तुम मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकोगे एवं धीरे धीरे हम सभी इस मृत्युजयी अवस्था मे पहुचेगे।
आत्मा का पुनर्जन्म होता है इसका कौन सा युक्तियुक्त प्रमाण है? अब तक हम शका का समाधान कर रहे थे। हमने देखा कि पुनर्जन्मवाद अप्रमाणित करने के लिये जो युक्तियाँ उठाई जाती है वे खोखली है। अब पुनर्जन्मवाद के पक्ष मे जितनी युक्तियाँ हैं उनकी हम आलोचना करेगे। पुनर्जन्मवाद के बिना ज्ञान असंभव है। मानो मैने रास्ते पर एक कुत्ता देखा। मै कैसे जान पाया कि वह कुत्ता ही है? जैसे ही मेरे मन पर उसकी छाप पडी वैसे ही उसे मै अपने मन के पूर्वसंस्कारो के साथ मिलाने लगा। मैने देखा कि वहाँ मेरे समस्त पूर्व-संस्कार स्तर स्तर मे अवस्थित हैं। ज्योही कोई नया विषय आया त्योही मैने प्राचीन संस्कारो से उसकी तुलना की। जैसे ही मैने अनुभव किया कि उसी की भाँति और भी कई संस्कार वहाँ विद्यमान हैं, वैसे ही उसकी तुलना करने लगा—तभी मै तृप्त हुआ। मैने तब उसे कुत्ते के नाम से जान पाया, क्योकि पहले के कई संस्कारो के साथ वह मिल गया। जब हम उस जैसे संस्कार को अपने भीतर नहीं देख पाते हैं तभी हममे असतोप पैदा होता है। इसीको अज्ञान कहते है। और सन्तोष मिल जाने से ही ज्ञान कहलाता है। जब एक सेव
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गिरा तो मनुष्य को असंतोष हुआ। इसके बाद मनुष्य ने क्रमश इसी प्रकार की कई घटनाएँ देखीं। श्रृंखला की तरह ये घटनाएँ एक दूसरे से बंधी हुई थी। यह शृंखला क्या थी ? वह शृंखला यह थी कि सभी सेब गिरते है। और इसीको उसने 'माध्याकर्षण' का नाम दिया। अतएव हमने देखा कि पहले की अनुभूतियाँ न रहने से कोई नई अनुभूति प्राप्त करना असंभव है, क्योकि उस नयी अनुभूति से तुलना करने के लिये कुछ भी नही मिल सकेगा। इसलिये कई यूरोपीयन् दार्शनिको का जो मत है कि 'पैदा होते समय बच्चा ससारशून्य मन लेकर आता है' यदि सच हो तो संसार से उसे संस्कारशून्य मन लेकर जाना पड़ेगा क्योंकि नयी अनुभूति के साथ मिलने के लिये उसने कोई सस्कार ही नहीं हैं। अतएव हमने देखा कि इस पूर्वसंचित ज्ञान-भाडार के बिना कोई नया ज्ञान प्राप्त करना असंभव है। वस्तुतः हम सभी को पूर्वसचित ज्ञान-भांडार अपने साथ लेकर आना पडा है। ऐसे ज्ञान के बिना जानने का और कोई दूसरा उपाय नहीं है। यदि हमे यहाँ पर वह ज्ञान नहीं मिला हो तो अवश्य ही हमने अन्य कहीं से उसे प्राप्त किया होगा। मृत्यु से हम सर्वदा डर जाते है, लेकिन क्यों ? मुर्गी का एक बच्चा जो अभी पैदा हुआ है, एक चील को आते देखकर भाग गया। उसने कहाँ से तथा कैसे सीखा कि चील मुर्गी के बच्चों को खा जाती है। इसका एक पुराना विश्लेषण है, किन्तु उसे हम सिर्फ विश्लेषण ही नहीं कह सकते। वह स्वाभाविक सस्कार (Instinct) कहा जाता है। मुर्गी के उस छोटे बच्चे मे कहाँ से मरने का डर आया ? अंडे से अभी अभी निकली बत्तक पानी के निकट आते ही क्यो कूद पडती है तथा तैरने लगती है ? वह तो पहले कभी तैरना नहीं जानती थी, न तो पहले उसने किसीको तैरते
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देखा है। लोग कहते हैं कि वह "स्वाभाविक ज्ञान" है। "स्वाभा-
विक ज्ञान" कहने से हमने एक लम्बे चौड़े शब्द का प्रयोग किया
है इतना ही, किन्तु उसने हमें नयी कोई वस्तु नहीं सिखाई। अब
आलोचना की जाय कि यह स्वाभाविक ज्ञान है क्या। हमारे
भीतर ही अनेक प्रकार के स्वाभाविक ज्ञान वर्तमान हैं। मानो
एक व्यक्ति ने पियानो पर गाना बजाना सीखना शुरू किया। पहले
'सरगम' की ओर गहरा ध्यान देकर उंगलियों को चलाना पड़ता है,
किन्तु कई महीनो तथा सालो अभ्यास हो जाने पर उंगलियाँ आप ही
आप ठीक ठीक स्थानो पर चलती फिरती है और वह स्वाभाविक हो
जाता है। किसी समय जिसमे ज्ञानपूर्वक इच्छा का प्रयोजन होता था,
उसमे और उसकी कोई ज़रूरत न रह गई, एवं ज्ञानपूर्वक इच्छा के
बिना ही वह अब सम्पन्न हो सकता है और उसी को स्वाभाविक ज्ञान
कहते है। पहले यह इच्छा के साथ था, अन्त मे उसमे इच्छा का कोई
प्रयोजन न रहा। किन्तु स्वाभाविक ज्ञान का तत्व अभी पूरा नहीं
कहा गया है, अब भी आधा रह गया है। वह यह है कि जो सब
कार्य अब हमारे लिये स्वाभाविक हैं, प्रायः उन सभी को हम अपनी
