जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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शादी का सम्बन्ध करना योग्य है। इसलिए आप इस लडके को अपनी लडकी
देकर वही बसा ले, मै भी समय मिलने पर आऊँगा।
फिर इस चिट्ठी पर सेठ की अँगूठी की मुहर लगा इच्छानुसार मार्ग-
व्यय तथा सुगन्धियाँ और वस्त्रादि ले प्रत्यन्त देश में जा सेठ के यहाँ पहुँच
प्रणाम किया।
सेठ ने उसे पूछा—तात, कहाँ से आया है ?
"बाराणसी से।"
"किसका पुत्र है ?"
"वाराणसी सेठ का।"
"किस प्रयोजन से आया है ?"
कटाहक ने कहा—यह पत्र देखकर जान ले।
सेठ ने पत्र बाँच प्रसन्न हो 'अब मेरा जीवन सफल हुआ' कह उसे लडकी दे
प्रतिष्ठित किया।
कटाहक का बडा परिवार था। वह यवागु-खाद्य अथवा वस्त्र गंध आदि
के लाने पर झिडकता था—'इस तरह भी कही यवागु पकाया जाता है ?
इस तरह भी कही खाद्य पकाया जाता है। और इस तरह भात ? ओह !
यह प्रत्यन्त देश के रहनेवाले। शहरी न होने से ही यह लोग न कपडो पर
स्त्री करना जानते है, न सुगन्धित पदार्थो को पीसना और न फूलो को गूँथना ?'
—इस प्रकार वह दर्जियो आदि की निन्दा करता।
बोधिसत्त्व ने दास को न देख पूछा—'कटाहक नही दिखाई देता। कहाँ
गया ?' फिर उसे ढूँढने के लिए आदमियो को चारो ओर भेजा। एक आदमी
ने वहाँ जा उसे देख, पहचान अपने आप को छिपाए रख लौटकर बोधिसत्त्व से
कहा। बोधिसत्त्व वह वृत्तान्त सुन, 'उसने अनुचित किया, जाकर उसे लेकर
आता हूँ' सोच राजाज्ञा ले बहुत से लोगो को साथ ले चले।
सेठ प्रत्यन्त देश को जा रहे हैं, यह बात सब जगह फैल गई।
कटाहक ने जब यह सुना कि सेठ आ रहा है, तो सोचा कि वह और किसी
कारण से नही आ रहा है। मेरे ही कारण वह आ रहा है। यदि मै अब भाग
जाऊँ तो फिर नही आ सकूँगा। इसलिए एक यही उपाय है कि मै आगे जाकर
स्वामी की सेवा कर उसे प्रसन्न करूँ।