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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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Page 128

१२४ ज्ञानयोग

के अनुकरण से क्या लाभ है ? तथापि हम सारे जीवन भर केवल इसी के लिये चेष्टा करते रहते हैं; यही माया है।

इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को बाहर खींच लाती हैं। मनुष्य उन स्थानो मे सुख और आनन्द की खोज कर रहा है जहाँ वह उन्हे कभी भी नहीं पा सकता। युगो से हम यह सीखते आ रहे है कि यह निरर्थक और व्यर्थ है; यहाँ हमे सुख नहीं मिल सकता, परन्तु हम सीख नही सकते ! अपने अनुभव के अतिरिक्त और किसी उपाय से हम सीख नही सकते। हम प्रयत्न करते है; हमे धक्का लगता है, फिर भी क्या हम सीखते है ? नहीं, फिर भी नही सीखते। पतंग जैसे दीपक की लौ पर जलते है उसी प्रकार हम इन्द्रियो में सुख की प्राप्ति की आशा से अपने को बार बार झोकते है। हम फिर लौटते है, ताजगी लेकर; इसी प्रकार चलता रहता है और अन्त मे असमर्थ होकर, धोखा खाकर हम मर जाते है; और यही माया है।

यही बात हमारी बुद्धि के सम्बन्ध मे भी है। हम जगत् के रहस्य की मीमांसा करने की चेष्टा करते है—हम इस जिज्ञासा, इस अनुसन्धान की प्रवृत्ति को बन्द नही रख सकते; किन्तु हम लोगो को यह जान लेना चाहिये कि ज्ञान प्राप्तव्य वस्तु नहीं है—कुछ पद अग्रसर होते ही अनादि अनन्त काल का प्राचीर बीच मे व्यवधान के रूप मे आ खडा होता है जिसे हम लाँघ नहीं सकते। कुछ दूर बढ़ कर अनादि देश का व्यवधान आकर खड़ा हो जाता है जिसे अतिक्रमण नहीं कर सकते; सभी कुछ अनतिक्रमणीय हो कर हम हम कार्यकारण रूपी दीवार की सीमा से बद्ध है। हम इसे लाँघ कर आगे नहीं जा