इच्छा के वश मे ला सकते है। शरीर की प्रति पेशी को ही हम
अपने वश मे ला सकते है। आजकल यह विषय हम सभो को अच्छी
तरह से ज्ञात है। अतएव अन्वयी व व्यतिरेकी इन दोनो उपायो से
ही प्रमाणित किया गया है कि जिसे हम स्वाभाविक ज्ञान कहते हैं
वह इच्छाकृत कार्य के अवनत भाव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
अतएव जब सारी प्रकृति मे एक ही नियम का राज्य है तो समग्र
सृष्टि मे 'उपमान-प्रमाण' का प्रयोग करके इस सिद्धान्त पर हम पहुंच
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सकते है कि तिर्यग् जाति व मनुष्य मे जो स्वाभाविक ज्ञान के रूप मे प्रकट होता है वह केवल इच्छा का अवनत भाव है।
बहिर्जगत् मे हमें जो नियम मिला था, अर्थात् “प्रत्येक क्रम-विकास-प्रक्रिया के पहले एक क्रम-संकोच-प्रक्रिया रहती है और क्रमसकोच के साथ साथ क्रमविकास भी रहता है” इस नियम से हम स्वाभाविक ज्ञान का कौनसा तात्पर्य निकाल सकते है? यही कि स्वाभाविक ज्ञान विचारपूर्वक कार्य का क्रम-सकुचित भाव है। अतएव मनुष्य अथवा पशु मे जिसे हम स्वाभाविक ज्ञान कहते है वह अवश्य ही पूर्ववर्ती इच्छाकृत कार्य का क्रम-संकोच भाव होगा। और ‘इच्छा-कृत कार्य’ कहने से पहले यह अपने आप ही स्वीकृत हो जाता है कि हमने अभिज्ञता या अनुभव का लाभ किया था। पूर्वकृतकार्य से वह संस्कार आया था और वह संस्कार अब भी विद्यमान है। मरने का भय, जन्म से ही तैरने लगना तथा मनुष्य मे जितने अनिच्छाकृत स्वाभाविक कार्य पाये जाते है वे सभी पूर्व-कार्य व पूर्व-अनुभूति के फल है—ये ही अब स्वाभाविक ज्ञान के रूप मे परिणत हुये हैं। अब तक इस विचार मे हम आसानी से आगे बढ़ सके है और यहाँ तक आधुनिक विज्ञान भी हमारा सहायक रहा। आधुनिक वैज्ञानिक धीरे धीरे प्राचीन ऋषियो से सहमत हो रहे है एवं प्राचीन ऋपियो के मत को वैज्ञानिक जहाँ तक मान लेते हैं वहाँ तक कोई गड़बड़ नही है। वैज्ञानिक मानते है कि प्रत्येक मनुष्य एवं प्रत्येक पशु कई अनुभूतियो की समष्टि लेकर जन्म लेते है, वे यह भी मानते है कि मन के ये सब कार्य पूर्व अनुभूति के फल है। किन्तु यहाँ पर वे लोग और एक प्रश्न पूछते है: उन लोगो का कहना है कि यह बात कहने की क्या आवश्यकता है कि ये अनु-
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भूतियों आत्मा की हैं ? ऐसा कहना ही ठीक है कि वे सब शरीर के धर्म हैं। इसे आनुवंशिक संचार (Hereditary Transmission) ही कह सकते हैं। यही शेष प्रश्न है। जिन सब संस्कारों को लेकर मैंने जन्म लिया है वे हमारे पूर्वजो के संचित संस्कार हैं, ऐसा हम क्यो न कहे ? छोटे जीवाणु से लेकर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य तक सभी के कर्मसंस्कार मुझमे मिले हुए हैं, किन्तु आनुवंशिक संचार के कारण ही मुझमें वे आकर मिल गये हैं। यदि हम ऐसा कहते तो कौनसी बाधा होती ? यह प्रश्न बहुत ही सूक्ष्म है। हाँ, इस आनुवंशिक संचार को कुछ अंश तक हम मानते हैं। लेकिन हम इतना ही मानते हैं कि इससे आत्मा को रहने के लिये एक स्थान मिल जाता है। हम अपने पूर्व कर्मों के द्वारा शरीरविशेष का आश्रय लेते हैं। और जिन्होंने उस आत्मा को संतान के रूप में प्राप्त करने को स्वयं को उपयुक्त किया है, उनसे ही वह आत्मा उपयुक्त उपादान ग्रहण करती है। आनुवंशिक संचारवाद (Doctrine of Heredity) किसी प्रमाण के बिना ही एक अद्भुत बात मानता है कि मन के संस्कारों की छाप जड़ में रह सकती है। जब मैं तुम्हारी ओर देखता हूँ तब मेरे चित्त-ह्रद में तरंग उठती है। वह तरंग थोड़े ही समय में लुप्त हो जाती है; किन्तु सूक्ष्म रूप में वह तरंग के रूप में ही वर्तमान रहती है। हम यह समझ सकते हैं। हम यह भी समझ सकते हैं कि भौतिक संस्कार शरीर में रह सकते हैं। किन्तु इसका क्या प्रमाण है कि शरीर के भग्न होने पर मानसिक संस्कार शरीर में रहते हैं ? किसके द्वारा ये संस्कार संचारित होते हैं ? मानो, मन का प्रत्येक संस्कार शरीर में रहना सम्भव है; मानो आनुवंशिकता के अनुसार आदिम मनुष्य से लेकर सब पूर्वजों के संस्कार मेरे पिता के शरीर में वर्तमान हैं एवं पिता के शरीर से मैं उन्हें प्राप्त कर रहा हूँ। कैसे ?
