ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द
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Read in contextमाया और मुक्ति १२५
सक्ने। तो भी हम चेष्टा करते रहते है। चेष्टा हमे करनी ही पड़ेगी; यही माया है।
प्रत्येक साँस मे, हृदय की प्रत्येक धड़कन मे, अपनी प्रत्येक गति मे हम समझते है कि हम स्वतन्त्र हैं, और उसी क्षण हम देखते है कि हम स्वतन्त्र नही है। क्रीत दास—हम प्रकृति के क्रीत दास है—शरीर, मन तथा सभी चिन्ताओ एवं सभी भावो मे हम प्रकृति के क्रीत दास है; यही माया है।
ऐसी एक भी माता नही है जो अपनी सन्तान को अद्भुत शिशु—महापुरुष नही समझती है। वह उसी बालक को लेकर पागल हो जाती है, उसी बालक के ऊपर उसके प्राण पडे रहते है। बालक बडा हुआ—शायद् बिलकुल शराबी और पशुतुल्य हो गया—जननी के प्रति बुरा व्यवहार तक करने लगा। जितना ही उसका दुर्व्यवहार बढता है उतना ही जननी का प्रेम भी बढ़ता है। लोग इसे जननी का नि.स्वार्थ प्रेम कह कर खूब प्रशंसा करते है—उनके मन मे प्रश्न भी नही उठता कि वह माता जन्म भर के लिये केवल एक क्रीत दासी के समान है—वह प्रेम किये बिना रह ही नही सकती। हजारो बार उसकी इच्छा होती है कि वह इस मोह का त्याग कर देगी, किन्तु वह कर ही नही सकती। अतः वह इसे सुन्दर पुष्पों से सजा कर उसी को अद्भुत प्रेम कह कर व्याख्या करती है; यही माया है।
हम सब का यही हाल है। नारद ने एक दिन श्रीकृष्ण से पूछा, “प्रभो, आपकी माया कैसी है, मै देखना चाहता हूँ।” कई दिन के बाद श्रीकृष्ण नारद को लेकर एक जंगल मे गये। बहुत दूर जाने के बाद श्रीकृष्ण नारद से बोले—“नारद, मुझे बड़ी प्यास लगी है।