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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

३२२ ज्ञानयोग

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३२२ ज्ञानयोग

वह इस सूक्ष्म शरीर अर्थात् मन के परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुई एक मृगमरीचिका मात्र है। यह बराबर चल रहा है। यह आकाश पर तैरते हुये बादल के एक टुकड़े के समान है। जैसे जैसे यह चलता जाता है वैसे ही एक भ्रम उत्पन्न हो सकता है कि आकाश चल रहा है। कभी कभी जब चन्द्रमा ही के ऊपर से बादल निकलते हैं तो भ्रम होता है कि चन्द्रमा ही चल रही है। जब आप गाड़ी में बैठे रहते हैं तो मालूम होता है कि पृथ्वी चल रही है और नाव पर बैठने वाले को पानी चलता हुआ सा मालूम होता है। वास्तव में न आप जा रहे हैं, न आ रहे हैं, न आप ने जन्म लिया है, न फिर जन्म लेंगे। आप अनन्त हैं, सर्वव्यापी हैं, सभी कार्य-कारण-सम्बन्ध से अतीत, नित्य मुक्त, अज और अविनाशी। जन्म और मृत्यु का प्रश्न ही गलत है, महामूर्खतापूर्ण है। मृत्यु हो ही कैसे सकती है जब जन्म ही नहीं हुआ।

किन्तु तर्कसंगत सिद्धान्त लाभ करने के लिए हमें अभी एक पग और बढ़ाना पड़ेगा। मार्ग के बीच में रुकना नहीं है। आप दार्शनिक हैं, आपके लिये बीच में रुकना शोभा नहीं देता। तो यदि हम नियम के बाहर हैं तो निश्चय ही सर्वज्ञ भी हैं और नित्यानन्द स्वरूप भी। सभी ज्ञान हमारे अन्दर और सभी शक्ति तथा आनन्द भी हमारे अन्दर ही है। हाँ, अवश्य ही है। आप ही जगत् के सर्व-व्यापक सर्वज्ञ आत्मा हैं। परन्तु इस प्रकार की सत्ता या पुरुष क्या एक से अधिक हो सकते हैं ? क्या लाखों करोड़ों पुरुष सर्वव्यापक हो सकते हैं ? कभी नहीं। तब फिर हम सबका क्या होगा ? हम सब एक ही हैं; इस प्रकार का आत्मा एक ही है और वह एक आत्मा ही आप सब

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अमरत्व ३२३

हैं। इस तुच्छ प्रकृति के पीछे वही है, जिसे हम आत्मा कहते हैं। एक ही पुरुष है जो एकमात्र सत्ता है, सदानंद स्वरूप, सर्वव्यापक सर्वशक्ति-मान, जन्मरहित, मृत्युहीन। उसी की आज्ञा से आकाश विस्तृत हुआ है, उसी की आज्ञा से वायु बहती है, सूर्य चमकता है, सब जीवित रहते हैं। प्रकृति का वास्तविक रूप वही है; प्रकृति उसी सत्य स्वरूप के ऊपर प्रतिष्ठित है, इसीलिए सत्य प्रतीत होती है। वही आप की आत्मा का आत्मा है, नहीं, और भी अधिक, आप ही वह है, आप और वह एक ही हैं, जहाँ कहीं भी दो हैं वहीं भय है, वहीं खतरा है, वहीं द्वन्द्व है, वहीं संघर्ष है। जब सब एक ही है तो किससे घृणा, किससे संघर्ष; जब सब कुछ वही है, तो आप किससे लडेगे? जीवनसमस्या की वास्तविक मीमांसा यही है। इसीसे वस्तु के स्वरूप की व्याख्या होजाती है, यही सिद्धि या पूर्णत्व है, यही ईश्वर है। जब तक आप अनेक देखते है तभी तक आप अज्ञान मे हैं। "इस बहुत्वपूर्ण जगत् मे जो एक को देखता है, इस परिवर्तनशील जगत् मे जो उस अपरि-वर्तनशील को देखता है और जो उसे, अपने आत्मा के आत्मा के रूपं मे देखता है, अपना स्वरूप जानता है, वही मुक्त है, वही आनन्दमय है, वही लक्ष्य पर पहुँच गया है।" इसलिये समझ लो कि तुम ही वही हो, तुम ही जगत् के ईश्वर हो, 'तत्त्वमसि'। ये धारणायें कि मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ, मै रोगी हूँ, मैं स्वस्थ हूँ, मैं बलवान् हूँ, मैं निर्बल हूँ, अथवा यह कि मैं घृणा करता हूँ, मैं प्रेम करता हूँ, अथवा मेरे पास इतनी शक्ति है, यह सब भ्रम मात्र है। इसको छोडो। तुम्हें दुर्बल कौन बना सकता है? तुम्हें कौन भयभीत कर सकता है? जगत् मे तुम्हीं तो एक मात्र सत्ता हो। तुम्हे किसका भय है? खडे हो जाओ, मुक्त हो जाओ। समझ लो कि जो कोई विचार या शब्द तुम्हे दुर्बल