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तुम शायद कहोगे जीवाणुकोप (Bio plasmic Cell) के द्वारा। किन्तु यह कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि पिता का शरीर तो संतान मे सम्पूर्ण रूप से नहीं आता है। एक ही पिता-माता की कई संतान हो सकती है। इसलिये यदि हम यह आनुवंशिक संचारवाद् मान ले तो यह भी हमे अवश्य स्वीकार करना पडेगा कि प्रत्येक संतान के जन्म के साथ-ही-साथ पिता-माता को भी अपनी निजी मनोवृत्ति का कुछ अंश खोना पडेगा, (चूँकि उन लोगो के मत से संचारक व संचार्य एक अर्थात् भौतिक है) एवं यदि तुम कहोगे कि उनकी सारी मनोवृत्तियाँ ही संचारित होती है तो यह बात माननी पड़ेगी कि प्रथम सन्तान के जन्म के बाद ही उन लोगो का मन पूर्ण रूप से शून्य हो जायगा। फिर यदि जीवाणुकोप में चिरकाल के अनन्त सस्कार रह जायें तो पूछा जायगा कि ये कहाँ रहते हैं और किस रूप से? यह पक्ष बिलकुल असम्भव है। जब तक ये जड़वादी प्रमाणित न कर सके कि कैसे वे संस्कार उस कोष मे रह सकते है तथा कहाँ रह सकते है एव “भौतिक कोष मे ये मनोवृत्तियाँ निद्रित रहती है” इसका तात्पर्य वे जब तक समझा नहीं सकते तब तक उनका सिद्धान्त मान लेना असम्भव है। इतना तो हम अच्छी तरह समझ जाते है कि ये संस्कार मन के भीतर ही निवास करते है। मन ही बार बार जन्म ग्रहण करता आता है, मन ही अपने उपयोगी उपादान ग्रहण करता है और इस मन ने जिस शरीरविशेष के धारण करने के उपयुक्त कर्म किये है, तन्निर्माणोपयोगी उपादान जब तक वह नहीं पाता, तब तक उसे राह देखनी पड़ती है। यह हम अनुभव करते है। अतएव आत्मा के लिए देहगठनोपयोगी उपादान प्रस्तुत करने तक ही आनुवंशिक संचारवाद स्वीकृत किया जा सकता है। परन्तु
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आत्मा देह के बाद देह ग्रहण करती है, शरीर के बाद शरीर प्रस्तुत करती है; और हम जो कुछ चिन्ता करते है, हम जो कुछ कार्य करते है वही सूक्ष्म भाव मे रह जाता है और समय आने पर वे ही स्थूल रूप मे व्यक्त भाव धारण करके आत्मप्रकाश के लिये उन्मुख होते हैं। मैं अपना अभिप्राय तुम्हे और भी अधिक स्पष्ट रूप से कह दूँ। जब कभी मैं तुम लोगों की ओर देखता हूँ तो मेरे मन मे एक तरग उठती है। वह मानो मेरे चिन्ताह्रद के भीतर डूब जाती है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाती है, परन्तु वह बिलकुल ही नष्ट नहीं हो जाती। मन मे वह किसी भी मुहूर्त मे स्मृति-तरंग के रूप मे प्रकट होने को प्रस्तुत रहती है। इसी तरह मेरे मन के भीतर ही यह समस्त संस्कारसमष्टि विद्यमान है जो मृत्यु के समय पर साथ ही बाहर हो जायगी। मानो, इस कमरे मे कहीं एक गेंद पड़ी है और हम सब एक एक छड़ी से सब ओर से उसे मारने लगे। गेंद कमरे के एक कोने से दूसरे कोने मे दौड़ने लगी, दरवाज़े के नजदीक जाते ही वह बाहर चली गई। वह किस शक्ति से बाहर चली जाती है ?—जितनी छड़ियाँ उसे मारी गई थीं उनकी सम्मिलित शक्ति से। किस ओर उसकी गति होगी, यह भी इन सभी के समवेत फल से निर्णित होगा। इसी प्रकार, शरीर का पतन होने पर आत्मा की गति का निर्णायक क्या होगा ? उसने जैसे कर्म किये है, जैसी चिन्ताएँ की है, वे ही उसे किसी विशेष दिशा मे परिचालित करेगी। अपने भीतर उन सबो की छाप लेकर वह आत्मा अपने गन्तव्य की ओर अग्रसर होगी। यदि समवेत कर्मफल इस प्रकार हो कि भोग के लिये उसे पुनः एक नया शरीर गढ़ना होगा तो वह ऐसे पिता-माता के पास जायगी जिनसे वैसे शरीर गठन करने के उपयुक्त उपादान प्राप्त कर सके और उन्ही उपादानो के द्वारा वह एक नया
