ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in contextअमरत्व ३१७
प्रकाशित हो जायगा। एक सरल उदाहरण से यह बात भली प्रकार समझ मे आ जायगी। मान लीजिये आप खूब एकाग्र होकर मेरी बात सुन रहे है और इसी समय एक मच्छर आपकी नाक पर काट रहा है, किन्तु आप मेरी बात सुनने मे इतने तन्मय है कि उसका काटना आपको अनुभव नही होता। ऐसा क्यों ? मच्छर आपके चमडे को काट रहा है; उस स्थान पर कितने ही स्नायु है, और ये स्नायु इस संवाद को मस्तिष्क के पास पहुँचा भी रही है; इसका चित्र भी मस्तिष्क मे मौजूद है; किन्तु मन दूसरी ओर लगा है इसलिये वह प्रतिक्रिया नहीं करता, अतएव आप उसके काटने का अनुभव नही करते। हमारे सामने एक नया चित्र आया किन्तु मन ने प्रतिक्रिया नहीं की—ऐसा होने पर हम उसे अनुभव नहीं कर सकते, किन्तु प्रतिक्रिया होते ही उसका ज्ञान होगा और तभी हम देखेंगे, सुनेगे और अनुभव आदि करने मे समर्थ होगे। इस प्रतिक्रिया के साथ साथ ज्ञान का प्रकाश होता है। अत-एव हमने समझ लिया कि शरीर कभी ज्ञान का प्रकाश नही कर सकता, कारण, हम देखते हैं कि जिस समय मनोयोग नहीं रहता उस समय हम अनुभव नही करते। ऐसी घटनाये सुनी गई है कि किसी किसी विशेष अवस्था मे कोई कोई व्यक्ति जो भाषा उसने कभी नहीं सीखी है वह बोलने मे समर्थ हुआ है। बाद में खोजने पर पता लगा है कि वह व्यक्ति कभी बचपन मे ऐसी जाति मे रहा है जो उस भाषा को बोलती थी, और वही संस्कार उसके मस्तिष्क में वर्तमान था। वह सब वहाँ पर सञ्चित था, बाद मे किसी कारण से उसके मन मे प्रतिक्रिया हुई और तभी ज्ञान आ गया और वह व्यक्ति उस भाषा को बोलने मे समर्थ हुआ। इसीसे फिर सिद्ध होता है कि केवल