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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

११४ ज्ञानयोग

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११४ ज्ञानयोग

एक अनंत सर्वशक्तिमान और निःस्वार्थ पुरुष की जो इस विश्व का शासन कर रहे है। इस सगुण ईश्वर की धारणा के विरुद्ध खड़े होने के लिये कवि का साहस आवश्यक है। कवि पूछता है—तुम्हारा न्यायशील दयालु ईश्वर कहाँ है ? वह मनुष्य है अथवा पशु ? क्या वह अपनी लाखों सन्तान का विनाश नहीं देखता ? कारण, ऐसा कौन है जो एक क्षण भी दूसरे की हिंसा किये बिना जीवन धारण कर सकता है ? क्या आप सहस्रों जीवनों का संहार किये बिना एक साँस भी ले सकते है ? लाखों जीव मर रहे है, इसी से आप जीवित हैं। आपके जीवन का प्रति क्षण, प्रत्येक निःश्वास जो आप लेते है वह सहस्रों जीवों की मृत्युस्वरूप है और आपकी प्रत्येक गति लाखों जीवों की मृत्युस्वरूप है। वे क्यों मरे ? इस सम्बन्ध मे एक अति प्राचीन अयुक्तपूर्ण दलील दी जाती है कि—“वे तो अति नीच जीव है।” मान लो कि यह बात ठीक है, किन्तु यह तो एक टेढा प्रश्न है जिसका निश्चय करना ही कठिन है। कौन कह सकता है कि चींटी मनुष्य से श्रेष्ठ है अथवा मनुष्य चींटी से ? कौन कह सकता है कि यह ठीक है या वह ठीक है ? मनुष्य घर बना सकता है, यन्त्र बना सकता है, इसलिये वही श्रेष्ठ है। परन्तु हम इसी तरह यह भी तो कह सकते हैं कि चींटी घर नहीं बना सकती, यन्त्र नहीं बना सकती इसीलिये वह श्रेष्ठ है। जिस प्रकार इस पक्ष में कोई युक्ति नहीं है उसी प्रकार उस पक्ष मे भी कोई युक्ति नहीं है।

अच्छा, मान लिया कि वे अति क्षुद्र जीव हैं, फिर भी वे मरे क्यों ? उनके क्षुद्र होने से ही तो उनका बचना और भी आवश्यक है। वे क्यों न बचें ? उनका जीवन अधिकतर इन्द्रियों में आबद्ध है

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माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास ११५

अतः वे हमारी तुम्हारी अपेक्षा सहस्रगुना दुःख-सुख का बोध करते हैं। कुत्ता या व्याघ्र जिस स्फूर्ति और लगन के साथ भोजन करते हैं, उस तरह कौन मनुष्य कर सकता है ? इसका कारण है कि हमारी समस्त कार्यों की प्रवृत्ति इन्द्रियो मे नहीं है, बुद्धि में है, आत्मा मे है। किन्तु कुत्ते की इन्द्रियों मे ही प्राण पड़े रहते है, वह इन्द्रियसुख के लिये उन्मत्त हो जाता है, वह जितने आनन्द के साथ इन्द्रियसुख का उपभोग करता है, मनुष्य उतना नही कर सकता; और जैसा उसका यह सुख है उसी परिमाण मे उसका दुःख भी है।

जितना सुख है उतना ही दुःख है। यदि मनुष्येतर प्राणी इतनी तीव्रता से सुख की अनुभूति करते हैं तो यह भी सत्य है कि उनके दुःख की अनुभूति भी उतनी ही अधिक तीव्र होगी—मनुष्य की अपेक्षा सहस्रगुनी तीव्र होगी, परन्तु फिर भी उन्हे मरना होगा ! तो फिर मरने मे भी उन्हे मनुष्य की अपेक्षा सहस्रगुना कष्ट होगा । फिर भी हमे उनके कष्ट की चिन्ता न करते हुये उन्हे मारना पडता है। यही तो माया है; और यदि हम मान ले कि ईश्वर हमारी ही तरह का एक व्यक्ति है ( सगुण ) जिसने यह सृष्टि रची है तो ये सब सिद्धान्त और व्याख्यायें जो यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि बुराई में ही भलाई छिपी रहती है, ये सब पर्याप्त नहीं हैं। उपकार चाहे सैकड़ो हो किन्तु अपकारों से उपकार क्यों होंगे ? इसे सिद्धान्त के अनुसार मै यदि अपनी इन्द्रियों के सुख के लिये दूसरों का गला काटूँ तो कोई बुराई नहीं है। अतएव यह युक्ति ठीक नही मालूम होती। बुराई मे से भलाई क्यो निकलेगी ? इस प्रश्न का उत्तर देना होगा। किन्तु इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है; यह बात भारतीय दर्शन को माननी पड़ी।