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शरीर धारण कर लेगी। इसी तरह वह आत्मा एक देह से दूसरी देह मे जाती रहेगी, कभी स्वर्ग मे जायगी तो कभी पृथ्वी पर आकर मानव देह धारण करेगी अथवा अन्य कोई उच्चतर या निम्नतर जीव-शरीर धारण करेगी। और इस प्रकार वह तब तक आगे बढ़ती जायगी जब तक उसका भोग समाप्त होकर वह अपने निजी स्थान पर लौट न आयेगी। तभी वह अपना स्वरूप जान सकती है, जान सकती है कि वह यथार्थतः क्या है। तब समस्त अज्ञान दूर हो जाता है और उसकी सारी शक्तियाँ प्रकाशित होजाती है। वह तब सिद्ध हो जाती है, पूर्णता प्राप्त कर लेती है, तब उसके लिये स्थूल शरीर की सहायता से कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। सूक्ष्म शरीर के द्वारा कार्य करने की भी आवश्यकता नहीं रहती। वह तब स्वयंज्योति व मुक्त हो जाती है, उसका फिर जन्म या मृत्यु कुछ भी नहीं होता।
अब इस विषय पर हम और अधिक कुछ आलोचना नहीं करेगे। पुनर्जन्म के बारे मे केवल एक और बात की ओर आप लोगो का ध्यान आकर्षित कर हम यह आलोचना समाप्त करेगे। यही मत केवल जीवात्मा की स्वाधीनता की घोषणा करता है। केवल यही एक मत है जो हमारी सारी दुर्बलताओ का दोष दूसरे के मत्थे नहीं मढ़ता। अपने निज के दोष दूसरे के मत्थे मढ़ना मनुष्य की स्वाभाविक दुर्बलता है। हम अपने दोष नहीं देखते है। क्या आँखे कभी अपने को देख पाती है ? किन्तु वे दूसरे सभी की आँखे देख सकती है। हम मनुष्य है, अपनी दुर्बलताये, अपनी गलतियाँ मानने को हम तब तक राजी नहीं होते जब तक हम दूसरो पर ये सब लाद सकते है। साधारणतः मनुष्य अपने दोषों तथा अपनी भूलो
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को पडोसियो पर लाढना चाहता है। और यदि यह न बन सके, तो ईश्वर को इसके लिये उत्तरदायी बनाने की चेष्टा करता है—और यदि इसमे भी सफल न हुआ तो भाग्य नामक एक भूत की कल्पना करता है और उसी को इसके लिये उत्तरदायी करके निश्चिन्त रहता है ! परन्तु प्रश्न यह है कि ‘भाग्य’ नाम की यह वस्तु है क्या और रहती कहाँ है ? हम तो जो कुछ बोते है उसीको पाते है।
हमने स्वय ही अपने अपने भाग्यो की सृष्टि की है। यद्यपि ‘हमारा भाग खोटा हो तब भी हम किसी को उत्तरदायी नहीं बना सकते और यदि हमारे भाग्य अच्छे हो तो भी किसी की प्रशंसा करने की आवश्यकता नहीं है। वायु सर्वदा बह रही है। जिन सब जहाजों के पाल उठे रहते है उन्हीं का वायु साथ देती है और वे ही उसके सहारे आगे बढ़ते है। किन्तु जिनके पाल लगाये नहीं गये उन पर वायु का कोई असर नहीं होता। किन्तु यह क्या वायु का दोष है ? हममे कोई सुखी है तो कोई दुःखी। क्या यह भी उन करुणामय पिता के कारण है जिनकी कृपा-रूपी वायु दिनरात बहती रहती है, जिनकी दया का अन्त नही है ? हम स्वयं ही अपने भाग्यों के निर्माता है। उनका सूर्य सभों के लिये उगता है चाहे वे दुर्बल हो या बलवान। साधु, पापी सभी के लिये उनकी वायु बह रही है। वे सभो के प्रभु है, पिता है, वे दयामय तथा समदर्शी है। क्या तुम लोगो की यह धारणा है कि हम छोटी छोटी चीजों को जिस दृष्टि से देखते है, वे भी उसी दृष्टि से देखते है ? भगवान के सम्बन्ध मे हमारी यह कितनी क्षुद्र धारणा है। कुत्ते के पिल्लो की
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तरह हम नाना विपयो के लिये प्राणपण से चेष्टा कर रहे है और मूर्ख की तरह हम समझ रहे है कि भगवान भी उन विपयों को ठीक उसी तरह सत्य समझकर ही ग्रहण करेंगे। इन पिल्लो के इस खेल का क्या अर्थ है, वे अच्छी तरह जानते है। उन पर सब दोप लाद देना या यह कहना कि वे ही दण्ड-पुरस्कार देने के मालिक है, मूर्खता की वाते है। वे किसी को दण्ड नहीं देते, पुरस्कार भी किसी को नहीं देते। प्रत्येक देश मे, प्रत्येक काल मे और प्रत्येक दशा मे प्रत्येक जीव उनकी अनंत दया प्राप्त करने का अधिकारी है। किस तरह उसका व्यवहार किया जायगा यह हम पर निर्भर रहता है। मनुष्य, ईश्वर या और किसी पर दोप लादने की चेष्टा न करो। जब तुम स्वय कष्ट पाते हो तो अपने को ही उसके लिये दोषी समझो एवं जिससे अपना कल्याण हो सके उसी की चेष्टा करो।
पूर्वोक्त समस्या का यही समाधान है। जो लोग अपने दुःखो या कष्टो के लिये दूसरों को दोपी बनाते है (दुःख इस वात का है कि ऐसे लोगो की संख्या दिनो दिन बढ़ती जा रही है) साधारणतया वे लोग दुर्बल-मस्तिष्क है; अपने कर्म-दोष से वे ऐसी परिस्थिति में आ पडे है, किन्तु अव वे इसलिये दूसरों को उत्तरदायी वना रहे हैं—इससे उनकी दशा मे तनिक भी परिवर्तन नहीं होता वरन् दूसरो पर दोप लादने की चेष्टा करने के कारण वे और भी दुर्बल वन जाते हैं। अतएव अपने दोप के लिये तुम किसी को उत्तरदायी न समझो. अपने ही पैरो पर खडे होने की चेष्टा करो, सव कामों के लिये अपने को ही उत्तरदायी समझो। कहो कि जिन कष्टो को हम
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अभी झेल रहे हैं वे हमारे ही कृत कर्मों के फल हैं। यदि यह मान लिया जाय तो यह भी प्रमाणित हो जायगा कि वे फिर हमारे ही द्वारा नष्ट भी किये जा सकेंगे। हमने जो कुछ सृष्ट किया है उस सभी का ध्वंस भी हमीं कर सकते हैं, जो कुछ दूसरों ने बनाया है उसका नाश हमसे कभी नहीं हो सकता। अतएव उठो, साहसी बनो, वीर्यवान होओ। सब उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लो—यह याद रखो कि तुम स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम जो कुछ बल या सहायता मागते हो वह तुम्हारे भीतर ही विद्यमान है। इसलिये इसी ज्ञानरूपी शक्ति के सहारे तुम बल प्राप्त करो और अपना भविष्य अपने हाथों बनाओ। 'गतस्य शोचना नास्ति'—अब समस्त भविष्य तुम्हारे सामने पड़ा हुआ है। सर्वदा तुम इस बात का स्मरण रखो कि तुम्हारी प्रत्येक चिन्ता, प्रत्येक कार्य सचित रहेगा, और यह भी याद रखो कि जैसे तुम्हारी प्रत्येक असत् चिन्ता या असत् कार्य शेरों की तरह तुम पर कूद पड़ने की चेष्टा करेगा वैसे ही सत् चिन्ताएँ एवं सत् कार्य भी हजारों देवताओं की शक्ति लेकर सर्वदा तुम्हारी रक्षा के लिये उद्यत रहेंगे।
१०. बहुत्व में एकत्व
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ् पश्यति
नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्धीर . प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥
—कठोपनिषद्, द्वितीय अध्याय, प्रथम वल्ली ।
“ स्वयंभू ने इन्द्रियो को वहिर्मुख होने का विधान बनाया है, इसीलिये मनुष्य सामने की ओर ( विपयो की ओर ) देखता है. अन्तरात्मा को नहीं देखता । कोई कोई ज्ञानी व्यक्ति जो विपयो की ओर से निवृत्तदृष्टि है और अमृतत्व प्राप्ति की इच्छा रखता है, अन्तरस्थ आत्मा को देखा करता है।” हम देख चुके है कि वेदो के संहिता भाग मे तथा अन्य ग्रन्थो मे भी जगत् के तत्व का जो अनुसन्धान हो रहा था उससे बाहरी प्रकृति की तत्वालोचना द्वारा ही जगत् के कारण का अनुसन्धान करने की चेष्टा की गई थी, उसके बाद इन सभी सत्य की खोज करने वालो के हृदय मे एक नवीन प्रकाश आलोकित हुआ; उन्होंने समझ लिया कि वहिर्जगत् के अनुसन्धान द्वारा वस्तु का वास्तविक स्वरूप जानना असम्भव है। फिर किस प्रकार उसको जानना होगा ? बाहर की ओर से दृष्टि को फिरा कर अर्थात् भीतर की ओर दृष्टि करके जानना होगा। और यहाँ पर आत्मा का विशेषण स्वरूप जो 'प्रत्यक् ' शब्द प्रयुक्त हुआ है वह भी एक विशेष भाव का द्योतक है। प्रत्यक् अर्थात् जो भीतर की ओर गया है —हमारी अन्तरतम वस्तु
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२०६ ज्ञानयोग
हृदय-केन्द्र, वही परम वस्तु जिससे मानो सब बाहर आया है, वही मध्यवर्ती सूर्य जिसकी किरणे है मन, शरीर, इन्द्रियाँ और जो कुछ हमारा है वह सब।
'पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्।
अथ धीराः अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते॥
(कठ—पूर्वोक्त)
"बालबुद्धि मनुष्य बाहरी काम्य वस्तुओं के पीछे दौड़ते फिरते है। इसीलिये सब ओर व्याप्त मृत्यु के पाश मे बंध जाते है, किन्तु ज्ञानी पुरुष अमृतत्व को जान कर अनित्य वस्तुओं मे नित्य वस्तु की खोज नही करते।" यहाँ पर भी यही भाव प्रकट होता है कि सीमित वस्तुओ से पूर्ण बाह्य जगत् मे असीम और अनन्त वस्तु की खोज व्यर्थ है—अनन्त की खोज अनन्त मे ही करनी होगी और हमारी अन्तर्वर्ती आत्मा ही एक मात्र अनन्त वस्तु है। शरीर, मन आदि जितना भी जगत्प्रपञ्च हम देखते हैं अथवा जो हमारी चिन्ताये अथवा विचार है कुछ भी अनन्त नही हो सकता। इन सभी की उत्पत्ति काल मे है और लय भी काल मे है। जो द्रष्टा साक्षी पुरुष इन सब को देख रहा है, अर्थात् मनुष्य की आत्मा, जो सदा जाग्रत है वही एक मात्र अनन्त है, वही जगत् का कारणस्वरूप है; अनन्त की खोज करने के लिये हमे अनन्त मे ही जाना पडेगा—उस अनन्त आत्मा मे ही हम जगत् के कारण को देख पायेगे। 'यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति' (कठ—पूर्वोक्त)। 'जो यहाँ है वही वहाँ भी है; जो वहाँ है वही
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यहाँ भी है। जो यहाँ नाना रूप देखते है वे बारंबार मृत्यु को प्राप्त होते है।' संहिता भाग मे हम देखते है कि आर्यों में स्वर्ग जाने की विशेष रूप से इच्छा रहती थी। जब वे जगत्प्रपञ्च से विरक्त हो उठे तो स्वभावत ही उनके मन मे एक ऐसे स्थान मे जाने की इच्छा हुई जहाँ दुख से बिलकुल रहित केवल सुख ही सुख हो। 'ऐसे स्थानो का ही नाम स्वर्ग है—जहाँ केवल आनन्द ही होगा, जहाँ शरीर अजर अमर हो जायगा, मन भी वैसा ही हो जायगा और वे वहाँ पितृगणो के साथ सदा वास करेंगे। किन्तु दार्शनिक विचारो की उत्पत्ति होने के बाद इस प्रकार के स्वर्ग की धारणा असंगत और असम्भव मालूम पड़ने लगी। 'अनन्त- किसी एक देश मे है,' यह वाक्य ही स्वविरोधी है। किसी भी स्थानविशेष की उत्पत्ति और नाश दोनो ही काल मे होते हैं। अतः उन्हे स्वर्गविषयक धारणा का त्याग कर देना पडा। वे धीरे धीरे समझ गये कि ये सब स्वर्ग मे रहने वाले देवता लोग एक समय इसी जगत् के मनुष्य थे, बाद मे किसी सत्कर्म के फलस्वरूप वे देवता बन गये है: अतः यह देवत्व केवल विभिन्न पदो का नाम मात्र है। वेद का कोई भी देवता किसी व्यक्तिविशेष का नाम नहीं है।
इन्द्र या वरुण किसी व्यक्ति के नाम नहीं है। ये सब विभिन्न पदो के नाम हैं। उनके मत के अनुसार जो पहले इन्द्र थे वे अब इन्द्र नहीं है, उनका इन्द्रत्व अब नहीं है, एक अन्य व्यक्ति यहाँ से जाकर उस पद पर आरूढ हो गया है। सभी देवताओ के सम्बन्ध मे इसी प्रकार समझना चाहिये। जो सब मनुष्य कर्म के बल से देवत्व प्राप्ति के योग्य अवस्था को प्राप्त कर चुके हैं
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ज्ञानयोग
वे ही सब इन पदो पर समय समय पर प्रतिष्ठित होते है । किन्तु इनका भी विनाश होता है। प्राचीन ऋग्वेद मे देवताओ के सम्बन्ध मे हम इस अमरत्व शब्द का व्यवहार देखते है अवश्य, किन्तु वाद के काल मे इसका एकदम परित्याग कर दिया गया है; कारण, उन्होने देखा कि यह अमरत्व देश-काल से अतीत होने के कारण किसी भौतिक वस्तु के सम्बन्ध मे प्रयुक्त नही हो सकता, चाहे वह वस्तु कितनी ही सूक्ष्म क्यो न हो। वह कितनी ही सूक्ष्म क्यो न हो, उसकी उत्पत्ति देश-काल में ही है, कारण, आकार की उत्पत्ति का प्रधान उपादान देश है। देश को छोड़ कर आकार के विषय की कल्पना करके देखो, यह असम्भव है। देश ही आकार के निर्माण का एक विशिष्ट उपादान है—इस आकृति का निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। देश और काल माया के भीतर है। और स्वर्ग भी इसी पृथ्वी के समान देश-काल की सीमा से बद्ध है यह भाव उपनिषदो के निम्नलिखित श्लोकांश मे व्यक्त किया गया है—'यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह'—'जो कुछ यहाँ है वह वहाँ है, जो कुछ वहाँ है वही यहाँ भी है।' यदि ये ही देवता हैं तो जो नियम यहाँ है वही वहाँ भी लागू होते है, और सभी नियमों का चरम उद्देश्य है—विनाश, और वाद मे फिर नये नये रूप धारण करना। इसी नियम के द्वारा सभी जड पदार्थ विभिन्न रूपो मे परिवर्तित हो रहे है, और टूट कर, चूरचूर होकर फिर उन्ही जड कणों मे परिणत हो रहे हैं। जिस किसी वस्तु की उत्पत्ति है, उसका विनाश होता ही है। अतएव यदि स्वर्ग है तो वह भी इसी नियम के अधीन होगा।
बहुत्व मे एकत्व २०९
हम देखते हैं कि इस जगत् मे सभी प्रकार के सुखो की छाया के रूप मे कोई न कोई दुख रहता है। जीवन के पीछे उसकी छाया के रूप मे मृत्यु रहती है। वे दोनो सदा एक साथ ही रहते है। कारण, वे परस्पर विरोधी नही हैं; वे दोनो पूर्ण पृथक् सत्ताये नहीं हैं, वे एक ही वस्तु के दो विभिन्न रूप है, वह एक ही वस्तु जीवन-मृत्यु, सुख-दुख, अच्छे-बुरे आदि रूप में प्रकाशित हो रही है। अच्छी और बुरी ये दोनो सम्पूर्ण रूप से पृथक् वस्तुये हैं और वे अनन्त काल से चली आ रही हैं, यह धारणा नितान्त असगत है। वे वास्तव मे एक ही वस्तु के विभिन्न रूप है—जो कभी अच्छे रूप में और कभी बुरे रूप में प्रतिभात हो रही है, बस। यह विभिन्नता प्रकारगत नहीं, परिमाणगत है। उनका भेद वास्तव में मात्रा के तारतम्य मे है। हम देखते हैं कि एक ही स्नायुप्रणाली अच्छे बुरे दोनो प्रकार के प्रवाह को ले जाती है। किन्तु यदि स्नायुमण्डली किसी प्रकार से बिगड़ जाय तो किसी प्रकार की अनुभूति ही न होगी। मान लो, एक स्नायु में पक्षाघात हो गया, उस समय उसमे से होकर जो सुखकर अनुभूति आनी थी वह नहीं आयेगी, और दुखकर अनुभूति भी नहीं आयेगी। ये सुख दुख कभी भी पृथक् नहीं होते, वे मानो सर्वदा एकत्र ही रहते हैं और एक ही वस्तु जीवन मे कभी सुख, कभी दुख का उत्पादन करती है। एक ही वस्तु किसी को सुख और किसी को दुख देती है। मांसाहार से खाने वाले को सुख अवश्य मिलता है, किन्तु जिसका मास खाया जाता है उसे तो भयानक कष्ट है। ऐसा कोई विषय ही नहीं जो सब को समान रूप से सुख देता हो। कुछ लोग सुखी हो रहे हैं और कुछ दुखी। इसी प्रकार चलेगा।
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२१० ज्ञानयोग
२१० ज्ञानयोग
अतः अब यह स्पष्ट होगया कि यह द्वैतभाव वास्तव मे मिथ्या है। इससे क्या प्राप्त हुआ ? मै पहले व्याख्यान मे ही यह कह चुका हूँ कि जगत् मे ऐसी अवस्था कभी आ ही नही सकती जब सभी कुछ अच्छा हो जायगा और बुरा कुछ भी नहीं रहेगा। इससे अनेक व्यक्तियों की चिर घोषित आशा अवश्य चूर्ण हो जायगी, अनेक इससे भयभीत भी होंगे किन्तु इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त मै अन्य उपाय नही देखता। यदि मुझे कोई समझा दे कि वह सत्य है तो मै समझने को तैयार हूँ, परन्तु जब तक मेरी समझ मे नही आता तब तक कैसे मान सकता हूँ ?
मेरे इस कथन के विरुद्ध कुछ युक्तियुक्त मालूम पड़ने वाला एक तर्क है कि क्रमविकास की गति के क्रम से समयानुसार जो कुछ अशुभ हम देखते है सभी चला जायगा—इसका फल यह होगा कि इसी प्रकार कम होते होते लाखों वर्ष के बाद एक ऐसा समय आयेगा जब सभी अशुभ नष्ट हो कर केवल शुभ ही शुभ शेष रह जायगा। ऊपर से देखने पर यह युक्ति एकदम अखण्डनीय मालूम पड़ सकती है। ईश्वरेच्छा से यदि यह सत्य होती तो बड़ा ही आनन्द होता, किन्तु इस युक्ति मे एक दोष है। वह यह कि यह शुभ और अशुभ दोनों को निर्दिष्ट परिमाण मे लेती है। यह स्वीकार करती है कि एक निर्दिष्ट परिमाण मे अशुभ है, मान लो कि वह १०० है, और इसी प्रकार निश्चित परिमाण मे शुभ भी है और यह अशुभ कम होता जा रहा है और केवल शुभ बचता जा रहा है। किन्तु क्या वास्तव मे ऐसा ही है ? जगत् का इतिहास साक्षी है कि शुभ के समान अशुभ भी क्रमशः बढ़ ही रहा है।
बहुत्व में एकत्व २१२
समाज के अत्यन्त निम्न स्तर के व्यक्ति को लीजिये। वह जंगल मे रहता है, उसके भोगसुखों की संख्या कम है, इसलिये उसके दुःख भी कम हैं। उसके दुःख केवल इन्द्रियविषयो तक ही सीमित हैं। यदि उसे पर्याप्त मात्रा मे भोजन न मिले तो वह दुःखी हो जाता है। उसे खूब भोजन दो, उसे स्वच्छन्द हो कर घूमने फिरने और शिकार करने दो, वह पूरी तरह सुखी हो जायगा। उसका सुख-दुःख सभी केवल इन्द्रियो मे ही आबद्ध है। मानलो कि उसका ज्ञान बढ़ने लगा। उसका सुख बढ़ रहा है, उसकी बुद्धि खुल रही है, वह जो सुख पहले इन्द्रियो मे पाता था अब वही सुख उसे बुद्धि की वृत्तियो को चलाने मे मिलता है। वह एक सुन्दर कविता पाठ करके अपूर्व सुख का स्वाद लेता है। गणित की किसी समस्या की मीमांसा करने मे ही उसका सम्पूर्ण जीवन कट जाय, इसी मे उसको परम सुख प्राप्त है। किन्तु इसके साथ साथ असभ्य अवस्था मे जिस तीव्र यंत्रणा का उसने अनुभव नहीं किया, अब उसके स्नायु उसी तीव्र यंत्रणा का अनुभव करने के भी क्रमशः अभ्यासी हो जाते हैं, अत. उसे तीव्र मानसिक कष्ट होता है। एक बहुत ही साधारण उदाहरण लीजिये।
तिब्बत देश मे विवाह नहीं होता, अतः वहाँ प्रेम की ईर्ष्या भी नहीं पाई जाती, फिर भी हम जानते ही है कि विवाह अपेक्षाकृत उन्नत समाज का परिचायक है। तिब्बती लोग निष्कलंक स्वामी और निष्कलंक स्त्री के विशुद्ध दाम्पत्य-प्रेम का सुख नहीं जानते। किन्तु साथ ही किसी पुरुष या स्त्री के पतन हो जाने से दूसरे के मन मे कितनी भयानक ईर्ष्या, कितना अन्तर्दाह उपस्थित हो जाता है ये यह भी नहीं जानते। एक ओर उच्च धारणा से सुख मे वृद्धि हुई अवश्य, किन्तु दूसरी ओर इससे दुःख की भी वृद्धि हुई।
२१२ ज्ञानयोग
२१२ ज्ञानयोग
आप अपने देश की ही बात लीजिये—पृथ्वी पर इसके समान धनिको का देश दूसरा नही है—और दुःख कष्ट यहाँ किस प्रबल रूप में विराजमान है वह भी देखिये। अन्यान्य देशों की अपेक्षा यहाँ पागलों की सख्या कितनी अधिक है,! इसका कारण है, यहाँ के लोगो की वासनाये अति तीव्र, अत्यन्त प्रबल हैं। यहाँ के लोगों को जीवन का स्तर सर्वदा ऊँचा ही रखना होता है। आप लोग एक वर्ष मे जितना खर्च कर देते हैं, वह एक भारतीय के लिये जीवन भर की सम्पत्ति के बराबर है। और आप लोग दूसरों को उपदेश भी नहीं दे सकते कि खर्च कम करो, कारण, यहाँ चारों ओर की अवस्था ही ऐसी है कि किसी विशेष स्थान मे इतने से कम मे खर्च ही नही चलेगा—नहीं तो सामाजिक चक्र मे आपको पिस जाना पड़ेगा। यह सामाजिक चक्र दिन रात घूम रहा है—वह विधवा के आँसुओं पर और अनाथ बालक-बालिकाओं के चीत्कार पर तनिक भी कान नहीं देता। आपको भी इसी समाज मे आगे बढकर चलना होगा, नही तो इसी चक्र के नीचे पिस जाना होगा। यहाँ सभी जगह यही अवस्था है। आप लोगो की भोगसम्बन्धी धारणा भी अत्यधिक परिमाण मे विकासप्राप्त हो गई है, आप का समाज भी अन्यान्य समाजो की अपेक्षा लोगों को अधिक आकर्षित करता है। आपके भोगों के भी नाना प्रकार के उपाय हैं। किन्तु जिनके पास आपके समान भोगो की सामग्री नहीं है या कम है उनके लिये आपकी अपेक्षा दुःख भी कम हैं। इसी प्रकार आप सभी जगह देखेंगे। आपके मन मे जितनी दूर तक उच्च अभिलाषाये रहेगी आपको सुख भी उतना ही अधिक मिलेगा और उसी परिमाण मे दुःख भी। एक मानो दूसरे की छाया स्वरूप है। अशुभ कम होता जा रहा है यह बात सत्य हो सकती है, किन्तु उसके साथ ही शुभ भी कम